Chapter V
शब्दों का उचित ज्ञान और शब्द मनोविज्ञान
शब्दों का उचित ज्ञान और उनका सही इस्तेमाल करना आना बहुत आवश्यक है। शब्द मन में पैदा ऊर्जा⚡ के साथ बंधकर पूरे वातावरण में फैल जाते हैं और दूसरे के मन में स्थापित किये जा सकते हैं। अगर मन के विचार किसी के मन तक पहुंचाने हों तो वो भी मन की ऊर्जा के साथ जुड़कर तरंग (wave) के रूप में पहुंचाए जाते हैं, इसी को telepathy कहा जाता है। जिस प्रकार हम एक मोबाइल से दूसरे मोबाइल पर बात करते हैं वह क्या है? साउंड वेव पार्टिकल(तरंग कण) के रूप में भेजी जाती है। जो बोला जाता है वह शब्द है और मन में एक भाव जुड़ा होता है जिसे मनोभाव या intention कहा जाता है। यह भाव शब्दों को मन की ऊर्जा प्रदान करता है और उस ऊर्जा के साथ शब्द प्रवाहित किया जाता है। जिस प्रकार से तरंग कण (साउंड वेव) हवा के माध्यम से प्रवाहित होती है उसका दूसरे के मन में वह तरंग कण((wave particles) स्थापित हो कर असर भी छोड़ती है(शब्दों का मनोवैज्ञानिक असर होता है) चूंकि उसमें मन का भाव जुड़ा हुआ है। इस प्रकार के प्रभाव को समझने के लिए शब्दों का सही अर्थ भी मन की सत्यता से ज्ञात कर लेना आवश्यक हो जाता है। चूंकि वह भाव उस शब्द के साथ असर पैदा कर दूसरे के मन पर प्रभाव देगा जो बोला नहीं जाता महसूस हो जाता है।
नकली धर्म बनाने के साथ साथ ही नकली धर्म वालों ने कहानी के रूप में राम ( वाल्मीकि रामायण में दशरथ राम के पिता हैं और बौद्ध इतिहास में मौर्य साम्राज्य में एक राजा दशरथ मौर्य भी हैं जो मूलनिवासी मौर्य साम्राज्य से जुड़े हुए हैं। बौद्ध रामायण के अनुसार राम मौर्य हैं और सीता उनकी बहन हैं और वाल्मीकि रामायण में मनोवैज्ञानिक रूप में सीता को राम की पत्नी बताकर टैलीपैथी के माध्यम से थोपा गया था। इसके साथ ही इस कहानी में राम की आड़ में शुंग की कहानी थोपी गई है। )शुंग जो कि हत्यारा है दसवें राजा ब्रहद्रथ मौर्य का, मानसिकता से टुच्चा है, और मानसिक अपंग स्थिति में ही मृत्यु को प्राप्त होता है। जैसे हमारे महान बौद्ध नन्द वंश से विद्वेष करके सिकंदर मानसिक रूप से विक्षिप्त हो कर महामारी की चपेट में आकर मरा था। ऐसे ही साजिश करने वाला एक करैक्टर वासुदेव जिसका विवरण इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय की प्राचीन भारत में दिया गया है को भी हमारे देश में कृष्ण से जोड़कर प्रचारित किया और मंदिरों से लाउडस्पीकर लगा कर कथाएं प्रचलित कर नकली धर्म को लोगों के मन में टैलिपैथी से स्थापित किया गया था झूठ बोलकर। जब कोई बहुत आवेश में किसी बात को दूसरे के दिमाग पर थोपने के लिए बोलते हैं तो उसे वह सच मान लेता है अगर उसने गहराई से उस बात का अध्ययन नहीं किया है या विपसना नहीं करता है। जब किसी भी बात को मन से यानि मनोभाव से जोड़कर बोलते हैं तो उसकी सच्चाई दूसरे के मन पर स्वत: ही स्थापित हो जाती है। शब्द के साथ जो जुड़ता है वह है उसका मन का भाव जो चिढ़ या प्रेम के भाव को दर्शाता है।
