Chapter VII
देश की सबसे महत्वपूर्ण कौम
हमारे बौद्ध देश में महत्वपूर्ण अगर किसी को माना जाता है तो वो हैं मूलनिवासी बौद्ध जिनको नकली धर्म की आड़ में पता नहीं कितना छोटा नीच इत्यादि बोला गया। यह मनोवैज्ञानिक रूप में प्रेषित करता है कि किसी को भी बार बार यह बोल कर मनोवैज्ञानिक रूप में उसके मन में हीन भावना डालने की साज़िश भर है। यह मनोवैज्ञानिक अपराधिकरण का रूप कहा जा सकता है, और तो और देश की महान संपदाओं का भी नकली धर्म की आड़ में अपमान किया गया। जिनकी बुद्धि के चर्चे पूरी दुनिया में हैं उनके बुद्धि के बौद्ध स्तूपों की फिर दोबारा से पुजवाया जाना चाहिए जिसे नकली धर्म की आड़ में लिंग बताकर प्रचारित किया गया। हमारे बौद्धत्व में पूर्ण सत्य की खोज मन में करके बुद्ध बना जाता है, भगवान बना जाता है। हमारे देश की प्राचीन परंपरा के अनुसार बुद्ध को ही भगवान कहा गया है। परन्तु नकली धर्म जो मूलनिवासियों पर थोपा गया वो पूरा वासनात्मक नफरती सोच का नतीजा था। ब्रह्मा और मोहम्मद में समानता दिखाई गई है दोनों को बेटियों से जोड़ा गया है यानि नकली हिन्दू धर्म की आड़ में मोहम्मद के मन में रुके हुए मनोवैज्ञानिक प्रभाव को थोपा जा रहा था मूलनिवासी बौद्धों पर। जिस इस्लाम का जुड़ाव भी सम्राट अशोक से जुड़ा हुआ पाया गया है एक प्रकार से देखा जाए तो महान जागृत श्रेष्ठ बुद्धि संस्कृति पर इस्लाम को मनोवैज्ञानिक रूप में थोपा गया। नफरती टुच्चता से भंगेड़ी शिव यानि नशाखोर नकली भगवान बनाया गया महान भगवान बुद्ध को छुपाने के लिए। असली बुद्ध पूर्ण सत्य के प्रतीक हैं जिनके बुद्धि स्तूप हैं,उनको छुपाने के लिए बनाया गया नकली करैक्टर शिव जिसे गीता प्रेस गोरखपुर के सस्ते साहित्य से बताया गया है, नीले रंग का विद्वेष यानि विष से भरा प्रतीक जताया गया । यानि पशुपति यानि प्राचीन बुद्ध को इस चिड़चिड़े करैक्टर से जोड़ कर नकली धर्म के रूप में अपनी चिढ़न को मनोवैज्ञानिक रूप में थोपा गया मूलनिवासियों पर। अब जहां बाबासाहेब जी के अनुसार बौद्ध धम्म अपनाने वाले मूलनिवासी बौद्ध बुद्ध की तरह तृष्णा मुक्त होते और श्रेष्ठ बुद्धि वाले बौद्धों की तरह ही आविष्कार करने में सक्षम होते वे नकली धर्म से मनोवैज्ञानिक रूप से जोड़ कर थोप दिए गए नशेड़ी, चिढ़न से भरे,भाला लेकर चलने वाले मनोवैज्ञानिक रूप में डरपोक और गले में नाग यानि नागवंशियों से जोड़कर प्रचारित किये गए। यानि देश के महान बौद्धों को नकली धर्म की आड़ में बताया गया है ऐसा टुच्चा करैक्टर। अब देश में जो भी इस प्रकार से बने हुए मूलनिवासी हैं उनके मन पर नकली धर्म का ही दुर्भाव पड़ा हुआ है। चूंकि टुच्चा अपने आप को अच्छा कैसे दिखाए इसीलिए दुर्भावना वश हमारे महान मूलनिवासियों को इस प्रकार के मनोभाव में फंसाया गया था टैलीपैथी के द्वारा। नकली धर्म की आड़ में मूलनिवासियों को हारा हुआ जताकर नकली धर्म का टुच्चापन थोपा जा रहा था आज भी रामायण महाभारत इत्यादि के रूप में। जहां सुकिती बुद्ध ने अपने मन की तरंगों को महसूस करने के लिए कहा ,अपनी बुद्धि की शरण में रहने के लिए कहा वहीं नफरती स्थिति में हिन्दू ब्राह्मण ने बुद्ध की मूर्तियों जैसा नकली टुच्चे करैक्ट नशाखोर जैसी अफवाह फैलाकर शिव लंपट को नकली भगवान बता कर प्रचारित किया और बुद्धि की शरण में रहने के बजाए लिंग की यानि वासना को सिर पर थोपा । ऐसा वो आज