Chapter 2
असली धम्म बनाम नकली धर्म
हमारे देश के मूल निवासी बौद्ध परंपरा में हमेशा से ही मन को पूर्ण सत्यता और श्रेष्ठ ऊर्जावान अवस्था पर लाने की खोज करते रहे हैं। वे प्रकृति के छुपे सत्य को पहचानने की मानसिक कला को जानते हैं। सिंधु घाटी की प्राकृतिक सभ्यता का जुड़ाव भारतवर्ष के मूल आदिवासियों से जुड़ा हुआ दिखाई देता है। जिस प्रकार दिपंकर बुद्ध और सुकिति बुद्ध के शुभंकर है पीपल, जो 24 घंटे आक्सीजन देता है यह महान बौद्धों का प्रकृति को मन से समझने की और प्रकृति से बुद्धि के जुड़ाव को दर्शाता है। एक प्रकार से देश के आदिवासियों का प्रकृति से जुड़ाव भी उन्हें बौद्ध सभ्यता से जोड़ कर ही दिखाता है। वह अपनी बुद्धि से ही पीपल की दिन और रात में आक्सीजन देने की क्रिया को पहचानते होंगे, चूंकि बौद्धत्व में बुद्धि से शरीर में होने वाली सारी गतिविधियों को और ऊर्जा के बहाव को महसूस करते हुए शरीर की सारी क्रियाओं को देखना होता है, और जब पूर्ण सत्य ,मन को प्राप्त हो जाता है ,तो निर्वाण की प्राप्ति होती है (goal of mind is enlightenment)। बुद्धि की श्रेष्ठता और पूर्ण सत्यता की खोज ने ही हमारे देश में मूलनिवासियों ने अनेकों बुद्ध दिए,जिसमें 28 बुद्ध का विवरण ह्वेन सांग ने भी दिया है। इस बौद्ध परंपरा का जुड़ाव सिंधु घाटी की सभ्यता से लेकर मुगल काल तक दिखाई देता है जैसे रैदास साहब, गुरुनानक साहब इत्यादि। प्राचीन काल में बहुत से बुद्ध हुए जैसे विपस्सी बुद्ध जिनके नाम से आज विपसना प्रचलित है,इन्होंने विपसना का आविष्कार किया। सुकिति बुद्ध जिन्होंने लोटस सूत्र दिया, अष्टांगिक मार्ग दिया, कारण और असर का सिद्धांत दिया। आगे के बौद्धों ने भंगी नामक उपाधी दी, इसी प्रकार से मध्यकाल में कबीर साहब ने निर्गुण की विचारधारा दी, जिसमें मन से अपने ही शरीर में उस अणु की खोज की जिसका कोई गुण नहीं होता और वह शरीर के अंदर ही पुनर्जनन (regeneration) और स्वयं उपचार (self healing) कर सकता है। इसके लिए कबीर साहेब ने बताया कि इस कण का कोई गुण नहीं होता यह शरीर में ही होता है और निर्गुण है और ऊर्जा से जुड़ा हुआ है। इसी कण को आज वैज्ञानिक युरोप में 22 किलोमीटर की सुरंग बना कर प्राप्त करने के लिए आविष्कार में लगे हुए हैं जिसका नाम उन्होंने दिया है गौड पार्टिकल। शरीर में किसी भी प्रकार के घाव इत्यादि के बहुत तेजी से भरने में मन को शरीर के घाव को देखने से भी बहुत तेजी से भरता है और तो और हर रोग के पैदा होने को भी वैचारिक दृष्टिकोण और उस रोग से मुक्ति मन से ही है। चूंकि रोग का कारण भी मन में तृष्णा की वजह से ही होता है। कबीर साहेब ने इससे जुड़े कुछ सूत्र बीजक में दिये, जिसमें मन के बहुत से सूत्रों को दिया गया है, रविदास साहब ने भी चमार बनने की नई प्रक्रिया इजाद की और चमार नामक उपाधी को भी आविष्कृत किया। कबीर साहेब ने भी अपने शरीर में ही उस ऊर्जा का मनोउत्सर्ग (self emitting energy particles) की मन से शरीर में खोज की होंगी और बौद्ध होकर सभी को मन के अंदर की ऊर्जा को संवर्धन करने के सूत्र दिए होंगे।