इसीलिए जब मन को भावशून्यता पर ले आते हैं तो यह दूसरे इंसान के मन में उठने वाले हर भाव को भी जान लेता है । ऐसे होते हैं हमारे बुद्ध जो प्रकृति के ही नहीं दूसरों के मन के अंदर के सत्य को भी जान लेते हैं इसीलिए नकली धर्म की आड़ में ऐसे करैक्टरों को भगवान जैसे पवित्र शब्द से जोड़कर फैलाना ही भगवान शब्द का अपमान है। जो बौद्ध मन अपनी बुद्धि की शरण में होता है वह अपनी बुद्धि से दुनिया के किसी भी कार्य को करने में सक्षम है और ऐसा मन एक मूलनिवासी बौद्ध को पैदाइशी प्राप्त हो जाता है परन्तु ऐसे महान बौद्ध मन को भंग अवस्था में रहकर पढ़ाई-लिखाई करने से श्रेष्ठता और संपूर्ण सत्यता भी प्राप्त होती है और दुनिया के सबसे श्रेष्ठ वैज्ञानिक भी बौद्ध ही होते हैं जिसके सबसे बड़े उदाहरण के रूप में सुकिति बुद्ध हैं जिन्होंने अपने मन की सत्यता से मन और शरीर के बीच के वैचारिकी के सारे रहस्यों को उजागर किया है। यानि स्वयं के विचारों का भी अपने ही शरीर पर असर होता है।दूसरे रूप में बाबासाहेब आंबेडकर जी को आधुनिक युग का सबसे बड़ा विद्वान यानि बोधीसत्व कहा जाना है। वैसे हमारे देश में सुपर कम्प्यूटर परम के निर्माता भाटकर साहब भी मूलनिवासी बौद्ध ही हैं। इसलिए ही नकली धर्म बनाने वाले हिन्दू ब्राह्मण के द्वारा दिए गए हिंदी के शब्दों के अर्थ भी बहुत गहराई से मापा जाना पुनः आवश्यक है। चूंकि श्रेष्ठ मूलनिवासी बौद्धों के आगे की पीढ़ियों को श्रेष्ठतम बुद्धि से जोड़कर हर मूलनिवासी श्रेष्ठता के साथ ही देख सके। जैसे सिंधु घाटी सभ्यता से संबंधित बुद्ध जिन्हें पशुपति बताया गया है से जोड़कर नकली करैक्टर शिव को प्रचारित किया गया, छोटे बुद्धि से जुड़े मनौती स्तूपों को लिंग बताकर प्रचारित किया गया बाकायदा 7वीं कक्षा की 1990 वाली एनसीईआरटी में इसको फैलस वर्शिप बताया गया। बुद्धि स्तूप को लिंग कहकर प्रचारित करने के पीछे का रहस्य समझें तो एक बड़ी मानसिक साज़िश भंग होती है। ये हमारे पूर्वज का लिंग तो पूज लेंगे पर उसकी बुद्धि के आगे खत्म हो जाते हैं। बाबासाहेब आंबेडकर जैसे बुद्धि में श्रेष्ठ विद्वान से डरकर ही नकली धर्म बनाया गया और
साभार विकिपीडिया से प्राप्त सिंधु घाटी सभ्यता कालीन पशुपति सील यानि प्राचीनतम बुद्ध
इस सील की प्राप्ति से यह तो ज्ञात होता है कि हमारे प्राचीन कालीन बौद्ध भी सर्वश्रेष्ठ बुद्धि वाले रहे हैं और अपनी बुद्धि से उस समय भी विपसना इत्यादि करके मन के अंदर जाकर सच्चाई को जानने में लगे रहने वाले श्रेष्ठ मानसिकता के लोग रहे हैं। यह श्रेष्ठता हमारी आज़ की पीढ़ी के मन में भी स्थापित होनी है। यह सील यह भी दर्शाती है कि एक बौद्ध अपने आसपास के सभी जानवरों को बुद्धि बल से वश में कर लेते होंगे।
यानि जो हमारी बौद्ध कौम की बुद्धि के स्तूप हैं उन्हें अपनी तुच्छ सोच से फैलाया गया लिंग। आज हमें इन बुद्धि स्तूपों को स्वयं की श्रेष्ठतम बुद्धि से जोड़कर अपने बच्चों को भी उसी श्रेष्ठ बुद्धि से जुड़ा हुआ मानना, जताना और व्यवहारिक भी करना होगा अपने परिवार में समाज में देश में और हर श्रेष्ठ मूलनिवासी को स्वयं की श्रेष्ठतम बुद्धि से जोड़कर उन्हें भी श्रेष्ठ मान कर व्यवहार भी स्थापित करना होगा। ताकि हिन्दू ब्राह्मण के द्वारा जो ऊंच नीच की खाई देश में बनाई गई वह भंग हो जाए। बाबासाहेब आंबेडकर जी जैसे और भी विद्वान