प्रेम और वासना में क्या फर्क है?
बौद्धिक प्रेम सत्यता से प्रेम को समझता है। प्रेम जो मन से मन को समझे।
वासना ब्राह्मणवादी सोच है। जैसे आसाराम जिस स्त्री की तरफ आकर्षित हुआ उसे वासनात्मक रूप से पाने में लग गया। पर प्रेम को प्राप्त करने से बहुत दूर रहा।
जो व्यक्ति प्रेम को प्राप्त कर लेता है उसे वासना छू भी नहीं सकती। अब वह किसी भी नग्नता से मुक्त होगा ।पर अगर वह मंदिरों में आता जाता है तो उसके मन में फिर से वासना जाग जाएगी वह वासना में लिप्त हो जाएगा।
मैं जब छोटा था तो विचारों से ब्राह्मणवादी व्यवस्था अनुसार मंदिरों में आना जाना रहता था वहाँ से कृष्ण बनने की सोच पैदा हुई जिसने वासना का रूप ले लिया मन में सिर्फ यही विचार पैदा होने लगे। फिर इन विचारों से मुक्त होने के लिए किताब से पढ़ कर विपश्यना की ,वासना से मन मुक्त हुआ और प्रेम को समझने में आसानी हुई।
वासना से मुक्त होने के लिए हर बच्चे को मंदिर छोड़ कर बौद्धिक विपश्यना सीखना है ताकि मन से प्रेम की प्राप्ति हो सके।पढ़ें ब्राह्मण वासना में लिप्त वीरेन्द्र दीक्षित। अब इस व्यक्ति की सोच में कृष्ण बनने का भाव था। इस वासना से भरे व्यक्ति के मन मे 16000 स्त्रियों को अपने वश में करना था। परन्तु क्या इसने प्रेम को प्राप्त किया? यह वासना से भरा रहा। इस प्रकार के ब्राह्मणवादी सोच के विक्षिप्त विचारों से भरे ब्राह्मण समाज के लोग देश को क्या देंगे।इन वासना से भरे ब्राह्मणों ने हिन्दू बन कर पूरे समाज को वासना से लिप्त अपने विचार समाज पर थोपने का काम किया। इसीलिये इन्होंने देवदासी बनाने की प्रथा चालू की थी। अब समय आ गया है कि इस विक्षिप्त मानसिकता के ब्राह्मण धर्म से देश को मुक्त होकर बुद्धि के विकास वाले धम्म, बौद्ध धम्म का विकास करें।
https://www.google.co.in/url?sa=t&source=web&rct=j&url=http://www.brahmakumaris.info/forum/viewtopic.php%3Ff%3D21%26t%3D1043&ved=0ahUKEwjHh_-alZ3YAhXMN48KHRynDf8QFgg6MAY&usg=AOvVaw1L_PSFKrGYBOQxSNfm-HhC
तरूण असात
बौद्धिक प्रेम सत्यता से प्रेम को समझता है। प्रेम जो मन से मन को समझे।
वासना ब्राह्मणवादी सोच है। जैसे आसाराम जिस स्त्री की तरफ आकर्षित हुआ उसे वासनात्मक रूप से पाने में लग गया। पर प्रेम को प्राप्त करने से बहुत दूर रहा।
जो व्यक्ति प्रेम को प्राप्त कर लेता है उसे वासना छू भी नहीं सकती। अब वह किसी भी नग्नता से मुक्त होगा ।पर अगर वह मंदिरों में आता जाता है तो उसके मन में फिर से वासना जाग जाएगी वह वासना में लिप्त हो जाएगा।
मैं जब छोटा था तो विचारों से ब्राह्मणवादी व्यवस्था अनुसार मंदिरों में आना जाना रहता था वहाँ से कृष्ण बनने की सोच पैदा हुई जिसने वासना का रूप ले लिया मन में सिर्फ यही विचार पैदा होने लगे। फिर इन विचारों से मुक्त होने के लिए किताब से पढ़ कर विपश्यना की ,वासना से मन मुक्त हुआ और प्रेम को समझने में आसानी हुई।
वासना से मुक्त होने के लिए हर बच्चे को मंदिर छोड़ कर बौद्धिक विपश्यना सीखना है ताकि मन से प्रेम की प्राप्ति हो सके।पढ़ें ब्राह्मण वासना में लिप्त वीरेन्द्र दीक्षित। अब इस व्यक्ति की सोच में कृष्ण बनने का भाव था। इस वासना से भरे व्यक्ति के मन मे 16000 स्त्रियों को अपने वश में करना था। परन्तु क्या इसने प्रेम को प्राप्त किया? यह वासना से भरा रहा। इस प्रकार के ब्राह्मणवादी सोच के विक्षिप्त विचारों से भरे ब्राह्मण समाज के लोग देश को क्या देंगे।इन वासना से भरे ब्राह्मणों ने हिन्दू बन कर पूरे समाज को वासना से लिप्त अपने विचार समाज पर थोपने का काम किया। इसीलिये इन्होंने देवदासी बनाने की प्रथा चालू की थी। अब समय आ गया है कि इस विक्षिप्त मानसिकता के ब्राह्मण धर्म से देश को मुक्त होकर बुद्धि के विकास वाले धम्म, बौद्ध धम्म का विकास करें।
https://www.google.co.in/url?sa=t&source=web&rct=j&url=http://www.brahmakumaris.info/forum/viewtopic.php%3Ff%3D21%26t%3D1043&ved=0ahUKEwjHh_-alZ3YAhXMN48KHRynDf8QFgg6MAY&usg=AOvVaw1L_PSFKrGYBOQxSNfm-HhC
तरूण असात
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