इन मन के महान आविष्कारकों को किन गधों ने भक्ति जैसे नकली अवधारणा में डाला होगा? ये वही वर्ग है जिसने नकली धर्म को महान मूलनिवासी बौद्ध के विपरीत बनाया है और हमारी मूलनिवासी परंपरा पर टुच्चता वाला नकली धर्म भी थोपा था।
हिंदू ना तो कोई धर्म था और ना ही कोई धर्म है बस हिन्दू ब्राह्मण ने अपनी वासनात्मक, कुंठा से भरी मानसिक मनोरोगी स्थिति को मूल निवासी श्रेष्ठ बौद्धों को गुलामी थोपने के लिए हिन्दू शब्द का प्रयोग और अपनी टुच्च मानसिकता को थोपने के लिए ही नकली धर्म की पटकथा पूरी तरह से महान बौद्धों के विपरीत लिखी और अपनी टुच्चता से प्रताड़ित भी किया और इस्लामिकरण ही थोपा नकली धर्म की आड़ में। हमारे देश में मूल परंपरा रही है अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञ रहें और उनके द्वारा दिए गए बुद्धि ज्ञान के प्रति भी कृतज्ञ रहें अपनी भावनात्मक कृतज्ञता उनके प्रति जताते रहें परंतु नकली धर्म में हमारे महान राजाओं और बौद्धों के असली इतिहास को छुपाकर ,और उनके स्थान पर झूठी नकली अवस्था और उनके प्रति असम्मानित मानसिक स्थिति बनाई गई। क्या है नकली धर्म? साधारण शब्दों में हिन्दू ब्राह्मण ने अपने को महत्वपूर्ण जताते हुए महान मूलनिवासियों राजाओं (महिषासुर, बलिराज इत्यादि) मौर्यों अहीर नागवंशी इतिहास को राक्षस इत्यादि कहकर चिड़न के भाव से देखने का नज़रिया थोपा जिसकी आड़ में मूलनिवासी बौद्ध अपने ही इतिहास के नायकों को नकली धर्म की आड़ में गालियां दे रहे थे और टुच्च भावना अपने ही नायकों के प्रति रख रहे थे। यह धर्म इस प्रकार बनाया गया है कि हिन्दू ब्राह्मण अपने साजिश करने वाले टुच्च नायकों को तो झूठ की आड़ में पुजवा रहा था और मूलनिवासियों के खुद के नायकों को उस नकली धर्म में हारा हुआ या उनके प्रति चिढ़न को फैला रहा था। आपके मन में वह द्वेष पैदा कौन करता रहा है? आपके आसपास रहने वाला हिन्दू ब्राह्मण या ईरानी ठाकुर या वैश्या ही नकली धर्म की आड़ में ही मूलनिवासियों के खिलाफ अपनी टुच्चता को मनोवैज्ञानिक रूप में नकली धर्म की आड़ में थोप रहे थे। नकली धर्म वाला जो अपनी ऊर्जा का उपयोग नकली धर्म से मानसिक तौर पर मूलनिवासियों के अंदर द्वेष पैदा करने के लिए करता रहता था। आखिर यह नकली धर्म क्या पैदा कर रहा था? इस नकली धर्म का खेल जो कि 1950 के बाद देश में खेला गया था इसका उद्देश्य था मूलनिवासियों के मन में एक ऐसी सोच पैदा करना जिससे वो अपनी स्वयं श्रेष्ठ बुद्धि से मांगने के बजाय नकली धर्म और उसके नकली भगवान से ही मांगे, यानि की भिखारी जैसी सोच पैदा करने की टुच्चता बनाई गई। अब हमारे देश में स्वयं भगवान बनने की मूल परंपरा यानि बुद्ध बनने की प्रक्रिया नकली धर्म के द्वारा छुपा दी गई थी।