हमारे देश में पैदा होते इसीलिए बनाया गया नकली धर्म और मनोवैज्ञानिक रूप में बुद्धि स्तूपों को लिंग बताकर प्रचारित किया गया। एक प्रकार से बुद्ध के गौतम नाम पर भी संश्य है, जैसे प्राचीन शिलालेख पर शाक्य मुनि बुद्ध का नाम सुकिति लिखा पाया गया है परन्तु प्रचारित शब्द है गौतम बुद्ध। शब्दों की सत्यता को प्रमाणित करना आवश्यक हो जाता है और शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई यह भी जानना जरूरी है चूंकि शब्द का एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव मानसिक रूप से मन पर दिया जाता है।
मनुष्य का मतलब क्या है? इसका मतलब नर बताया गया है (मनु+शिष्य) परन्तु इसे मनु का शिष्य भी कहा जा सकता है। तो इस प्रकार की शब्दावली भी हिन्दू ब्राह्मण के द्वारा बनाई गई है। जिसमें नकली धर्म को और उससे जुड़े हुए तुच्छ और मनोरोगी मनु जैसे लोगों को मनोवैज्ञानिक तौर पर शब्दों के रूप में जोड़ा गया है। इसी प्रकार से पुरुष में पुरु का जुड़ा होना। पुरुष का मतलब सिर्फ आदमी नहीं है, इस शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई इस पर भी गौर करना जरूरी है । शब्द मनोविज्ञान के अनुरूप देखा जाए तो हर शब्द के पीछे एक मनोविज्ञान है, इस शब्द मनोविज्ञान को भी हमारे देश में मानसिक बिमारी ग्रस्त स्थिति में बनाया गया होगा ऐसा प्रतीत होता है, अब यह पुरु कौन है? पुरु वह राजा है जो सिकंदर से हारा था हैडस्पस की लड़ाई में, ऐसा इतिहास में बताया गया है। यानि यूनानी से हारने वाले राजा के नाम से जोड़ कर पुरुष (male) शब्द को ईजाद किया। आखिर एक यूनानी से हारने वाले पुरु के साथ इस शब्द को क्यों बनाया गया? क्या हिन्दू ब्राह्मण यूनानी है? अगर भारत में नागरिकों को यूनानी से श्रेष्ठ जताया जाए तो जीतने वाले के नाम से जोड़कर भी शब्द बनाया जा सकता है जैसे कि नंदुष या मौर्युष चूंकि महान नंद वंश और मौर्य वंश ने युनानी को हराया भी और उनपर राज भी किया( वैसे इतिहास में मौर्य, नंद वंश की ही अगली पीढ़ी है ऐसा प्राचीन बौद्ध अवशेषों के शोध से प्राप्त होता है) वैसे नर शब्द ही असलियत में पढ़ाया जाना चाहिए और पाली भाषा में नाग का अर्थ नगर नगरीय और नागरिक से जुड़ता है इसलिए नाग का शाब्दिक अर्थ इंसान रहा होगा परन्तु हिन्दी भाषा में नाग को सांप बता दिया गया और एक नागरिक को जहरीला यानि चिड़न वाला रूप भी दर्शा कर प्रचारित कर दिया गया और इसी को नकली धर्म में शिव को नीले रंग का भगवान बना कर दर्शाया गया है जिसे हमारे देश के सिंधु घाटी सभ्यता के सर जो़न मार्शल के पशुपति( इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय के इतिहास की प्राचीन काल की पुस्तक में आदि शिव लिखा है) से जोड़कर प्रचारित किया गया है। अगर इस सील को देखें और इसपर बने बुद्ध को ध्यान से जानें तो पाएंगे कि एक बौद्ध जब अपने मन में विपासना करने में लीन हैं तो उनके विचारों में शून्यता होने से उनके आस पास के छोटे दिमाग वाले जानवर भी उनकी बुद्धि के विपरीत नहीं जा सकते हैं और बौद्ध के शून्य भाव से शून्य हो जाते हैं।