भी हमारे देश के मूलनिवासियों के प्रति नकली धर्म के रूप में प्रचारित करते हैं। वासना का मारा कृष्ण को बता कर उसके पीछे छुपे मोहम्मद से जुड़ी मानसिकता को फैलाया गया नकली धर्म की आड़ में ( वैसे हरि शब्द मोहम्मद से जुड़ा शब्द है, सेलामत हरि राय मलेशिया और इंडोनेशियाई भाषा में जुड़ा हुआ है ईद के साथ)। इसीलिए कृष्ण का एक नाम हरि भी प्रचारित किया गया है चूंकि यह मोहम्मद से जुड़ा शब्द है (नकली हिन्दू धर्म को मुस्लिम धर्म से जोड़ कर थोपा गया है) ।एक तरफ इस्लाम से ही टापकर नकली धर्म बनाते हैं दूसरी तरफ बीजेपी वाले मुस्लिम से ही द्वेष फैला रहे हैं। चिड़न का मारा शुंग जो स्वयं ही राग द्वेष का मारा है, हत्यारा है महान मौर्य राजा का, मानसिक अपंग स्थिति में रहने वाला और उसी टुच्चता से सड़कर अल्पायु में मर जाने वाला करैक्टर है इसे आज के अटल बिहारी की 15-20 साल तक सड़कर मरने से जोड़कर देखा जाए तो मन में छुपी सारी साजिश समझ में आ जाती है जो बौद्ध मूलनिवासियों के विरुद्ध बनाई जा रही थी। अटल बिहारी भी मानसिकता से अत्यधिक द्वेष का मारा रहा होगा और मूलनिवासियों के खिलाफ बड़ी साज़िशों में लिप्त रहा होगा और इसने भी आडवाणी का इस्तेमाल किया और नकली धर्म की आड़ में टुच्चे करैक्टर के मंदिर और मस्जिद की टुच्चता में फंसाकर अपनी सीढ़ी की तरह इस्तेमाल किया होगा। ऐसे ही हिन्दू नरेंद्र मोदी ने भी आडवाणी का इस्तेमाल किया है। दूसरे तरीके से बोला जाए तो राम की आड़ में जो फैलाया गया है मनोवैज्ञानिक रूप में वह है टुच्चे पुष्यमित्र शुंग की कहानी को। ऐसे टुच्चे करैक्टर को भगवान बना कर महान बौद्धों के सामने परोसना यानि मनोवैज्ञानिक रूप में अपने मन को टुच्चे शुंग जैसा मनोरोगी बनाना। ऐसे मनोरोगी करैक्टर को मन में डालने से किसका मन जागृत होगा। चूंकि नकली धर्म को थोपने वाले भी उसी मनोरोगी से ही जुड़े हुए हैं। जिससे मूलनिवासी जो महान बौद्ध है वो भी नकली धर्म की वजह से तृष्णा का शिकार बनाए गए होंगे जिससे मूलनिवासी भी शारीरिक बिमारियों से ग्रसित होने लगा था इसलिए आज महान बौद्धों को नकली धर्म को खंडित करते हुए अपनी महानतम मूलनिवासी परंपरा को फिर से जाग्रत करते हुए मूलनिवासियों की जीत वाली परंपरा और इतिहास को फिर से स्थापित करने के लिए अपनी श्रेष्ठ सच्चाई को स्थापित करना है और नकली धर्म और उसके द्वारा फैलाई गई टुच्चता को भी देश और अपने मन से साफ करना है। हमारे महान बौद्ध विचारधारा के महान मूलनिवासी राजा महिषासुर को बलात्कारी बता कर दुर्गा की कहानी प्रचलित की गई ताकि आदिवासी मनोवैज्ञानिक रूप से प्रेम से भी डर को महसूस करें जबकि भगवान बताया गया वासुदेव जैसे साजिश करने वाले मानसिक मनोरोगी को और ब्रह्मा जैसे वासनात्मक करैक्टर को जो बेटियों से संबंध स्थापित कर लेते हों और इसे प्रेम बता कर प्रचारित करते हैं। अब आदिवासी को मानसिक रूप से वासनात्मकता के इर्द-गिर्द डर को जोड़कर दिखाया गया महान महिषासुर के रूप में, यानि प्रेम करने से भी डरो। महिषासुरमर्दिनी की नकली कहानी को थोप कर फैलाया गया आदिवासी समाज को प्रेम से वंचित करने के लिए और वासनात्मक बताकर प्रचारित कर डर थोपने के लिए। जबकि असलियत इसके विपरीत है, आदिवासी समाज भी सिंधु घाटी का बौद्ध ही है मूल परंपरा में प्रकृति से इसीलिए जुड़ा हुआ भी है। दुनिया की सबसे महान बौद्ध सभ्यता को