नकली भगवान से मांगने की सोच पैदा करके आसानी से गुलाम पैदा किए जा सकते थे और हिन्दू शब्द का गुलामी वाला असर भी मानसिकता से दूसरों के मन में मनोवैज्ञानिक तौर पर स्थापित किया गया था। आज भी जो यूनानी हिन्दू ब्राह्मण या मुसलमान हिन्दू, हिन्दूस्तान इत्यादि शब्दों का प्रयोग करता है वह मानसिकता में विक्षिप्त है मन के अंदर वह अपने आप को महान बौद्ध के सामने टुच्चा सा महसूस कर रहा है। इसीलिए वो नकली धर्म का हवाला देकर एक काल्पनिक डर बनाने की कोशिश में लगा था ।
हमारा परिवार हमें अपने प्रेम के द्वारा मानसिक ऊर्जा⚡ देता है और उस ऊर्जा का उपयोग करके हमारा मन अत्यधिक ऊर्जावान होकर श्रेष्ठ कार्य करता है। परंतु नकली धर्म में हमारे ही समाज को घृणा से दिखाया गया है। इस घृणा के भाव को यूनानी ब्राह्मण
पहले अपने मन से नकली धर्म की आड़ में मूलनिवासियों को बौद्धत्व के विपरीत वासनात्मकता और द्वेष पैदा करता था और अपनी मानसिकता से मूलनिवासियों में रामायण महाभारत वाली पारिवारिक चिड़न और राग द्वेष से हारा हुआ कमजोर नज़रिया नकली धर्म की आड़ में थोप कर फिर अपने को श्रेष्ठ जता रहा था। नकली धर्म का पर्दाफाश कुछ इस प्रकार से होता है। हमारे देश की मूलनिवासी प्राचीन भाषा पाली के अनुसार भगवान शब्द का अर्थ होता है वो जो भग्न कर दे , नष्ट कर दे, अपने मन में विचारों में वान यानि तृष्णा ( लालच, चिड़न,गुस्सा, डर जलन इत्यादि को जो बार बार मन में उठती है और मन को विचलित करती है) को जहाँ से वो पैदा हो रही है यानि बचपन के विचारों से और जिसका जुड़ाव माँ या पिता के विचारों से जुड़कर पैदा होता है। इन विचारों में माता-पिता से स्वयं का मन जो राग या द्वेष में फंसा होता है उस राग द्वेष से मन को मुक्त करने के लिए मन से पूर्ण सत्यता की खोज करते हुए शरीर में होने वाली सारी प्रक्रियाओं को दिमाग से जुड़ने वाली नसों (neurons) से महसूस करने लगे और पूर्ण सत्य को जान ले और बुद्धि बल से स्थापित कर दे। यानि उस पदार्थ को अंदर से ही देख ले जिससे इस संपूर्ण सृष्टि का ही निर्माण हुआ है, वही कहलाता है भगवान और जो राग द्वेष के विचारों को भग्न कर दें वह कहलाते हैं भंगी। भगवान शब्द हमारे देश में सिर्फ बुद्ध के लिए ही प्रयोग किया गया है और भगवान हमारे देश का मूलनिवासियों का कन्सैप्ट है, बाकी जो आज मंदिर में दिखाई दे रहे हैं वह हिन्दू ब्राह्मण ने श्रद्धा पैदा की है वह टुच्चों की छवि को थोपना जैसा है और हमारे देश के मूलनिवासी नायकों के प्रति द्वेष बढ़ाना है। नकली धर्म को पूजना यानि अपने ही