भारत में बौद्ध पाली प्राकृत भाषा में नकली धर्म वालों की घुसपैठ

Chapter V


शब्दों का उचित ज्ञान और शब्द मनोविज्ञान

शब्दों का उचित ज्ञान और उनका सही इस्तेमाल करना आना बहुत आवश्यक है। शब्द मन में पैदा ऊर्जा⚡ के साथ बंधकर पूरे वातावरण में फैल जाते हैं और दूसरे के मन में स्थापित किये जाते हैं। अगर मन के विचार किसी के मन तक पहुंचाने हों तो वो भी मन की ऊर्जा की तरंग (wave) के रूप में पहुंचाए जाते हैं, इसी को  telepathy कहा जाता है।शब्दों को मन की ऊर्जा के साथ प्रवाहित किया जाता है। जिस प्रकार से साउंड वेव हवा के माध्यम से प्रवाहित होती है उसका दूसरे के मन पर असर भी पड़ता है। इस प्रकार के प्रभाव को समझने के लिए शब्दों का सही अर्थ भी मन की सत्यता से ज्ञात कर लेना आवश्यक हो जाता है ।


नकली धर्म बनाने के साथ साथ कुछ शब्दों के अर्थ भी बहुत गहराई से मापा जाना आवश्यक है।


मनुष्य का मतलब क्या है?  इसका मतलब इंसान बताया गया है (मनु+शिष्य) परन्तु इसे मनु का शिष्य भी कहा जा सकता है। तो इस प्रकार की शब्दावली भी ब्राह्मण के द्वारा बनाई गई है। जिसमें नकली धर्म को मनोवैज्ञानिक तौर पर शब्दों के रूप में जोड़ा गया है।इसी प्रकार से पुरुष में पुरु का जुड़ा होना। पुरुष का मतलब सिर्फ आदमी नहीं होता इसका मतलब पुरु से जुड़ा होना माना गया है।अब यह पुरु कौन है? पुरु वह राजा है जो सिकंदर से हारा था ऐसा बताया गया है।यानि यूनानी से हारने वाले राजा के नाम से जोड़ कर आदमी(male) शब्द को ईजाद किया अगर भारत में आदमी को यूनानी से श्रेष्ठ जताया जाए तो जीतने वाले के नाम से जोड़कर  भी शब्द बनाया जा सकता था जैसे कि नंदुष या मौर्युष चूंकि महान नंद वंश और मौर्य वंश ने युनानी को हराया भी और उनपर राज भी किया। असलियत में पाली भाषा में नाग का अर्थ नगर नगरीय और नागरिक से जुड़ता है इसलिए नाग का शाब्दिक अर्थ इंसान माना गया है परन्तु हिन्दी भाषा में नाग को सांप बता दिया गया और एक नागरिक को जहरीला यानि चिड़न वाला रूप भी दर्शा दिया गया और इसी को नकली धर्म में शिव को नीले रंग का भगवान बना कर दर्शाया गया है। यह चिड़न वाला रूप बौद्ध विचारधारा के बिलकुल विपरीत है। आदमी के लिए इसी प्रकार से एक हिन्दी का शब्द है पुर्लिंग इस शब्द को भी पुरु + लिंग से जोड़ कर बनाया गया है।  हिंदी भाषा के निर्माण में ब्राह्मण  ने ऐसी शब्दावली का प्रयोग किया है जिसमें युनानियों से जोड़कर


शब्दों को बनाया गया है और  कुछ शब्दों के जो असली अर्थ थे उन्हें तोड़ मरोड़ कर उनका अर्थ ही बदल दिया गया। पुरू राजा युनानियों से हारा था तो पुरू हार का प्रतीक है, यानि जो युनानियों से हारा वो है पुरुष, मनोवैज्ञानिक तौर पर ब्राह्मण आपको महान पुरुष भी कहेगा तो मानसिक रूप में जैसे ही मूलनिवासी पुरुष होना स्वीकार करेगा तो युनानियों से हारी हुई कौम का हो गया, यानि मन ही मन मूलनिवासी के ऊपर विजय प्राप्त की झूठी शब्दावली से (इसीलिए प्रचलित किया गया है मन के हारे हार है मन के जीते जीत)और मूलनिवासियों की असली शब्दावली को हटा दिया गया है , नालंदा विश्वविद्यालय की तरह इतिहास और शब्दावली को नष्ट किया गया।नकली धर्म और नकली शब्दावली से देश के मूलनिवासियों पर  मानसिक जीत हासिल करना ही नकली धर्म की आड़ है जिसे जाग्रत मूलनिवासी बौद्ध भंग करके इसके विपरीत प्राप्त कर लेता है और नकली धर्म का दुर्भाव मूलनिवासी बौद्धों पर नष्ट हो जाता है।  मानसिक रूप से मनोबल गिराने की शब्दावली और नकली धर्म दोनों दर्शाते हैं कि ब्राह्मण महान बौद्धों के सामने कितना कुंठित महसूस करता है, इसीलिए ही हिन्दी को युनानी ब्राह्मण पूरे देश के पाठ्यक्रम में लागू करवाना चाहता था और केन्द्र सरकार के रूप में मूलनिवासी की सरकार नहीं बनने दी गई थी। इसीलिए युनानी ब्राह्मण  बच्चों के पाठ्यक्रम में रामायण और महाभारत पढ़वाना चाहता है ताकि वो पारिवारिक कलह की सोच पैदा करने वाले धर्म ग्रंथों को पढ़वाकर मूलनिवासियों के परिवारों में मानसिक रूप से  पारिवारिक कलह पैदा कर सके एवं जो हमारे मूलनिवासी राजाओं के नाम का उपयोग रामायण महाभारत में हारे हुए दिखाते हुए दिखाकर स्वयं को जीते हुए का वंशज़ मानकर मूलनिवासी को मानसिक रूप में हारे हुए का वंशज़ जताकर मानसिक जीत दिखाने का तरीका परन्तु सत्यता इसके विपरीत है जिनके नाम का उपयोग नकली धर्म ग्रंथों में हार में दिखाया गया है वो असलियत में जीते हुए मूलनिवासी राजा थे। चूंकि बचपन में साफ मन पर जो पढा़या जाता है वह बालक मन पर लिख दिया जाता है और बड़े होने पर भी नकली धर्म के रूप में वह कलह मन में रहती है और पारिवारिक चिड़न की वजह से साधारण प्रेम जताकर अपने ही परिवार के विपरीत किया जा सकता है। जिस मन पर चिड़न यानि द्वेष का असर हो वो भी पारिवारिक कलह से वह बुद्ध नहीं हो सकता लीडर नहीं बन सकता । इसका एक बेहतरीन उदाहरण हैं विनोद कांबली, जिस समय में विनोद कांबली दुनिया के बेहतरीन क्रिकेटर कहे जा रहे थे उस समय में उनके मन में चिड़न इत्यादि देकर उनके मन को दबाया गया और उनको भारतवर्ष में मानसिक साथ भी प्राप्त नहीं हो पाया वहीं पर सचिन तेंदुलकर को नकली धर्म की वजह से मानसिक रूप से बहुत साथ दिया गया।