नकली धर्म की आड़ में टुच्चता से पेश करने का मतलब ही था कि हिन्दू ब्राह्मण महान बौद्ध सभ्यता को टुच्चे करैक्टर शिव जैसा टुच्चा बताकर प्रचारित करे, जबकि असलियत में बौद्ध सभ्यता वो महान सभ्यता है जिसमें जागृत बुद्धि से दुनिया के सबसे पहले विश्वविद्यालय स्थापित किए गए यानि मन के अंदर की सच्चाई से अवगत हो कर प्राकृतिक सत्य को मन से समझ सकें। ऐसा प्रतीत होता है हिन्दू ब्राह्मण ने जो भी चुराया होगा वह सबकुछ नालंदा विश्वविद्यालय से संबद्ध रखता होगा। सम्राट महिषासुर से जोड़कर बनाई कहानी से आदिवासी समाज को डर में रखकर दूसरी कहानी रामायण में रावण यानि मौर्य और अहि रावण यानि अहीर(यादव) नागवंशी की बहन सूर्पनखा को वासनात्मक बताकर और मनोवैज्ञानिक रूप में लक्ष्मण यानि राम के छोटे भाई को नपुंसक बताकर प्रचारित किया है। अब मौर्यों अहीरों की बहन को आकर्षित करता लक्ष्मण परंतु वह रामायण के अनुसार मनोवैज्ञानिक रूप में नपुंसक दर्शाया गया है। यह मनोवैज्ञानिक वासना रोग फैलाया गया है मौर्य और यादवों की बहनों के ऊपर। हिन्दू यूनानी ब्राह्मण ने ऐसा नकली धर्म के ग्रंथ रामायण से दर्शाया है। सिर्फ इस वैचारिक दृष्टिकोण को नए तरीके से देखने का नजरिया बनाते हैं कि महान बौद्धों की सेवा ब्राह्मण ठाकुर वैश्या को तन मन धन से करना हैं और यही इनका धर्म भी है वरना अटल बिहारी, जेटली सुषमा पर्रिकर पर ही नकली धर्म का सड़ातन असर सब देख ही चुके हैं।
इस नकली धर्म के द्वारा मनोवैज्ञानिक भ्रम फैलाया गया कि अहीर और मौर्य विलेन हैं, जबकि बलात्कारी और वासनात्मक टुच्चा होने की सच्चाई ठाकुर राजपूत वैश्या की प्रचलित हुई जिसने हमारी महान फूलन को दस्यु बनाया था और महान फूलन को बलात्कार कर द्वेष से ग्रस्त किया जिसकी वजह से फूलन देवी को उन्हें टुच्चों की तरह मसलना पड़ा था। नकली धर्म में टुच्ची सी देवियों को मां बना कर फैलाया गया एक चिढ़न से भरी औरत का नज़रिया हिन्दू ब्राह्मण ने नकली धर्म से बौद्ध मूलनिवासियों के मन में भ्रम के रूप में दिया जो कि बौद्ध के बिलकुल विपरीत बनाया है और यह बना कर महान बौद्ध मूलनिवासियों को दलित शूद्र अछूत इत्यादि बता कर उनके स्वाभिमान को भी ठेस पहुँचा कर उन्हें अपनी ही नज़रों में गिराने की टुच्चता और उनके महान बौद्धत्व को छुपाकर अपने आप को झूठ की आड़ में वासनात्मक कहानियों के रूप में खुद को हीरो और बाकी मूलनिवासियों को विलेन जताया गया नकली धर्म की आड़ में वो भी सिर्फ इसलिए ताकि किसी भी स्त्री से वासना पूर्ति की जा सके, जिसके लिए ही बनाया गया है नकली धर्म।
बच्चे का मन अत्यंत खुशी की प्राप्ति किस से करता है? अपनी मां से। एक संतुष्ट और असंतुष्ट मन में क्या फर्क है? सिर्फ नज़रिये का। नज़रिया कैसे बनता है? बचपन में माता-पिता की सोच और उनके दृष्टिकोण से जो उन्होंने अपने माता-पिता से प्राप्त किया और जो उन्होंने अपने मन से कर्म करके सीखा। मां बच्चे के लिए संपूर्ण होती है, और जो बच्चा मां के साए में पल रहा है वह मां के दृष्टिकोण से ही सीख रहा है। नकली धर्म में मां के वात्सल्य भाव को छुपाकर एक चिढ़न से भरी औरत को देवी बनाकर पेश किया गया जिससे महान बौद्ध मां की महान छवि को छुपाकर नकली धर्म की आड़ में टुच्ची दुर्गा से जोड़ कर प्रचलित किया गया। महान बौद्ध अपनी बुद्धि बल से विचारों को वश में रखते हैं और जैसे विचार होते हैं वैसा ही जीवन में असर होता है।