गौतम बुद्ध की शिक्षा का फायदा उठा कर ब्राह्मण ने अपने धर्म का निर्माण किया
विपश्यना गौतम बुद्ध का अष्टंगिका मार्ग है जिस से व्यक्ति अपने मन को समझ कर शुद्ध रखता है और स्वास्थ्य वर्धक खुशियों देने वाला प्रेम करने वाला संपूर्णता का जीवन जीता है।
योग तब किया जाता है जब मन बहुत सी complexity में फंस कर बीमारी की तरफ जाने लगता है तो शरीर के उस विकार को मिटाने के लिए किया जाता है। परन्तु योग मन की संपूर्णता नहीं देता वह सिर्फ शारीरिक विकारों से मुक्त करता है। मन बिमार रहेगा तो रोग फिर हो जाएगा।पर किसी और रूप में भी आ सकता है।
ब्राह्मण ने अपने को सर्वश्रेष्ठ जता कर बाकी वर्ग को अपना नौकर बना लिया। छत्रिय को बनाया मार काट करने के लिए।वह किसी को भी मार काटकर ब्राह्मणी राज स्थापित करता था परन्तु वह सम्राट अशोक की तरह मन से ग्रसित होता था तो ब्राह्मण उसे हटाकर दूसरा राजा बैठा देता था राजा स्वयं अष्टंगिका मार्ग पर नहीं चलता था जिससे उस के मन में विकार रह जाते थे और वह मानसिक रूप से बिमार हो कर रोगी हो जाता था, वह बोधिधर्मा की तरह स्व रक्षा के लिए बल प्रयोग नहीं करता था, इस प्रकार छत्रिय ब्राह्मण के द्वारा use किया जाता था। एक वर्ग को वैश्य बनाया मतलब वैश्या के माफिक। यह वर्ग अपना तन और मन बेचने का कार्य करता है सिर्फ धन पाने के लिए। धन बनाने के लिए यह वर्ग झूठ दमन चोरी या किसी भी गरीब का शोषण कर के प्राप्त करता था और जब गरीब की हाय से बीमार पढ़ता था तो मंदिरों का भगवान याद आता था और ब्राह्मण को धन चढ़ाता था, परन्तु स्वयं अष्टंगिका मार्ग पर नहीं चला इसलिए शील के अभाव में शारीरिक कमजोरी चिड़चिड़ापन बढने से मानसिक रूप से बिमार हो कर भगवान भगवान करने लगा।सबसे ज्यादा मनोरोगी इसी वर्ग से है। सत्य नारायण गोयनका भी इसी वर्ग में आते थे।
शूद्र वर्ग को गलत सही के मनोभाव में फंसाया। जो बौद्ध शीलवान चरित्रवान हुआ करते थे उन्हें पहले पढाई लिखाई से दूर किया गया फिर ध्यान लगाने से रोका गया इस प्रकार शूद्र को मानसिक गुलाम बनाया।
यह है ब्राह्मणी समाज जिसमें शीलवान और चरित्रवान कोई नहीं है। ब्राह्मण के झूठ बोलने का तरीका भी ब्राह्मण ग्रंथो में दिया है। अश्वत्थामा मारा गया किन्तु हाथी। आयूर्वेद और योग का निर्माण तभी हुआ जब शील एवं चरित्र का ह्रास हुआ।
सिर्फ बौद्ध समाज ही शील एवं चरित्र का निर्माण करता है। बौद्ध चरित्र व्यक्ति ही संपूर्ण है।
नमो बुद्धाय
तरुण असात
विपश्यना गौतम बुद्ध का अष्टंगिका मार्ग है जिस से व्यक्ति अपने मन को समझ कर शुद्ध रखता है और स्वास्थ्य वर्धक खुशियों देने वाला प्रेम करने वाला संपूर्णता का जीवन जीता है।
योग तब किया जाता है जब मन बहुत सी complexity में फंस कर बीमारी की तरफ जाने लगता है तो शरीर के उस विकार को मिटाने के लिए किया जाता है। परन्तु योग मन की संपूर्णता नहीं देता वह सिर्फ शारीरिक विकारों से मुक्त करता है। मन बिमार रहेगा तो रोग फिर हो जाएगा।पर किसी और रूप में भी आ सकता है।
ब्राह्मण ने अपने को सर्वश्रेष्ठ जता कर बाकी वर्ग को अपना नौकर बना लिया। छत्रिय को बनाया मार काट करने के लिए।वह किसी को भी मार काटकर ब्राह्मणी राज स्थापित करता था परन्तु वह सम्राट अशोक की तरह मन से ग्रसित होता था तो ब्राह्मण उसे हटाकर दूसरा राजा बैठा देता था राजा स्वयं अष्टंगिका मार्ग पर नहीं चलता था जिससे उस के मन में विकार रह जाते थे और वह मानसिक रूप से बिमार हो कर रोगी हो जाता था, वह बोधिधर्मा की तरह स्व रक्षा के लिए बल प्रयोग नहीं करता था, इस प्रकार छत्रिय ब्राह्मण के द्वारा use किया जाता था। एक वर्ग को वैश्य बनाया मतलब वैश्या के माफिक। यह वर्ग अपना तन और मन बेचने का कार्य करता है सिर्फ धन पाने के लिए। धन बनाने के लिए यह वर्ग झूठ दमन चोरी या किसी भी गरीब का शोषण कर के प्राप्त करता था और जब गरीब की हाय से बीमार पढ़ता था तो मंदिरों का भगवान याद आता था और ब्राह्मण को धन चढ़ाता था, परन्तु स्वयं अष्टंगिका मार्ग पर नहीं चला इसलिए शील के अभाव में शारीरिक कमजोरी चिड़चिड़ापन बढने से मानसिक रूप से बिमार हो कर भगवान भगवान करने लगा।सबसे ज्यादा मनोरोगी इसी वर्ग से है। सत्य नारायण गोयनका भी इसी वर्ग में आते थे।
शूद्र वर्ग को गलत सही के मनोभाव में फंसाया। जो बौद्ध शीलवान चरित्रवान हुआ करते थे उन्हें पहले पढाई लिखाई से दूर किया गया फिर ध्यान लगाने से रोका गया इस प्रकार शूद्र को मानसिक गुलाम बनाया।
यह है ब्राह्मणी समाज जिसमें शीलवान और चरित्रवान कोई नहीं है। ब्राह्मण के झूठ बोलने का तरीका भी ब्राह्मण ग्रंथो में दिया है। अश्वत्थामा मारा गया किन्तु हाथी। आयूर्वेद और योग का निर्माण तभी हुआ जब शील एवं चरित्र का ह्रास हुआ।
सिर्फ बौद्ध समाज ही शील एवं चरित्र का निर्माण करता है। बौद्ध चरित्र व्यक्ति ही संपूर्ण है।
नमो बुद्धाय
तरुण असात
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