ब्राह्मण मानसिक टुच्चास्थिति के नकली धर्म से शरीर पर नुकसान
शिव नामक नीले रंग के टुच्चे करैक्टर को भगवान कहकर भंगेड़ी नशेड़ी का होने को अच्छा दिखाया जबकि इस आदत से शरीर पर उलटा प्रभाव पड़ता है, नीले रंग की वजह से मानसिक सोच बनाई गई कि शिव को पूजने वाला चिड़न का शिकार हो कर लिंग पर ध्यान लगाए रहे, ताकि बुद्धि को श्रेष्ठ बनाने के बजाय वासना रोगी हो कर चिड़न करता रहे, चिड़न से मन और मन के प्रतिक्रिया करने से शरीर प्रतिक्रिया करता है, इससे सबसे पहले चिड़न पैदा होती है फिर मन में विचार रुकते हैं, फिर गुस्सा पैदा होता है और इसके बाद उस गुस्से के बाद डर पैदा होता है, और ये सब शरीर में विकार पैदा करते हैं, इगो या चिड़न करने से thyroid stimulating hormone बढ़ सकता है और इसका असर sugar बढ़ना इत्यादि होता है, यानि एक ईगो या चिड़न आगे बढ़कर बिमारी का रूप लेती है, वहीं बौद्ध मन बहुत ही शांत होता है और हर प्रकार की मानसिक चिड़न से मुक्त होता है, अपनी बुद्धि की शरण में जाकर हर चिड़न इत्यादि का निवारण होता है, परन्तु सबसे पहले नकली धर्म से बाहर आना जरूरी है फिर मन को बुद्धि और बुद्ध की शरण में लेजाकर अपने मन को मुक्ति के मार्ग पर आगे बढाते हुए मन हर बिमारी से मुक्त हो जाता है
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