मन में भंग अवस्था प्राप्त होने से मस्तिष्क अपने मन में आने वाले हर विचार को भंग करने की क्षमता रखता है और किसी भी घटना के घटित होने के लिए विचार को मन में असर के रूप में स्थापित होने से पहले ही भंग कर देता है। जैसे एक बीज को जमीन में बोते हैं और पानी देते हैं तो वह अंकुरित होकर उगता है उसी प्रकार से मन में किसी विचार को स्थापित करके उसे ऊर्जा देते रहने से वह मन में उग जाता है और बढ़ने लगता है और वह विचार बड़ा होकर फल देता है। अगर कोई विचार उग नहीं रहा है तो इसका मतलब है कोई इसके विपरीत विचार पहले ही मन में रुका हुआ है। जब उस विचार को मन में ढूंढेंगे तो मन उसे खोजकर सामने ले आएगा, ऐसे में उस पुराने विचार को भंग कर नए विचार को रोपित करने से वह विचार बड़ा होने लगता है और फल देता है। नकली धर्म से फैलाया गया था कि फल नकली मूर्ति देगी। मन के हारे हार है और मन के जीते जीत। नकली धर्म से वासना, झूठ, डर, चिढ़न मूलनिवासियों के मन में स्थापित किए गए, वहीं नकली धर्म वालों को राम की आड़ में शुंग जैसे टुच्चे करैक्टर को जीत, प्रेमी, सदाचारी इत्यादि का नजरिया बना कर मनोवैज्ञानिक रूप में दिखाया गया जबकि असलियत में वो मानसिक अपंग स्थिति में स्थापित था। इसीलिए बाबासाहेब आंबेडकर जी के बाद कोई भी दूसरे अंबेडकर हमारे देश में पैदा नहीं हुए चूंकि नकली धर्म के मनोविज्ञान से हारी हुई कौम के लोग जीत हासिल करने के लिए अपने मन के डर से उबरने में ही नहीं बन पाए, चूंकि मन पर किसी भी प्रकार की रिसर्च नहीं हो रही थी, और अगर बने भी तो राजनीतिक दलाल बने। सिर्फ साउथ इंडिया और कांशीराम साहब अपवाद रहे। अब चूंकि नकली धर्म का नकली भगवान तो वासना से भरा ब्रह्मा कृष्ण और लिंग वाला शिव थे और मनोवैज्ञानिक रूप में जीती हुई महान बौद्ध कौम वालों को नकली धर्म की आड़ में हारा हुआ दर्शाया गया, और 70 सालों तक एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव बना कर रखा गया देश के मूलनिवासियों पर।
परन्तु चोरी से बनाया गया नकली धर्म मानसिकता से टुच्चे को महान बोलकर झूठ से प्रचारित करने से भी नकली टुच्चा तो टुच्चता से ही ग्रसित रहेगा। साथ ही नकली धर्म के झूठ की वजह से मानसिक सड़ातन असर भी दिखा है जैसे अटल जेटली सुषमा पर्रिकर ये सभी धूर्तता के शिकार थे और हिन्दू ब्राह्मण थे और बिमारी ग्रस्त वासुदेव जैसे साजिश करने वाली मानसिकता से ग्रसित थे और दूषित विचारों से भी ग्रसित थे। जैसे जैसे मूलनिवासी इतिहास में महत्वपूर्ण लोगों का सत्य पर आधारित इतिहास का वर्णन प्रचलित हुआ हिन्दू ब्राह्मण ने अपने आप को महत्वपूर्ण दिखाने के लिए अपने झूठ का पुलिंदा भी लिखना और प्रचार करना शुरू कर दिया था। जब सम्राट अशोक के शिलालेख पढ़े जाने लगे तो मौर्य राजाओं के साथ अपने आप को महत्वपूर्ण बताने के लिए कहानी गठित की गई चंद्रगुप्त के साथ चाणक्य नामक करैक्टर की। जब युनानी सेल्यूकस खुद ही चंद्रगुप्त मौर्य से बुरी तरह हारा था और अपनी बेटी हेलेना को चंद्रगुप्त के साथ छोड़कर गया और अगर ब्राह्मण को युनानी सेल्यूकस की मगध में छोड़ी गई सेना से जोड़कर देखा जाए तो जो चंद्रगुप्त मौर्य के बाद में ही भारत में आया है वह चंद्रगुप्त मौर्य को कैसे स्थापित कर सकता है, तो चाणक्य का झूठ तो यहीं पर खत्म हो जाता है। चाणक्य नामक लंपट करैक्टर भी