ह्वेनसांग के दिए गए विवरण के अनुसार भारत देश में 28 बुद्ध थे जिनमें सुकिति यानि गौतम बुद्ध 28वें थे। यानि हमारे पूर्वज प्राचीन महान बुद्ध को नकली धर्म के टुच्चेपन में शिव जैसा भंगेड़ी नशेड़ी बता कर प्रचारित किया गया यानि जो नशाखोर है विध्वंसक है वो शिव है ऐसा गीता प्रेस गोरखपुर के द्वारा प्रचारित किया गया। बुद्ध की मानसिक स्थिति को पशुपति से जोड़ें तो पाएंगे कि वह बुद्धि से सर्वश्रेष्ठ है और अपनी बुद्धि बल से ही सभी बुद्धि वालों को वश में कर लेते हैं।अब इस मानसिकता को सभी मूलनिवासी बौद्धों पर थोपने के लिए ही नारायण दत्त श्रीमाली वाली प्रक्रिया को हिप्नोटिज्म की तरह प्रचारित किया गया ताकि मूलनिवासियों के मन पर हिप्नोटिज्म से उसका प्रभाव थोपा जा सके। अब जिसे यह सत्य नहीं पता वो ऐसे ही करैक्टर को पूजने लगेगा और मन ही मन विक्षिप्त किया जाएगा। मेरे कुछ ब्राह्मण साथी ऐसे ही नशें के रोगी हैं। यानि हिन्दू ब्राह्मण मानसिक मनोरोगी स्थिति में जो स्वयं है वह हमारे महान बुद्ध की जगह एक व्यसनी भगवान बना कर हमारे सामने प्रचारित करता था और वो भी पशुपति यानि प्राचीन बुद्ध से जोड़कर। यहां नकली धर्म वाले हिन्दू ब्राह्मण अटल बिहारी की परिस्थिति को समझते हैं तो समझ आता है कि वह नकली धर्म से जुड़ी हुई अपनी मानसिक मनोरोगी स्थिति की वजह से ही 15-20 सालों तक सड़ कर मरा चूंकि मन में मूलनिवासी बौद्धों के विपरीत साजिश करने की मानसिकता जो थी। जो बुद्ध अपनी बुद्धि के लिए विश्व में श्रेष्ठ बताए जाते हैं उनके लिए नकली धर्म की आड़ में हिन्दू ब्राह्मण ने मानसिक हिन्दू स्थिति में अपनी चिढ़न और टुच्च स्थिति को दर्शाया है। यह चिड़न वाला रूप बौद्ध विचारधारा के बिलकुल विपरीत बनाकर प्रचारित किया गया। यानि मूलनिवासियों के प्रति घोखे से शुंग टुच्च की तरह ही प्रचारित किया गया और महान बौद्ध मूलनिवासियों के समक्ष टुच्चे करैक्टर शिव विध्वंसक को भगवान शब्द से जोड़कर दिखाया गया या कहें तो थोपा गया। बुद्ध होना यानी अपनी बुद्धि से समाज में जागृति निर्माण करना, जिसे 83 देशों में बुद्ध हैं इससे प्रमाणित होता है कि बुद्ध समाज को जोड़ते हैं, विध्वंसक कहा जाना यानि प्राचीन बौद्ध का अपमान किया जाना। वहीं बौद्धत्व और बुद्ध को मन में स्थापित और स्वीकार करने वाले अपनी बुद्धि से शांत और सर्वश्रेष्ठ होंगे जैसे बाबासाहेब आंबेडकर जी कबीरपंथी होने से बहुत गंभीर और श्रेष्ठ है और अपनी बुद्धिमानी की वजह से विश्व विख्यात भी हैं। नर के लिए इसी प्रकार से एक हिन्दी का शब्द है पुर्लिंग इस शब्द को भी पुरु + लिंग से जोड़ कर बनाया गया है। हिंदी भाषा के निर्माण में हिन्दू ब्राह्मण ने ऐसी शब्दावली का प्रयोग किया है जिसमें युनानियों की जीत से जोड़कर
शब्दों को बनाया गया है यह विचार ब्राह्मण को युनानी जता रहा है। कुछ शब्दों के जो असली अर्थ थे उन्हें तोड़ मरोड़ कर उनका अर्थ ही बदल दिया गया। पुरू राजा युनानियों से हारा था ऐसा बताया गया है। तो पुरू हार का प्रतीक है, यानि जो युनानियों से हारा वो है पुरुष, मनोवैज्ञानिक तौर पर ब्राह्मण किसी को भी महान पुरुष भी कहेगा तो मानसिक रूप में जैसे ही कोई पुरुष होना स्वीकार करेगा तो युनानियों से हारा हुआ हो गया, यानि मन ही