जो सनातन को समान बताते हैं

सब हिन्दू या सनातनी एक ही हैं और समान हैं तो आज से और अभी से पांडे, मिश्रा, द्विवेदी, त्रिपाठी, त्रिवेदी, शर्मा, पात्रा जावड़ेकर, दूबे, चौबे, चक्रवर्ती, उपाध्याय, मंगेशकर, गौतम, शुक्ल, शुक्ला,पराशर, पाठक, गौड़, गोड़से
    इत्यादि सरनेम वालों को देश दलित सोच का मानेगा, दलित कहेगा और इन्हें दलित ही बोलेगा।
अगर इन सरनेम वाले लोगों को दलित कहलाने में कोई आपत्ति है तो ये सनातनी को बांटना चाहते हैं।ये देशद्रोही हैं। ये समाज को एक सूत्र मे नहीं होने देना चाहते हैं। तो ये नीच सोच के हैं। हमारे देश में भगवान उन मनुष्यों को कहा जाता था जो तृष्णा लोभ वासना से मुक्त होते हैं पर ब्राह्मण की दलित भीख और अनुदान पाने की सोच ने झूठे नामों से नकली भगवान पैदा कर भीख मांगने का प्रचलन पैदा किया।
दलित शब्द ब्राह्मण की दलित सोच की देन है। जिससॆ ब्राह्मण की दलित सोच जिसे वह ब्रह्म ज्ञान कहता है जग जाहिर होती है। ब्रह्म ज्ञान कुछ और नहीं सिर्फ दलित सोच है जो सिर्फ ब्राह्मण की ही है।

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