What is the need of law?
कमजोर को न्याय देने के लिए
क्या मनुस्मृति न्याय देती है?
वह किसी को न्याय नहीं देती कैसे?
ब्राह्मण को लगता है कि वह उसे शीर्ष पर पहुँचने में सहायता करती है पर यह भी ब्राह्मण की मूर्खता का परिचय देती है। ब्राह्मण ने मनुस्मृति में जो घालमेल किया है उस से ब्राह्मण का विश्व को परिचय जाता है धूर्तता का और धूर्त इंसान मन ही मन कटुता से भरा होता है। कटु मन रिश्तों में चिड़न रखता है। चिड़ा हुआ मन किसी को भी संतुष्ट नहीं रख सकता और ब्राह्मण के द्वारा बनाए गए हिन्दू धर्म के नाम पर देश के मूलनिवासियों को वैश्या शूद्र बना कर धूर्तता को परोसना। अब इन धूर्तों से कोई क्या सीखेगा। इसलिए शुद्ध तो बौद्ध जैन सिख होते हैं पर हिन्दू के नाम पर ब्राह्मणवाद कभी नहीं।
वैश्यों को ये धर्म वैश्या की सोच देता है, वैश्या धन के लिए अपने तन और मन का सौदा करता है और धन के लिए वह किसी के साथ कितना भी दुर्व्यवहार कर सकता है और अपनी मानवता को सूली पर चढ़ा देता है जिससे उसका मन विक्षिप्त हो जाता है। इस प्रकार का मन अत्यधिक असंतुष्ट रहता है फिर वह संतुष्टि के लिए ब्राह्मण के बनाए हुए भगवान को चढ़ावा चढ़ाता रहेगा पर धूर्तता से भरा मन संतुष्टी देगा क्या?
जिसके पास स्वयं संतुष्टी नहीं वह दूसरे को क्या देगा वह तो मन ही मन उसके द्वारा चढ़ाए गए चढ़ावे को ही देखता रहेगा और उसकी मूर्खता पर हंसता रहेगा। रही बात शूद्र की भला फ्री फंड का गुलाम किस को बुरा लगता है इसीलिए तो ब्राह्मण ने यह वर्ण व्यवस्था बनाई थी नहीं तो ब्राह्मण को पता है उसे झाडू मारने का काम ही मिलेगा।
दो प्रकार के ज्ञान हैं एक बौद्ध ज्ञान जो बुद्धि से प्राप्त है और दूसरा ब्रह्म ज्ञान या भ्रम ज्ञान या ब्राह्मण का ज्ञान।
बौद्ध ज्ञान बुद्धि से कसौटी पर खरा ज्ञान है और ब्राह्मण ज्ञान भ्रम पर आधारित ज्ञान है जैसे भूत, आत्मा इत्यादि का भ्रम। बौद्ध ज्ञान से संपूर्ण संतुष्टी प्राप्त होती है वहीं ब्राह्मण ज्ञान से भ्रम का ज्ञान, तो अब मर्जी आपकी चूँकि मन है आपका।
नमो बुद्धाय
तरुण असात
कमजोर को न्याय देने के लिए
क्या मनुस्मृति न्याय देती है?
वह किसी को न्याय नहीं देती कैसे?
ब्राह्मण को लगता है कि वह उसे शीर्ष पर पहुँचने में सहायता करती है पर यह भी ब्राह्मण की मूर्खता का परिचय देती है। ब्राह्मण ने मनुस्मृति में जो घालमेल किया है उस से ब्राह्मण का विश्व को परिचय जाता है धूर्तता का और धूर्त इंसान मन ही मन कटुता से भरा होता है। कटु मन रिश्तों में चिड़न रखता है। चिड़ा हुआ मन किसी को भी संतुष्ट नहीं रख सकता और ब्राह्मण के द्वारा बनाए गए हिन्दू धर्म के नाम पर देश के मूलनिवासियों को वैश्या शूद्र बना कर धूर्तता को परोसना। अब इन धूर्तों से कोई क्या सीखेगा। इसलिए शुद्ध तो बौद्ध जैन सिख होते हैं पर हिन्दू के नाम पर ब्राह्मणवाद कभी नहीं।
वैश्यों को ये धर्म वैश्या की सोच देता है, वैश्या धन के लिए अपने तन और मन का सौदा करता है और धन के लिए वह किसी के साथ कितना भी दुर्व्यवहार कर सकता है और अपनी मानवता को सूली पर चढ़ा देता है जिससे उसका मन विक्षिप्त हो जाता है। इस प्रकार का मन अत्यधिक असंतुष्ट रहता है फिर वह संतुष्टि के लिए ब्राह्मण के बनाए हुए भगवान को चढ़ावा चढ़ाता रहेगा पर धूर्तता से भरा मन संतुष्टी देगा क्या?
जिसके पास स्वयं संतुष्टी नहीं वह दूसरे को क्या देगा वह तो मन ही मन उसके द्वारा चढ़ाए गए चढ़ावे को ही देखता रहेगा और उसकी मूर्खता पर हंसता रहेगा। रही बात शूद्र की भला फ्री फंड का गुलाम किस को बुरा लगता है इसीलिए तो ब्राह्मण ने यह वर्ण व्यवस्था बनाई थी नहीं तो ब्राह्मण को पता है उसे झाडू मारने का काम ही मिलेगा।
दो प्रकार के ज्ञान हैं एक बौद्ध ज्ञान जो बुद्धि से प्राप्त है और दूसरा ब्रह्म ज्ञान या भ्रम ज्ञान या ब्राह्मण का ज्ञान।
बौद्ध ज्ञान बुद्धि से कसौटी पर खरा ज्ञान है और ब्राह्मण ज्ञान भ्रम पर आधारित ज्ञान है जैसे भूत, आत्मा इत्यादि का भ्रम। बौद्ध ज्ञान से संपूर्ण संतुष्टी प्राप्त होती है वहीं ब्राह्मण ज्ञान से भ्रम का ज्ञान, तो अब मर्जी आपकी चूँकि मन है आपका।
नमो बुद्धाय
तरुण असात
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