मन मूलनिवासी के ऊपर विजय प्राप्त की झूठी मानसिक शब्दावली से (इसीलिए प्रचलित किया गया है मन के हारे हार है मन के जीते जीत) और मूलनिवासियों की असली श्रेष्ठ बौद्ध शब्दावली को छुपा दिया गया है। वैसे इस नकली शब्दावली का असर अब हिन्दू ब्राह्मण ठाकुर वैश्या पर ही है आज बौद्ध जागृति से। बौद्ध होना यानी दुनिया का सबसे बुद्धिमान होना, मन पर जीत हासिल करने वाली दुनिया की सबसे बुद्धिमान कौम से जुड़ा हुआ होना और बौद्ध को विश्व में श्रेष्ठ स्तर पर होना स्थापित करता है और जीत हासिल किए हुए मूलनिवासी को भी स्थापित करता है चूंकि युनानी को महान नन्द वंश ने भी हराया और महान चंद्रगुप्त मौर्य ने भी मानसिक डर युनानी सेल्यूकस में पैदा किया। इस नकली शब्दावली को भी हमारे देश के पाठ्यक्रम से हटाया जाना जरूरी है इसीलिए मूलनिवासियों की सरकार ही देश को श्रेष्ठतम विकास दे सकती है। ऐसे ही राजपूत शब्द को हमारे देश के श्रेष्ठ राजाओं से जोड़ कर दिखाया जा रहा है और इसी शब्द को मुसलमान भी प्रयोग करता है, इस शब्द पर मानसिक रूप से संशय उत्पन्न होता है, राजपूत एक गाली का रूप हो सकता है यानि जो रांडों से पैदा हुए वह राजपूत। इसलिए ऐसी शब्दावली का प्रयोग हमारे महान श्रेष्ठ बौद्ध राजाओं के लिए वर्जित किया जाना चाहिए। वैसे हमारा पूरा इतिहास और बहुत से मन से खोजे गए अविष्कार नालंदा विश्वविद्यालय में सुरक्षित थे। इस पूरे इतिहास, मनोवैज्ञानिक ख़ोज और शब्दावली को जलाकर नष्ट किया गया था और इसे हिन्दू ब्राह्मण ने वहां से चुराया भी होगा ऐसा प्रतीत होता है। नकली धर्म और नकली शब्दावली से देश के मूलनिवासियों पर मानसिक जीत हासिल करना ही नकली धर्म की आड़ थी, जिसे जाग्रत मूलनिवासी बौद्ध भंग करके पूर्ण सत्यता प्राप्त कर स्थापित करते जा रहे हैैं और नकली धर्म का दुर्भाव मूलनिवासी बौद्धों पर भंग हो जाता है। मानसिक रूप से मनोबल गिराने की शब्दावली और नकली धर्म दोनों दर्शाते हैं कि हिन्दू ब्राह्मण महान बौद्धों के सामने कितना कुंठित सा महसूस करता है, इसीलिए ही हिन्दी भाषा को हिन्दू ब्राह्मण पूरे देश के पाठ्यक्रम में लागू करवाना चाहता था और केन्द्र सरकार के रूप में मूलनिवासी की सरकार कभी भी नहीं बनने दी गई थी। इसीलिए हिन्दू ब्राह्मण बच्चों के पाठ्यक्रम में रामायण और महाभारत बचपन में ही पढ़वाना चाहता है और साजिश से सत्ता हासिल करने की शुंग इत्यादि की जीत के रूप में दर्शाकर हार की मनोवैज्ञानिक सोच के रूप में पैदा करने वाले नकली धर्म ग्रंथों को पढ़वाकर मूलनिवासियों के परिवारों में मानसिक रूप से हार वाली कलह पैदा कर सके एवं जो हमारे मूलनिवासी राजाओं के नाम का उपयोग रामायण महाभारत में हारे हुए दिखाकर स्वयं को जीते हुए का वंशज़ जताकर मूलनिवासी को मानसिक रूप में हारे हुए का वंशज़ जताकर मनोवैज्ञानिक जीत दिखाने की मानसिक बिमारी ग्रस्त साज़िश थी और उन साजिश करने वाले करैक्टरों को नकली प्रेम जताकर हमारे लिए भगवान के रूप में थोपा गया। उसी नकली धर्म का परिणाम हमारे देश में मूलनिवासियों के मन पर दिखाई दे रहा है। जो गरीबी, लाचारी हमारे देश में दिखाई दे रही है उसका मूल कारण नकली धर्म बनाने