नकली भगवानों की तरह ही कल्पना पर ही आधारित है चूंकि इस करैक्टर का वर्णन इतिहास के किसी स्रोत में नहीं है। नकली धर्म की तरह इस करैक्टर को भी कई नामों से जोड़कर भ्रम फैलाया गया, जैसे कौटिल्य विष्णुगुप्त इत्यादि। असल में महान बौद्ध नन्द वंश के राजा महापद्म नन्द की सेना ने सिकंदर को बुरी तरह रौंदा था। इसलिए जो यह फैलाया गया था कि जो जीता वही सिकंदर, जबकि सिकंदर नंद वंश से बुरी तरह हारा था, और उसका सेनापति सेल्यूकस निकेटर चंद्रगुप्त मौर्य से हारा था। यहां मनोवैज्ञानिक तौर पर अब बोला जाना है कि जो हारा वो सिकंदर और जो जीता वही हैं महान नंद मौर्य । वैसे असली जीत बुद्ध और बौद्ध की कही जाती है जिन्होंने तृष्णा पर जीत हासिल की है, इसलिए ही सिकंदर के आज के पूर्वज भी उस लंपट हार का सामना करने से डरते रहे होंगे। अपने आप को महान मौर्यों से श्रेष्ठ दिखाने के लिए ही नकली वर्णव्यवस्था और नकली धर्म बनाया गया था और महान मौर्यों को शूद्र बता कर उनका असली इतिहास ही गायब कर दिया गया था। उनके मन में भी महानता के विश्वास को डिगाया गया था नकली धर्म से मनोवैज्ञानिक प्रभाव देकर। ब्राह्मण अपने इतिहास को पहले 5000 साल पुराना बता कर संस्कृत तक को प्रचलित किये हुए था कि यह सबसे प्राचीन भाषा है, पर जैसे जैसे मूलनिवासियों ने अपने असली इतिहास की खोज की तो पाया कि संस्कृत तो बहुत बाद की भाषा है अगर देखा जाए तो 11वीं शताब्दी के बाद की और तो और इतिहास में एक काल्पनिक रिग्वैदिक काल की कल्पना करके उस काल के बौद्ध इतिहास को भी छुपाया गया और पढ़ाया नहीं गया। परन्तु अब रिग्वैदिक काल भी बिना प्रमाणों के, सत्य आने के बाद शून्य हो गया और उड़ गया, ऐसे ही संस्कृत की भी हवा निकल गई। आजकल एक नया शिगूफा फैलाया जा रहा है सिनौली का जिसे 3000 साल पुराना बताया जा रहा है पर जितना ज्यादा ये झूठ बोलते हैं उतने ही मानसिक अपंग स्थिति में सड़ातन असर में पहुंचने लगते हैं। इसी प्रकार जैसे जैसे बाबा साहेब जी को विश्व ख्याति प्राप्त होने लगी तो बाबासाहेब जी के साथ अंबेडकर सरनेम का क्रेडिट जताना शुरू कर दिया गया। जैसे कि बाबासाहेब जी ने महान कबीर पंथी विचारों और अपनी बुद्धि बल पर तो कुछ हासिल नहीं किया बस वो सरनेम ही उन्हें विद्वान बना रहा था। अब जैसे जैसे मूलनिवासी समाज बौद्ध होता जा रहा है तो कुंठित हिन्दू ब्राह्मण ने यहाँ भी एक नया शिगूफा फैलाना शुरु कर दिया कि गौतम बुद्ध ने निर्वाण की प्राप्ति के बाद जो सबसे पहली शिक्षा दी थी वह ब्राह्मणों को दी थी, इसका भी कोई साक्ष्य नहीं हो सकता क्योंकि यूनानी हिन्दू यानि ब्राह्मण हमारे देश में आया ही मौर्य काल में है तो यह भी सिर्फ नकली कहानी है। नकली धर्म झूठ पर बनाया गया और नकली इतिहास भी ब्राह्मण को सिर्फ कुंठित ही प्रेषित करता है। इनकी कुंठा को उजागर करता एक चोर का विवरण। जिसके नाम पर शिक्षक दिवस बनाया जा रहा था वह भी एक थीसिस चोर है। साभार महेंद्र यादव जी ने फेसबुक के माध्यम से इस चोरी की सच्चाई को उजागर किया। सर्वपल्ली ने अपने ही विद्यार्थी मूलनिवासी जदुनाथ कायस्थ की थीसिस चोरी करके अपनी किताब छपवाई। अब सोचिए कि एक थीसिस चोर से मनोवैज्ञानिक प्रभाव में बच्चे कैसी प्रेरणा लेंगे, चोरी करके महान बनने की सोच से कितने बच्चे अपनी बुद्धि का श्रेष्ठ प्रयोग कर आविष्कार जैसी उपलब्धि प्राप्त करने योग्य