रामायण महाभारत में कुछ महान मूलनिवासी राजाओं के नाम को काल्पनिक विलेन के रूप में दर्शाया गया है। इस नकली काल्पनिक (mythology) की आड़ में नकली धार्मिकों को मनोवैज्ञानिक रूप से दोषी कौम का जता कर मन में डर पैदा करना आसान होता है और मनोवैज्ञानिक तौर पर चारों तरफ से घेरकर अपने मन अनुसार कार्य करवाया जा सकता है।  इसका बेहतरीन उदाहरण है जदुनाथ कायस्थ और सर्वपल्ली राधाकृष्णन का।


जब सर्वपल्ली ने जदुनाथ कायस्थ की थीसिस की चोरी की थी और अपनी किताब में छपवा दिया था तो जदुनाथ कायस्थ को पता चलने पर उसने कलकत्ता हाई कोर्ट में वाद दायर किया। वह इस केस को जीता हुआ था चूंकि उसके पास अपनी थीसिस को जमा करने के सबूत थे, परन्तु इस अध्याय से यूनानी ब्राह्मण और सर्वपल्ली की साख मिट्टी में मिल रही है ऐसा जानते हुए जदुनाथ कायस्थ को मनोवैज्ञानिक रूप में डरा कर समझौता करने पर मजबूर किया गया। शब्दों के उचित प्रयोग से मन उसकी ऊर्जा⚡ से ही सत्य को स्थापित किया जाता है। वैचारिक दृष्टिकोण से और घटित घटनाओं को जानने से आज ब्राह्मण शब्द का अर्थ निकल कर आता है मानसिक अपंग, यानि जो चिड़न का रूप है झूठ बोलता है सत्य छुपाता है दूसरों को गुमराह करने के लिए नकली धर्म ग्रंथ बना कर साजिश करता है फिर झूठ बोल कर धन लूटने के लिए बीजेपी की सरकार बनाई जाती है फिर सुषमा जेटली की तरह मानसिक बीमार हो कर अपंग स्थिति में स्थित होकर मर जाता है।

एक पाली भाषा का महत्वपूर्ण शब्द है नाग, नाग शब्द का पाली भाषा के अनुसार मतलब निकलता है आदमी, और हिन्दी भाषा में नाग शब्द का मतलब बताया गया है जहरीला सांप, नागवंशी राजाओं के इतिहास को छुपा कर उनकी शब्दावली को घटिया तरीके से तोड़ मरोड़ कर बनाया गया है।


सिर्फ बुद्ध शब्द ही हमारे देश में सर्वश्रेष्ठ कहा जाता है और संपूर्ण सत्यता को अपने मन से स्थापित करने की भग्न्ता हमारे देश में बौद्धों को ही प्राप्त है।

  इन सभी सच्चाईयों को मनोवैज्ञानिक रूप से स्थापित करने के लिए असली इतिहास और शब्दों के असली अर्थ उनके पैदा होने की पृष्ठभूमि को भी लिखा जाना आवश्यक हो जाता है।जैसे सिखी बुद्ध और गुरु नानक साहेब का  सिख धर्म का निर्माण, गुरुमुखी में सिख शब्द का प्रयोग हमारी प्राचीन पाली प्राकृत भाषाओं का जुड़ाव दर्शाता है कि सिख धर्म में हमारे बौद्धत्व का जुड़ाव है और सिखों का लंगर चलाना मूल रूप से बौद्धत्व की मानवता का ही मूल रूप है।हमारे देश की सभी भाषाओं में पाली और प्राकृत भाषा का जुड़ाव साफ तौर पर दिखाई देता है।


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