वाले मानसिक मनोरोगी लोग हैं जिन्होंने इस झूठे और नकली धर्म को हमारे देश में नकली शब्दावली के साथ हमारे मूलनिवासी बौद्धों के मन पर थोपा। कृष्ण को हरि बोला गया है। हरि यानि मोहम्मद मुस्लिम धर्म का संस्थापक, फिर हमारे देश के मुसलमान से किस बात की चिढ़ दिखाई जा रही थी बीजेपी के द्वारा। असल में जिन मुस्लिमों से विद्वेष फैलाया जा रहा है वो कभी मूलनिवासी बौद्ध रहे होंगे और कभी प्राचीन समय में ही मुस्लिम बने होंगे या बनाए गए होंगे। इसको आज ऐसे ज्ञात किया जा सकता है कि भारतीय मुसलमान एक तो नीच बताया गया है और इसमें भी ऊंच नीच वाली जातिगत व्यवस्था है जिस प्रकार से हिन्दू ब्राह्मण के द्वारा वर्णवाद को भारतीय बौद्धों से जोड़कर दिखाया गया था। दोनों धर्मों को हमारे देश में एक नकली सोच के तहत जोड़कर प्रचारित किया गया। रामायण में दस मौर्यों को दर्शाया गया है दस सिर वाला रावण और रावण का एक भाई बताया गया है जिसका नाम रखा गया है अहि रावण यानि अहीर यानी यादव। एक भाई बताया गया है महि रावण यानि महिषासुर यानि आदिवासियों के आराध्य।
सिंधु घाटी सभ्यता का वृषभ का जुड़ाव सम्राट महिषासुर के भैंसे से जोड़कर देखा जा सकता है, जिसे बदल कर नकली धर्म में भैंसा दिखाया गया है
मौर्यों अहीरों को मानसिक रूप से नकली धर्म की आड़ में राक्षस बता कर मनोवैज्ञानिक हार से जोड़ कर दिखाया गया और हर साल जलाया जाता था। कितना ज्यादा मनोवैज्ञानिक विद्वेष हमारे पूर्वजों पर, और अपने ही पूर्वजों से मानसिक बैर यानि अपने ही परिवार के प्रति पिता के प्रति बैर। अब वो सभी मूलनिवासी जिनके घरों में विद्वेष है आसानी से समझ सकते हैं नकली धर्म का मनोवैज्ञानिक असर। इन्द्रजीत यानि मेघनाथ यानि रावण का बेटा जो सांकेतिक भाषा में जैन धर्म का बताया जा सकता है, यानि जो इंद्रियों को वश में करते थे वह जैनेन्द्र यानि उज़्बेकिस्तानी हिन्दू या कहें तो मुगल, और मुगल का जुड़ाव इस्लाम से, और इस्लाम पैदा हुआ सम्राट अशोक के द्वारा स्थापित 84000 बौद्ध स्तूपों से। यानि रावण के पुत्र के रूप में मेघनाथ यानि मोहम्मद। उसे भी नकली धर्म ग्रंथ में हिन्दू राम के नपुंसक भाई लक्ष्मण ने हराया था ऐसा बताया जा रहा है। एक प्रकार से हिन्दू ब्राह्मणों को हिन्दू वैश्या उज़बेकी जैनियों पर भी नकली धर्म की आड़ में द्वेष थोपा गया है। राम यानि शुंग यानि हिन्दू ब्राह्मण जिसने मौर्य साम्राज्य के आखिरी राजा को खत्म किया। जो असलियत में विलेन है और हत्यारा है ऐसे टुच्चे करैक्टर को मूलनिवासियों के सामने नकली भगवान बना कर पेश करना यानि मानसिक बिमारी की चरम सीमा है। एक तो ये भगवान ही नहीं है ऊपर से हत्यारा है और ऊपर से चिढ़न से हारा हुआ है और अल्पायु में मानसिक अपंग मौत भी मरता है जैसे आज के समय में सड़ातन धर्म का मनोवैज्ञानिक असर झूठ पर बनाई गई बीजेपी सरकार के जेटली सुषमा पर्रिकर अटल का हुआ है। यह तो उसी प्रकार हो गया कि टुच्चे जैसे करैक्टर को पूजकर देश के बच्चों को किस प्रकार का मनोवैज्ञानिक सत्य दिया जा रहा था। मनोवैज्ञानिक रूप से एक टुच्चा करैक्टर जो मानसिक अपंग स्थिति में हारा हुआ है उस टुच्चे करैक्टर को भगवान बता कर