पूर्वजों को घृणा के भाव से देखना एक तरह से अपने ही परिवार के प्रति द्वेष रखकर पारिवारिक बौद्धिक प्रेम से वंचित होकर नकली धर्म वालों से प्रेम मांगना। हमारा परिवार ही हमें श्रेष्ठता और ऊर्जा देता है ताकि हम श्रेष्ठ कार्य कर सकें, परन्तु नकली धर्म वालों की ईर्ष्या की वजह से अपने ही परिवार से इर्ष्या करने की वजह से हमारे देश में एक ऐसा मनोवैज्ञानिक प्रभाव हमारे मूलनिवासी समाज पर थोपा गया था। जैसा इन मूर्तियों में दर्शाया गया है कि इनके भगवान भंगेड़ी गंजेड़ी हैं, भाला लेकर चलने वाले डरपोक हैं,लड़ाई को दर्शाते हैं, नीले रंग के जहरीले यानि चिड़न वाले हैं, पूरा धर्म यूनानी हिन्दू ब्राह्मण की मानसिक मनोरोगी स्थिति का नतीजा हैं। हमारे भगवान बुद्ध हैं जो पूर्ण सत्यता को मन के अंदर खोजकर प्राप्त करने वाले हैं, आविष्कारक हैं विश्व ख्याति प्राप्त हैं। हमारे देश में सिंधु घाटी की सभ्यता से लेकर सुकिति बुद्ध तक बहुत से भगवान यानि बुद्ध बने।
सुकिति बुद्ध यानि गौतम बुद्ध के बाद बहुत से बौद्ध हुए जैसे नागार्जुन, बोधीधर्मा इत्यादि परन्तु इनमें से किसी को भी भगवान का दर्जा प्राप्त नहीं हुआ। बोधीधर्मा ने ही चीन में जाकर शाउलिन टैंपल का निर्माण किया और वहाँ के लोगों को मार्शल आर्ट्स की कला सिखाई, ध्यान देने वाली बात यह है कि वो महान बोधीधर्मा भी मूलनिवासी बौद्ध थे । भगवान बनने की प्रक्रिया का विवरण आगे के अध्याय में दिया गया है।
हमारे देश में सप्तबौद्ध सबसे ज्यादा प्रचलित थे यानि सात बुद्ध बहुत प्रचलित थे, जिसका ब्राह्मणीकरण करके नकली झूठी कहानी बना कर, कर दिया गया सप्तर्षि। सप्तबौद्ध को अजंता की गुफाओं में दिखाया गया है।
सप्तबौद्ध, अजंता एलोरा, साभार राजेन्द्र प्रसाद सिंह जी से प्राप्त
अब बात करते हैं नकली भगवानों की, इनका पहला भगवान बना ब्रह्मा यानि ब्राह्मण यानि भ्रम। यह एक ऐसा करैक्टर सोशल मीडिया पर प्रचारित है जिसके दिमाग से वासना रोगी होने की वजह से बेटी और पत्नि का अंतर समझ नहीं पाता है,गायत्री मंत्र इसी करैक्टर से संबंधित है। इन्होंने धर्म की उत्पत्ति इसी करैक्टर से जोड़ कर बताया है कि धर्म की शुरुआत ब्रह्मा से ही हुई थी, यह करैक्टर मोहम्मद से जुड़ा हुआ बताया जा सकता है चूंकि ब्रह्मा की तरह ही मोहम्मद ने अपनी बेटी से शादी की थी, यानि नकली धर्म या ब्रह्मा की आड़ में थोपा गया इस्लामीकरण। इस प्रकार से देखा जाए तो धर्म को इन्होंने माना है पांचवीं शताब्दी के बाद यानि इस्लाम की पैदाइश से जोड़कर। इससे पहले के बौद्ध इतिहास को दर्शाया गया है टुच्चता के साथ, जैसे प्राचीनतम पशुपति सील से जुड़े बुद्ध के लिए नीला टुच्चा शिव, शिव के पुत्र के रूप में गणेश यानि हाथी के सिर वाला जिसकी सवारी बताया गया चूहे को। मनोवैज्ञानिक रूप में द्वेषपूर्ण टुच्चता को दिखाया गया हमारी सभ्यता से जुड़े हुए इतिहास को, और शिव का छोटा पुत्र कार्तिकेय यानि मौर्य साम्राज्य जिसकी सवारी मोर है। यहां दर्शाया गया है कि चंद्रगुप्त मौर्य भी बौद्ध ही थे किसी नकली जैन धर्म से जुड़े नहीं थे।