होंगे? इसीलिए हमारे देश में नकली धर्म और इन चोरों की वजह से आविष्कार नहीं हो पा रहे हैं चूंकि प्रेरणा भी चोर को दिखाकर ही जताई जा रही है। नकली धर्म से सिर्फ धन लूटना है वासनात्मकता को बढ़ावा देना था बस। चोर सिर्फ महान दिखाया जा सकता है वो भी तब तक जब तक उसकी चोरी को पकड़ा ना जाए, परन्तु चोर मानसिक रूप से खोखला महान ही होता है मानसिक रूप से बाबासाहेब जी जैसी ख्याति महान बौद्धों को ही प्राप्त होती है चूंकि महान बौद्ध ही पूरे विश्व में बौद्धत्व को प्रदान करते हैं और बुद्धि से श्रेष्ठ होते हैं।
क्या किसी ने सोचा है कि ब्राह्मणों ने महान मूलनिवासियों को अपने ग्रंथों में अछूत इत्यादि क्यों कहा? क्योंकि दुनिया की सबसे महान बौद्ध कौम जो अपनी बुद्धि की प्रखरता के लिए पूरे विश्व में विख्यात है कौम ने ह्वेन सांग के अनुसार 28 बुद्ध दिए बल्कि 28 का तो जिक्र विश्व के इतिहास और ऐतिहासिक धरोहरों में वर्णित है, ऐसा ज्ञात होता है कि अनगिनत बुद्ध दिए हैं, नालंदा विश्वविद्यालय जैसे दुनिया के पहले विश्वविद्यालय दिए, उस महान कौम के राजाओं और बुद्ध इतिहास को नकली धर्म की आड़ में विक्षिप्त दिखाकर महान बौद्धों को गुमराह किया गया था चूंकि साफ मन के मूलनिवासी धूर्त की धूर्तता को समझ नहीं पाए और नकली धर्म से ही गुमराह हो गए। परन्तु जब मूलनिवासी सिख मनमोहन सिंह जी की सरकार में पूर्ण सत्य उजागर करने के साथ साथ धनवान होते जा रहे थे तो हिन्दू ब्राह्मण के नकली धर्म को और मूलनिवासियों के धन की लूटपाट करने के लिए नोटबंदी इत्यादि की आड़ में तो बनाई गई हिन्दू नरेंद्र मोदी की सरकार। इस सरकार ने सबसे पहले एससी एसटी एक्ट पर वार किया। उसे कमजोर करने के लिए दूसरी कम्युनिटी के गवाह की गवाही को चिपकाया गया। इसके बाद किया गया नोटबंदी का शिगूफा, जिसकी वजह से मूलनिवासियों के बहुत से छोटे कारखानें बन्द हो गए और इसकी आड़ में धन की खूब लूटपाट की गई, जिसकी वजह से नकली धर्म वाले और बीजेपी वाले मानसिक बिमारी ग्रस्त हो अपंग स्थिति में स्थित हुए। जेटली सुषमा पर्रिकर अटल इसी का तुरंत में आया परिणाम है। इसके बाद मनमाने ढंग से जीएसटी लागू किया गया जिसमें फिर से छोटे और बड़े उद्योग बंद होने लगे और देश की अर्थव्यवस्था चरमरा गई। फिर वार किया गया देश के सरकारी संसथानों को बेचने का, जिसमें मूलनिवासी नौकरी करके स्वाभिमानी और धनवान हो रहे थे उन्हें मूलनिवासियों के हाथों में से छीनकर हिन्दू वैश्या वर्ण के लोगों को सस्ते में उपलब्ध कराया जाने लगा। चूंकि बौद्ध मूलनिवासियों के हिस्से के धन की लूटपाट से वैश्या वर्ण के लोग मानसिक रूप से बिमारी ग्रस्त होकर उस धन का मज़ा लेने से पूर्णतया वंचित भी होते जा रहे हैं, प्रकृति तो बौद्धों के साथ ही है और रहेगी भी। जैसे कि वैश्या हिन्दू मुकेशअंबानी का बेटा डायबिटीज़ का शिकार है और इतना पैसे से धनवान होते हुए भी मानसिक बिमारी होने की वज़ह से खाने का मज़ा तक उसे प्राप्त नहीं होगा, और तो और उसके पिता का अपने झूठ से मूलनिवासियों के धन को लूटने की सोच से अस्थमा भी है। अब उस धन को चाटकर वह अपनी ही औलाद के रोगग्रस्त शरीर को देखकर खूब मज़ा करता होगा क्या? इस रोगग्रस्त सोच की वज़ह से ही इसकी औलाद एयर कंडीशनर इत्यादि की सुविधा का भी कोई लाभ और मजा प्राप्त नहीं कर पाते होंगे ऐसा प्रतीत होता है। ऐसे लूटपाट करके धनवान