ब्राह्मण गुलामी की सोच को पैदा करने वाला

ब्राह्मण गुलाम सोच से पैदा हुआ है। यह अत्यधिक क्रोध या ego का मारा है। इसने सदैव चाकरी ही करी है पहले मुस्लिम शासकों की फिर मुगलों की और फिर अंग्रेज़ों की।नौकर सोच से पैदा ब्राह्मण एक अच्छा नौकर तो हो सकता है पर तृष्णा से मुक्त होने का मार्ग बौद्ध के पास है। मूलनिवासी बौद्ध मुक्त सोच के साथ पैदा होते हैं वे तृष्णा से भी पूर्णत:  मुक्त हैं।
ब्राह्मण वादी तन्त्र मंदिर इत्यादि पूर्णतया तृष्णा पैदा करने वाले हैं। देवदासी प्रथा यही दर्शाती है। ब्राह्मणवादियों ने सोचा कि बौद्ध तृष्णा से इसलिए मुक्त हो जाते हैं क्योंकि वे गौतम बुद्ध की पूजा करते हैं इसलिए उन्होंने किस्म किस्म के भगवान बना कर पूजने शुरू कर दिए पर उस समय के बौद्ध  विपश्यना शुरू करने से पहले गौतम बुद्ध को gratify या धन्यवाद देने के लिए उनकी स्तुति किया करते थे और इन मूर्ख ब्राह्मणों ने उस स्तुति को तृष्णा से मुक्ति का मार्ग समझ लिया परन्तु तृष्णा से मुक्ति तो विपश्यना से संभव है जिससॆ अपने विचार स्वयं के लिए और दूसरों के लिए पढ़ना दूसरों के विचारों को पढ़ना समझना और स्वयं को सभी प्रकार के विचारों से मुक्त करके अपनी बुद्धि को उस आवश्यक विचार को प्रबल करना जो मनुष्यता के लिए आवश्यक है जैसी बुद्धिमता को बढ़ावा दे सकते हैं। अब कोई अगर यह जानने के बाद भी ब्राह्मणवादियों के मंदिरों में जा कर तृष्णा से मुक्त होने का सोचता है तो यह उसकी अज्ञानता के साथ साथ हास्यास्पद भी हो जाता है।
   परन्तु इन मूर्ख ब्राह्मणों ने अपनी ego की खातिर पहले तो विश्व के सबसे बुद्धिमान अहिंसक बौद्धों का नरसंहार कर के देश में अराजकता का माहौल पैदा कर दिया फिर उन्हें गुलाम बनाने के लिए वैश्या शूद्रा वाली कहानी बना डाली। अपनी ego के लिए मुस्लिम शासकों को देश पर राज करने के लिए न्योता दिया फिर उन्हें अपनी बहन बेटियाँ दे कर चापलूसी की।
          एतिहासिक दृष्टिकोण से और archiological survey of India के अनुसार ब्राह्मण धर्म का विकास ही 10 वीं शताब्दी के बाद से ही हुआ है यानी Delhi sultanat और मुगल काल में। यह साफ दर्शाता है कि ब्राह्मण वाद के विकास का कारण मुस्लिम काल है जिसमें ये सबसे बड़े चापलूस के रूप में उभर कर आए और ब्राह्मण वाद ने ही देश के बौद्धिक इतिहास को मिटाने का कार्य करते हुए मुगलों और दिल्ली सुलतानों की चापलूसी करते हुए मूलनिवासियों पर अपनी हुकूमत स्थापित की। इस काल में मूलनिवासियों को वैश्या व शूद्र बना कर उन्हें पढ़ने लिखने और विपश्यना इत्यादि से रोका। दिल्ली सुलतानों के काल में ही हमारी बौद्धिक नालंदा विश्वविद्यालय का विनाश किया गया।
देश ब्राह्मण वादियों की इन हरकतों को कभी माफ नहीं करेगा

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