जो अपने को हिन्दू मानते हैं और ब्राह्मण नहीं हैं

ब्राह्मण की वर्णव्यवस्था पूरी मानसिक मनोविज्ञान का खेल है जिसे साधारण मानसिकता से समझ पाना आसान नहीं है। इसके लिए अपने बुद्धत्व को जगाना होगा।
 गौतम बुद्ध ने कहा है आपके बचपन से जैसे विचार आपके मन में होंगे आप वैसे ही बन जाएंगे।
बचपन से ही बच्चे के मन में वर्णव्यवस्था कूट कूट कर भरी जाती है। अब ब्राह्मण के लड़के के मन में यह डाला जाता है कि वर्णव्यवस्था में तू शीर्ष पर है।अब वह सोचता है मैं शीर्ष पर हूँ वह अपने मन की सोच से positive बना रहता है। बाकी पिछलग्गू वर्ग को शीर्ष पर पहुँचने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है। देश में आजादी के बाद से शीर्ष के पद पर हमेशा से जो लोग रहे हैं यह समझा जा सकता है।पर मूर्ख ब्राह्मण अपनी बुद्धि का स्तर उठाने के बजाय इस मानसिक प्रतिरोध में लगा रहा जिससे उसने सबके मन को बांधने का तो प्रयास किया और खुद का ही ह्रास करता रहा।
  जो अपने को हिन्दू नहीं मानते और वर्णव्यवस्था से मुक्त हैं उन्हें इस मानसिक भेदभाव से मुक्ति मिलती है।
 जो अपने को बौद्ध मानते हैं मतलब वे बुद्ध की विचारधारा से प्रेरित हैं। ये लोग अपने विचारों में संपूर्ण हैं  और इनके बच्चे भी इस संपूर्णता का लाभ लेते हैं। सबसे बड़ी बात बौद्ध वर्चस्ववादी प्रतिस्पर्धा से मुक्त होते हैं उन्हें अपने मन की क्षमताओं को बढाने की कला आती है वे अपने स्वयं के मन को शीर्ष पर रखते हैं।

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