मूलनिवासियों पर थोपना एक बहुत बड़े अपराधीकरण में आता है और इस टुच्चे करैक्टर को भगवान बता कर भगवान शब्द का भी अपमान किया गया है और हमारे देश की मूलनिवासी परंपरा का भी। रामायण नामक नकली ग्रंथ में रावण यानि मौर्य की हार असंभव है उसकी नाभि में रखे अमृत से, नाभि में रखा अमृत यानि मनोवैज्ञानिक रूप में दर्शाया गया है सुकिति बुद्ध के द्वारा दिया गया लोट्स सूत्र जो नाभि से जुड़ा हुआ है। यानि जब तक बौद्ध लोट्स सूत्र पर कार्य करते रहेंगे इन्हें हराना नामुमकिन है। मौर्यों के महान बौद्ध इतिहास को टुच्चता से नकली धर्म की आड़ में मनोवैज्ञानिक रूप में हार का प्रतीक बताना, परन्तु सत्यता इसके विपरीत है जिनके नाम का उपयोग नकली धर्म ग्रंथों में हार में दिखाया गया है वो असलियत में जीते हुए मूलनिवासी राजा हैं इसीलिए दो नकली धर्मों का जाल बुना गया था। चूंकि बचपन में साफ मन पर जो पढा़या जाता है वह बालक मन पर लिख दिया जाता है और बड़े होने पर भी उसका असर रहता है जब तक मन स्वयं जागृत अवस्था में ना आए। जिस मन पर रामायण महाभारत से पैदा किए गए नकली धर्म की हार वाली मानसिक सोच से चिड़न यानि द्वेष का असर हो वो भी पारिवारिक कलह से, वह बुद्ध नहीं हो सकता लीडर नहीं बन सकता । इसका एक बेहतरीन उदाहरण हैं विनोद कांबली, जिस समय में विनोद कांबली दुनिया के बेहतरीन क्रिकेटर कहे जा रहे थे उस समय में उनके मन में टैलीपैथी से चिड़न इत्यादि देकर उनके मन को दबाया गया और उनको भारतवर्ष में मानसिक साथ भी प्राप्त नहीं हो पाया मूलनिवासियों का चूंकि नकली धर्म को पूजने से और देश में फैलाने से मनोवैज्ञानिक असर से सबका मन बंधा था और विनोद कांबली पर जातिवाद की हीनता भी असर दे रही होगी। वहीं पर सचिन तेंदुलकर को नकली धर्म की वजह से कई बार जीरो पर आउट होने पर भी मानसिक रूप से नकली धर्म वालों ने मानसिक साथ दिया और वह खेलता रहा इसके विपरीत विनोद कांबली के प्रति द्वेष रूप देकर कांबली की ऊर्जा को पारिवारिक विद्वेष में बदला गया और विनोद कांबली के मन को बांधा गया चिढ़न के साथ। ऐसे भी देखा जा सकता है कि नकली धर्म के फैलाए जाल से तेंदुलकर का मानसिक साथ दिया गया। अगर मूलनिवासियों को मानसिक रूप से बौद्ध जागृत अवस्था का ज्ञान और खुद का धम्म होता तो आज विनोद कांबली दुनिया के सर्वश्रेष्ठ बौद्ध खिलाड़ी के रूप में स्थापित हो गए होते। जैसे अब नकली धर्म से मुक्त बौद्ध मूलनिवासी महान बौद्ध होने का गर्व महसूस करते जा रहे हैं और इस शब्दावली को भी मूलनिवासी बहुजन सरकार बनाकर नए पाठ्यक्रम के रूप में स्थापित किया जाना है।
रामायण महाभारत में कुछ महान मूलनिवासी राजाओं के नाम को काल्पनिक विलेन के रूप में दर्शाया गया है जैसे रामायण का पात्र बाली और मूलनिवासी बौद्ध राजा बलिराज। यहां मनोवैज्ञानिक तौर पर सुग्रीव और बाली के बीच राजपाट, सुग्रीव की पत्नी को छीनना इत्यादि को काल्पनिक रूप में चिढ़न या राग द्वेष के रूप में पारिवारिक कलह के रूप में स्थापित किया गया। दूसरे तरीके से देखा जाए तो हमारे मूलनिवासी बौद्ध समाज को बन्दर बता कर भी अपमानित किया गया नकली धर्म ग्रंथ में। जबकि असलियत में हमारे एक बुद्ध का