असल में सांस को रोककर उसे खून में संचालित करने से ,उसे मांस में होने वाली गतिविधियों में ऊर्जा⚡ के उत्पादन को महसूस करने से चमार बना जाता है और ऐसा करने से मन काबू में हो जाता है जो विचारों की ऊर्जा दूसरों के बारे में ईर्ष्या इत्यादि में बर्बाद होती थी उस ऊर्जा⚡ से शरीर की गतिविधियां सुचारू करने में और ऊर्जा को शरीर पर ही लगा कर व्यय होने से बचाया जाता है। असल में चमार बनने की प्रक्रिया को लगातार मन से करने से मन पूरी तरह से अपने वश में आ जाता है और इससे किसी की भी बुद्धि को वश में किया जा सकता है ऐसा यूनानी हिन्दू ब्राह्मण ने कुछ किताबों में भी विवरण दिया है । नारायण दत्त श्रीमाली ने प्रैक्टिकल हिप्नोटिस्म में चमार बनने की थोड़ी सी प्रक्रिया का विवरण दिया है । इसी काल्पनिक ब्रह्मा की आड़ में ब्राह्मण ने चमार बनने की प्रक्रिया को करके भ्रम की स्थिति पैदा की और नकली भगवान पुजवाए, दूसरा भगवान बनाया इन्होंने शिव को, सिंधु घाटी के ही बुद्ध को छुपाने के लिए और भंगेड़ी करैक्टर के नाम पर नकली कहानियाँ फैलाने के लिए इन्होंने नाम दिया शिव। ब्राह्मण बुद्ध के स्तूपों का सच जानता था इसलिए उसने खुद को सिर से पैदा हुआ बताकर नकली कहानियों वाले धर्म ग्रंथों को लिखा, और मूलनिवासी बुद्ध के सिर के आकार वाली बौद्ध स्तूपों (छोटे मनौती स्तूप जिन्हें टुच्चे करैक्टर शिव का लिंग कहा) की सच्चाई को ना पहचान लें तो नकली शिव लिंग की कहानी बनाकर भ्रम फैलाया गया।
हमारी सभ्यता में बुद्ध पूर्ण सच्चाई की अवस्था होती है जिसको इन्होंने प्रचलित किया नीले रंग का चिड़न का प्रतीक,वैसे इसे बनाया गया था बुद्ध के इतिहास को और पूरे देश में बुद्ध की मूर्तियों को शिव जैसे लंपट करैक्टर की आड़ में छुपाने के लिए, और बुद्ध के विपरीत इसको भंगेड़ी गंजेड़ी बना कर प्रचलित किया गया । शमशान की राख मलकर नशे में पड़ा रहने वाला करैक्टर, असलियत में ब्राह्मण खुद ऐसा ही है इसलिए ही ऐसे चिड़न के प्रतीक की कल्पना की । हमारे बुद्ध तो मन के पूर्ण सत्य को जानने वाली श्रेष्ठ अवस्था को दर्शाते हैं देश में भगवान बुद्ध के स्तूप पूरे देश में पाए जाते हैं, इनमें बहुत से विशाल स्तूप भी हैं और छोटे मनौती स्तूप भी हैं । जब महान बौद्धों के स्तूपों को नष्ट कर दिया गया था परन्तु सांची का स्तूप आज भी बचा हुआ है,स्तूप यानि किसी भी बुद्ध की बुद्धि का प्रतीक । इसे ऐसे समझा जा सकता है
बौद्ध मनौती स्तूप ऐलिफैंटा केव्ज़, मुंबई
यह आकृति एक गंजे सिर की आकृति से हूबहू मिलती है