होने से उस धन को प्राप्त करके नकली धर्म वाले मानसिक बिमारियों से ग्रस्त ही होते हैं और मूलनिवासी बौद्ध सत्य के बल से यश भी प्राप्त करने लगे हैं और श्रेष्ठ धनवान भी बन रहे हैं और अत्यधिक संतुष्ट भी हो रहे हैं, चूंकि वे ईमानदार हैं अपने मन के प्रति परिवार के प्रति, समाज के प्रति और देश के प्रति। ऐसा ही हाल बाकी लूटपाट करके भागे नीरव, मेहुल, माल्या जैसे भगोड़ों का भी है। वो सभी भी मानसिक रूप से विक्षिप्त होकर तरह तरह की बिमारियों से ग्रसित हो चुकेे होंगे। महान बौद्ध देश में झूठ पर लूटपाट तो संभव हुई परन्तु उसके मानसिक बिमारियों के परिणाम भी शारीरिक रूप में नकली धर्म वालों को प्राप्त होते दिखाई देते जा रहे हैं। इसी प्रकार से जैन धर्म को भी इतिहास में बौद्ध से टापने की कोशिश की गई है परंतु इसका जुड़ाव भी हमारे देश की मूलनिवासी कौम से नहीं है और इसे भी झूठ बोल कर 28 तीर्थंकर दिखा कर इतिहास में बौद्ध के बराबर दिखाने की साजिश भर है जिसके महावीर का भी कोई प्राचीनतम सबूत हमारे देश में उपलब्ध नहीं है और ना ही किसी विदेशी इतिहास में कहीं दर्ज है और ना ही किसी तीर्थंकर का ही। वैसे जो जैन धर्म वाले हैं उनका जुड़ाव मुगलों से जुड़ता हुआ दिखाई दे रहा है। जैसे जैनियों का शाह सरनेम और मुगल राजा मोहम्मद शाह और ईरानी नादिरशाह। हमारे देश में जो अत्यधिक महत्वपूर्ण कौम हैं वो सिर्फ बुद्ध और उनकी असली कौम है बस और यह कौम आज के श्रेष्ठतम एस सी, एसटी, और ओबीसी से जुड़ती है। यह कौम ही पूर्ण सत्य के मार्ग पर चलने वाली महान, श्रेष्ठ और सम्माननीय है। बौद्ध इतिहास में जो खास आविष्कार या किसी उपलब्धता से जुड़े हुए हैं हमारे देश में उन्हें आविष्कारक मानकर उनकी बुद्धि की श्रेष्ठता के बल पर उन्हें एक खास वर्ग दिया जाता होगा, जिन्हें उनकी बुद्धि की श्रेष्ठता की वजह से सम्मानित वर्ग में रखा जाता होगा। परन्तु हिन्दू ब्राह्मण और ईरानी हिन्दू मुगल ने आजादी के बाद महान बौद्ध की उपलब्धियों को जातिगत कर अपनी हीन भावना से ग्रस्त सोच को जाति से जोड़ दिया, आज जो जातियों से जुड़ें हुए हैं वो ही महान और श्रेष्ठ मूलनिवासी बौद्ध हैं। बाकी विदेशी ईरानी यूनानी हिन्दू और मुगल हिन्दू ने अपने आप को हिन्दू ब्राह्मण, हिन्दू ठाकुर वैश्या इत्यादि बता कर मूलनिवासी बौद्धों से बिलकुल अलग ही रखा हुआ है। अब इस इतिहास को फिर दोबारा से साक्ष्यों के साथ लिखा जाना जरूरी है और हमारे देश में जो नकली त्योहार(त्यों+ हार, तुम्हारी मनोवैज्ञानिक हार) इत्यादि नकली कहानियों पर आधारित करके बनाए गए हैं उन सभी का असली स्वरूप और हमारे मूलनिवासी इतिहास के रूप में फैस्टिवल बनाए जाने जरुरी हो जाते है। वैसे नकली धर्म से जो हमारी सभ्यता की हराना चाहते थे वे आज मनोवैज्ञानिक प्रभाव से अपनी ही बिमारी ग्रस्त कौम को पैदा कर रहे हैं ऐसा आज देखा जा सकता है इसलिए बौद्ध को इन हार वाली मानसिकता से मुक्त ही रहना चाहिए। इसलिए भी हिन्दू नरेंद्र मोदी सरकार को साजिश के तहत प्रधानमंत्री बनाया गया है और देश के धन की लूटपाट करके और सारे सरकारी संस्थान बेचकर हिन्दू वैश्या वर्ग के लोगों को बेचा गया है। इसी प्रकार से हमारे देश में जो मुसलमान हैं उनमें दो प्रकार के मुसलमान हैं, एक जो ईरानियों मुगलों के वंशज कहे जा सकते हैं और दूसरे जो मूलनिवासी बौद्ध हैं जिन्होंने कभी इस्लाम ग्रहण किया था, उन्हें जातिगत तरीके से विभाजित किया गया है और भारतीय इस्लाम में भी वर्गीकरण करके बांटा गया है और ऊंच नीच किया गया है।
