क्या है ऊंच नीच, मन की शांति कहां है?

                क्या है ऊंच नीच, मन की शांति कहां है?
ब्राह्मणों ने बुद्ध को भगवान माना है, और गौतम बुद्ध ने सभी इंसानों को समान माना है, तो जब ब्राह्मण बौद्धों को अपने भगवान स्वरूप मान रहा है पैर धो कर पीने को तैयार है तो तुम्हे बौद्ध बन कर रहने में क्या जाता है, बस इतना ध्यान रहे जब ब्राह्मण पैर धो कर पिए तो उसे आशीर्वाद जरूर देना।सदियों से ब्राह्मण तुम्हारे चरणों में आने को व्याकुल है, सब जानते हैं कि ब्राह्मण विदेशी है और उसके वहां के समाज में चतुर्वण व्यवस्था थी जिसमें वे शायद किसी नीच कुल से belong करते रहे हो और यहां आ कर भी इन्हे सेवादार ही बनाया गया था परंतु एक राजा ब्रहदरथ का सेनापति बन कर विश्वास घात कर गया।  मौर्यकालीन युग में बौद्ध धर्म सबसे ज्यादा flourish था देश में संपूर्ण शांति थी और देशवासी संर्पूणता को प्राप्त थे,  चूंकि ब्राह्मण विदेशी था इसलिए देश प्रेम जैसी कोई भावना तो थी नहीं तभी मनुस्मृति जैसे ग्रन्थो का निर्माण किया गया और अपने को श्रेष्ठ लिखा, परन्तु श्रेष्ठता को ब्राह्मण ने गौतम बुद्ध की तरह प्राप्त नहीं किया था उसने तो विश्वासघात कर के अपने को सम्मानित करने की कोशिश की तो झूठ पर प्राप्त फरेब से ब्राह्मण की शांति नष्ट हो गई और झूठ की पुलिंदा मनुस्मृति की बनाई कब्र पर, जिन्हे आज का मंदिर कहा जा सकता है जिसमें कभी गौतम बुद्ध की मूर्ति स्थापित हुआ करती थी में अपने झूठे भगवान बना कर लगा दिए। अब इन मूर्तियों के आगे ये सुबह-शाम पूजा का आडंबर करते हैं परंतु सोचने वाली बात है कि झूठ से मन की शांति प्राप्त नहीं हुआ करती। शांति सच को स्वीकार कर बौद्धों के चरणों में आ कर ही प्राप्त होगी।
अब समाज को भी सत्य स्वीकार करना है कि यह देश बौद्ध देश है और इसी में देश की संपूर्णता है।
इतिहास गवाह है ब्राहणों ने अपनी संतुष्टि के लिए क्या क्या नहीं किया, मंदिरों में स्त्रियों को देवदासी बनाया, जिस से सोमनाथ मंदिर जैसी घटनाएं हुईं, हर बार देश को गुलाम बनाने में कोई कसर बाकी नहीं रही। इन्होने मूलनिवासी स्त्रियों पर कूदृष्टी रखी और विदेशियों ने इनकी बहू बेटियों पर।
       इन्होने मूलनिवासीयों को गुमराह कर गुलाम बनाया और विदेशियों ने इन्हें गुलाम बनाया।
आज की मोदी सरकार भी कुछ इसी प्रकार की हरकत करने जा रही है, reservation इत्यादि के साथ कुटिलता दिखा रही है जिससे फिर इनकी मानसिक शांति खत्म, और अभी ये development के लिए विदेशियों की तरफ भाग रहे हैं और विदेशियों से ही दुत्कारे जा रहे हैं।
    तो अब इन्हे शांति कहां प्राप्त होगी, बौद्धों के चरणों में, जिसके लिए मूलनिवासीयों को बौद्ध होना अति आवश्यक है।
नमो बुद्धाय
Tarunn Asaat

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