गंजे सिर की आकृति
अब ब्राह्मण ने मानसिक मनोरोगी स्थिति में इन स्तूपों को बना दिया शिव लंपट का लिंग, और एक नई कहानी प्रचलित कर दी गई, आखिर बुद्ध की बुद्धि के स्तूपों को शिव लंपट का लिंग बताने के पीछे क्या साजिश थी? असल में महान बौद्धों की असली ताकत है उनकी श्रेष्ठ बुद्धि, अब उस बुद्धि को लिंग पुजवा कर ध्यान को लिंग पर फंसाना था, कैसे? मनोवैज्ञानिक तौर पर एक लड़की से बचपन से ही लिंग पुजवा कर उसकी बुद्धि में वासना जगा दी गई, अब उसका ध्यान श्रेष्ठ लिंग पर लगा दिया गया, अब जब वह लड़की माँ बनेगी तो उसका ध्यान अपने बेटे की बुद्धि को महान बुद्ध की तरह श्रेष्ठ बनाने के बजाय उसे लिंग पर ध्यान आकर्षित करने की बुद्धि देती थी, ऐसे बालक वासना में फंस जाते थे और अपनी बुद्धि से श्रेष्ठ बनने के बजाए नकली भगवानों की तरह बनने की प्रेरणा लेते होंगे और फंसे मन की वजह से वासना पूर्ति में लग जाते थे। ऐसा मन मानसिक प्रेम से भी वंचित हो ही जाता और जो नकली धर्म का नकली टुच्चा सा भगवान ब्रह्मा वासुदेव बनाया गया था वह मनोवैज्ञानिक तौर पर मन को वासनात्मक करने के लिए ही बनाया गया था, और वासना की वजह से अतृप्त होने की वजह से चिड़चिड़ापन बना रहता हैं (जो मूलनिवासी स्त्रियाँ नकली धर्म को पूज रही होती हैं वे इसी पशोपश में पड़ी रहती है कि उनके बच्चे पढा़ई में अच्छे क्यों नहीं हैं?) चिड़न और वासना से व्याकुल मन पढाई और मन के विचारों को वश में करने में नहीं लगता है और वासना तृप्ति में ही लगा रहता है। संतुष्टि मन में होती है विचारों में होती है परंतु लिंग पूजवाने वाले ब्राह्मण ने नकली धर्म से समाज में वासनात्मक विचार पैदा किए और इसी को श्रद्धा का नाम दिया गया। चिड़चिड़ापन बौद्ध बुद्धि के अनुसार तृष्णा है जो शिव राम कृष्ण जैसे नीले रंग के चिड़चिड़े करैक्टर को पूजने से और लिंग पूजने से पत्नी अपने पति में क्या देखती होगी? शिव होने की सोच पैदा करती है तो उसका पति दिखाई देता है शिव जैसा चिड़चिड़ा(स्त्री अपनी ही ऊर्जा से शिव जैसा होने की कामना अपने पति के लिए पति को चिड़चिड़ा देखने का नजरिया बना लेती है),यह चिड़चिड़ापन जो एक पत्नी अपने पति में देख रही है वह स्वभाविक है उनकी संतान में भी जाएगी और बच्चा भी नकली धर्म पूजने की वजह से मां को चिड़चिड़ा दिखाई देने लगेगा और वह अपने बच्चे से भी चिड़चिड़ा व्यवहार करेगी जिससे बच्चे के मन में स्वयं की माँ के चिड़न वाले व्यवहार की एक वैचारिक सोच भी बन जाएगी। ऐसा बच्चा अपने स्त्रियों के प्रति रिश्तों में कभी कभी मां के व्यवहार का असर महसूस कर सकता है जिससे उसके रिश्तों में चिड़न का भाव दिखाई देता रहेगा। कई बार ऐसा देखा गया है पति पत्नी के बीच कुछ ऐसे तुच्छ सी बातों में चिड़न बीच में आती है जो ईगो यानि अहंकार को बढावा