आज हमारे देश में जो मुसलमानों पर अत्याचार किए जा रहे हैं वो मूलनिवासी बौद्ध ही हैं। आज हमारे देश में दो धर्म प्रचलित किए गए, एक नकली धर्म जो कभी हिन्दू बताया गया था और आज सनातन यानि जेटली सुषमा अटलू वाला सड़ातन बताया जाने लगा जिसकी आड़ में मूलनिवासियों में राग और द्वेष को फैलाया और दूसरा इस्लाम है जो हमारी सभ्यता का है ही नहीं और दोनों का हम मूलनिवासियों से कोई संबंध नहीं है। थोड़ा इतिहास को और अरब में पांचवीं शताब्दी से जुड़े गतिविधियों को देखें तो मुस्लिम धर्म की पैदाइश सम्राट अशोक से जुड़ते हुए दिखाई देती है, सम्राट अशोक ने जो 84000 स्तूप बनवाए थे उनमें से एक आज भी मक्का मदीना में है जिसे नकली धर्म बनाने वाले हिन्दू ब्राह्मण के करैक्टर शिव का लिंग बता कर प्रचलित करता रहता है (अमरनाथ में भी जो आकार बनता है वह भी बौद्ध स्तूप का ही है जिसे एक मुस्लिम परिवार संभालता है और ब्राह्मण उसे शिव लंपट का लिंग कह कर प्रचारित करता था (बुद्ध के स्तूप को लिंग कहने से मूलनिवासी बौद्ध की अगली पीढ़ी के विचारों को वासनात्मक सोच से भ्रमित करने के लिए )जबकि यह आकार बौद्ध स्तूप का होता है और स्तूप बुद्ध की बुद्धि का प्रतीक है यानि दुनिया की सबसे बुद्धिमान कौम से जुड़ा हुआ इसीलिए ही जो मूलनिवासी नकली धर्म पूजते हैं और रामायण-महाभारत पढ़ चुके हैं और वे अपनी बुद्धि को वश में नहीं करते हैं वे अपने ही घर में वासनात्मकता और रामायण-महाभारत से पैदा हुए नकली धर्म के टुच्चे करैक्टरों को पूजने के प्रभाव से मानसिक विद्वेष होने की वजह से एक-दूसरे से चिढ़न महसूस करते होंगे जिसका प्रभाव अब विपसना करते हुए स्वयं के मन के भीतर से तृष्णा मुक्त रहने से सामाजिक एकीकरण भी होता जाएगा। वैसे जब सम्राट अशोक ने बौद्ध स्तूप के साथ बुद्ध बनने की विधि लिखवाई थी तो उसे पढ़ कर ही उस विधि को करने के पश्चात बहुत से नबी बन कर पैदा हुए होंगे। इसके पश्चात ही पांचवीं शताब्दी में मोहम्मद ने भी गुफा से कुछ प्राप्त करके ही इस्लाम धर्म की नींव रखी थी परन्तु वह वासना से मुक्त नहीं हुआ था। वैसे हरि शब्द इस्लाम से जुड़ा है और मोहम्मद के लिए इस शब्द का प्रयोग मलेशिया इंडोनेशिया में जाना जाता है। हिन्दू ब्राह्मण ईरानी ठाकुर और वैश्या ने मिलकर जो नकली धर्म बनाया वह महान बौद्ध का इस्लामीकरण था इसलिए ही मूलनिवासी के लिए हरिजन शब्द का इस्तेमाल किया जाता था जिसे बाद में गैरकानूनी करार दिया गया। एक तरह से यूनानी हिन्दू ब्राह्मण ने ईरानी वैश्या के साथ मिलकर कृष्ण के रूप में मोहम्मद को भी बेच डाला मूलनिवासी बौद्धों को नकली धर्म की आड़ में। इसलिए नकली धर्म की आड़ में जो द्वेष हमारे देश में फैलाया गया है उसे बौद्धत्व से समाप्त करना अब महान बौद्ध मूलनिवासियों की जिम्मेदारी हो जाता है और बौद्ध सरकार का चुना जाना और बौद्ध प्रधानमंत्री ही देश में आवश्यक हो जाता है, चूंकि जो हमारी सभ्यता को नष्ट करने के लिए और बौद्ध मूलनिवासियों के मनोबल को तोड़ने के लिए नकली धर्म ही बना दें वही देश की गरीबी के लिए भी जिम्मेदार हैं और इस गरीबी का उन्मूलन अब बौद्ध ही अपनी सूझबूझ से कर सकते हैं।
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