देती है। इस प्रकार का चिड़चिड़ापन बुद्धि का सर्वश्रेष्ठ उपयोग नहीं होने देता है और अहंकार यानि ईगो को बढ़ाता है और यह ईगो ही बिमारियों की जड़ बनती है ऐसा मन आविष्कार नहीं कर सकता है, श्रेष्ठ तरीके से पढा़ई नहीं कर सकता है और वासना रोगी होने की वजह से स्त्री के मन को संतुष्ट करने के लिए सिर्फ वासना का शिकार बनता रहता है ,यही है ब्राह्मण मानसिक मनोरोगी का मनोवैज्ञानिक अपराध जिसमें श्रेष्ठ बौद्ध मूलनिवासी स्त्रियों को हवस का शिकार बनाने के लिए नकली धर्म का चोला पहनाकर भ्रमित कर वासनात्मक और चिड़चिड़ापन का नजरिया दिया। आजकल लिंग, जिसे पहले (phallus worship) एनसीईआरटी (NCERT) की 1980- 1990 की किताबों में लिंग यानि शिशिन पढा़या गया है उसे ये अब भ्रमित करने के लिए नया शिगूफा निकाल कर लाये है, लिंग यानि चिन्ह। चोर की चोरी पकड़ी गई तो भ्रमित करने के लिए नये मतलब निकाल कर फैलाना शुरु, क्या इससे नकली धर्म वाले टुच्चे कहलाने से बच पाएंगे। इसीलिए झूठ फैलाने वाली सुषमा और जेटली मानसिक अपंग स्थिति में आकर मूलनिवासियों से ही इलाज करवाते दिखाई दिए। चूंकि मन के अंदर सनातन का सड़ातन असर जो पैदा हो रहा था।
मन में बुद्ध जैसा होने की कामना बुद्धि को श्रेष्ठता की तरफ लेकर जाती है तृष्णा मुक्त करती है मन को वश में करती है, परन्तु चिड़चिड़ा शिव और लिंग मन को क्या देंगे? इसलिए अंग्रेजों ने भारतवर्ष का धन लूटकर सिर्फ ड्रेन आफ वैल्थ किया था, परन्तु हिन्दू ब्राह्मण ने नकली धर्म बनाकर, नकली कहानियों का भ्रम फैलाकर ड्रेन आफ ब्रेन भी किया और उसकी आड़ में मूलनिवासी बौद्ध मंदिर को कब्जा कर उनकी अपार संपदा की बुद्ध की बुद्धि स्तूपों को भी दबाकर रखा और मूलनिवासी मंदिरों के सोने को भी मूलनिवासियों से दूर किया। इसीलिए बुद्ध मंदिरों में शूद्र का जाना वर्जित किया गया था मानसिक मनोरोगी स्थिति में ताकि मूलनिवासी बुद्ध और बौद्धता को पहचान कर सत्य को महसूस कर लेंगे तो सब अपने हाथों में ले लेंगे। आज सारे प्राचीन बौद्ध मंदिरों को और बौद्ध स्तूपों को नकली धर्म के हिन्दू ब्राह्मणों से मुक्त करा कर उनका शुद्धिकरण किया जाना आवश्यक है। इन्होंने सिंधु घाटी की सभ्यता में प्राप्त सील पर अंकित पशुपति यानि प्राचीन बुद्ध को कहा है शिव और उस संपूर्ण श्रेष्ठ बौद्ध को नीले रंग का चिड़चिड़ा भंगेड़ी गंजेड़ी दिखा कर प्रस्तुत किया गया गीता प्रेस गोरखपुर के सस्ते टुच्चे साहित्य से। इसकी एक संतान को पार्वती के मैल से उत्पन्न संतान बताया (यानि गंदगी से पैदा बताने की टुच्चता की गई) जिसे नाम दिया गणेश और इस करैक्टर को बौद्ध इतिहास के गणपति नाम को भी दे दिया, मनोवैज्ञानिक तौर पर गणेश के सिर पर हाथी का सिर बिठाना यानि गणेश हाथी के दिमाग वाला मंदबुद्धि है जिसकी सवारी है चूहा , मन की कुंठित सोच देखिए हिन्दू ब्राह्मण की खुद बुद्धि में मूलनिवासी बौद्धों की बराबरी नहीं कर सकता है तो नकली धर्म ही बना दिया और हमारे महान पूर्वजों की पदवी को ऐसे टुच्चे करैक्टर से जोड़ रहा है। वैसे हिन्दू ब्राह्मण साजिश करने का आदी है चूंकि राम के रूप में शुंग और कृष्ण यानि वासुदेव ये दोनों साजिशों वाले ब्राह्मण बताए गए हैं, और वह जानता है कि मानसिक मनोरोगी स्थिति में उसकी औलाद में भी साजिश करने की टुच्चता जरूर पैदा होगी तो गणेश शिव की औलाद है और शिव ब्राह्मण का बनाया गया करैक्टर है यानि ब्राह्मण शिव है जो नशे का आदि है तो गणेश उसकी औलाद है तो आज से ही हाथी के सिर वाला मंदबुद्धि हिन्दू ब्राह्मण ही पैदा हो और बुद्धि से ठस्स हो तो देश में साजिशें नहीं करेगा, ऐसा नकली धर्म ब्राह्मण के बच्चों के ही सिर पर ही बैठा रहे तो बेहतर है। शिव की एक औलाद है कार्तिकेय जिसकी सवारी है मोर, मोर को मौर्यों से जोड़ा है( यानि बौद्ध इतिहास से जुड़ते हुए मौर्य) यानि बौद्ध इतिहास को नकली धर्म की आड़ में वासनात्मकता का नकली झूठा इतिहास बताया गया था। जिसमें महान इतिहास को कुंठित होकर टुच्चता से दर्शाया गया। इसी प्रकार से एक करैक्टर बनाया है राम, राम को कुछ नहीं मालूम कि हिरण असली है या नकली बस उसे मारने निकल पड़ा, यानि नकली भगवान बनाया गया जिसकी बुद्धि ठस्स है। वैसे राम को इतिहास में पुष्यमित्र शुंग से जोड़ कर भी देखा गया है और यह सत्यता आज सोशल मीडिया पर बहुत प्रचलित हुई है। जो मौर्य वंश के बाद आखिरी मौर्य राजा को मारकर राजा बना और अल्पायु में ही मर गया।
अब असली भगवान यानि बुद्ध को समझते हैं तो बुद्ध एक ऐसी अवस्था है जिसमें हर सत्य का बुद्ध को पता होता है। सोचो कहाँ ये नकली धर्म और नकली करैक्टर और कहाँ हमारे पूर्ण सत्य के ज्ञाता बुद्ध। जो अपने मन से ही हर सत्य से अवगत हों।
वैसे नकली धर्म का लक्ष्य था वर्ण व्यवस्था यानि जो महान भग्न अवस्था प्राप्त करने वाले भंगी होते थे जिनका जुड़ाव भगवान शब्द से है उन्हें नकली धर्म से सफाई कर्मचारियों की श्रेणी में रखा गया और असली धम्म का लक्ष्य होता था निर्वाण यानि पूर्ण सत्य की प्राप्ति जो महान मूलनिवासियों को पैदाइशी प्राप्त है। यह पूरा नकली धर्म मूलनिवासियों के महान इतिहास को और श्रेष्ठ बौद्धिक संपदा को और बुद्ध को अपमानित करता है जो कि क्रिमिनल क्राइम की श्रेणी में आता है।
देश में महान मूलनिवासियों का असली इतिहास को लिखा जाना और पढ़ाया जाना जरूरी है ताकि मूलनिवासी बच्चे गर्वित होकर अपना इतिहास जान सकें, पहला मुद्दा मूलनिवासियों की सरकार बनाने का कि असली इतिहास को बचपन से पढाया जाना और केन्द्रीय पाठ्यक्रम में असली इतिहास ही बच्चों को दिया जाना।
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