ही डंका बजता है पूरे विश्व में सोचो बेचारा हिन्दू ब्राह्मण और मुगल कितने कुंठित होंगे महान बौद्धों की श्रेष्ठ बुद्धि से। मनोवैज्ञानिक रूप में जो इन धर्म ग्रंथों को पढ़ चुके हैं या देख चुके हैं और विपसना इत्यादि नहीं करते हैं उनके मन को फंसाकर पारिवारिक कलह कराया जाता था। परन्तु जो बौद्ध जागृत अवस्था प्राप्त कर लेते हैं वे अपने आप ही श्रेष्ठ स्थापित हो जाते हैं। जो बौद्ध पारिवारिक रूप से एकजुट होकर देश की सत्ता हासिल कर सकते हैं । इस प्रकार से नकली काल्पनिक धर्म (mythology) की आड़ में नकली धार्मिकों को मनोवैज्ञानिक रूप से दोषी कौम का जता कर मन में डर पैदा करना आसान होता था और मनोवैज्ञानिक तौर पर चारों तरफ से घेरकर अपने मन अनुसार कार्य करवाया जा सकता था। जो भंग अवस्था में नहीं होते हैं उनके मन में टैलिपैथी से डर भेजना आसान है। जैसे मायावती जी के साथ आज किया गया है मानसिक रूप से घेरकर। इसका एक और बेहतरीन उदाहरण है जदुनाथ कायस्थ और सर्वपल्ली राधाकृष्णन का। इसका विवरण महेंद्र यादव जी की फेसबुक पोस्ट से प्राप्त होता है।
जब सर्वपल्ली ने जदुनाथ कायस्थ की थीसिस की चोरी की थी और अपनी किताब में छपवा दिया था तो जदुनाथ कायस्थ को पता चलने पर उसने कलकत्ता हाई कोर्ट में वाद दायर किया। वह इस केस को जीता हुआ था चूंकि उसके पास अपनी थीसिस को जमा करने के सबूत थे, परन्तु इस अध्याय से हिन्दू ब्राह्मण सर्वपल्ली की साख मिट्टी में मिल रही है ऐसा जानते हुए जदुनाथ कायस्थ को मनोवैज्ञानिक रूप में डरा कर समझौता करने पर मजबूर किया गया यहां भी अगर कायस्थों ने भी जदुनाथ का मनोवैज्ञानिक साथ दिया होता तो माहौल आज कुछ और ही दिखाई देता और टीचर्स डे एक चोर के नाम पर नहीं बनाया जाता इसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी बच्चों पर नहीं पड़ता , जो चोरी से श्रेष्ठ दिखाता है वो चोर है असलियत में वह बुद्धि का दुरुपयोग कर चोरी की फिराक में ही लगा रहेगा इसलिए ऐसे चोर करैक्टरों से भी देश को बचाना जरूरी हो जाता है। शब्दों के उचित प्रयोग से मन की ऊर्जा⚡ से सत्य को स्थापित किया जाता है। वैचारिक दृष्टिकोण से और घटित घटनाओं को जानने से वासुदेव और शुंग जैसे साजिश करने वाले करैक्टरों को भगवान बता कर प्रचारित करने से आज ब्राह्मण शब्द का अर्थ ही निकल कर आता है गोबर गणेश। यानि गोबर बुद्धि वाला।
मानसिक बिमारीग्रस्त जो चिड़न का रूप है झूठ बोलता है सत्य छुपाता है दूसरों को गुमराह करने के लिए नकली धर्म ग्रंथ बना कर साजिश करता है(शुंग और वासुदेव दोनों इसके उदाहरण हैं), फिर झूठ बोल कर धन लूटने के लिए बीजेपी की ईवीएम चोर सरकार बनाता है फिर , सुषमा जेटली अटल सिकंदर की तरह द्वेषपूर्ण कृत्य से मानसिक बीमार ग्रस्त रह कर सड़ातन स्थिति में स्थित रहकर मर जाता है, चूंकि नकली धर्म के रूप में मानसिक साजिश की जा रही थी। जब तक मूलनिवासी इन साजिश करने वाले करैक्टरों को पूज रहे थे तब तक वे अपनी मानसिक ऊर्जा उन लोगों को दे रहे थे जो साजिश करते थे। आज साजिश करने वाले स्वयं ही खत्म हो रहे हैं। आज जिस हिन्दू ब्राह्मण ने नकली धर्म की आड़ में इस्लाम परोसा है, वहीं दूसरी तरफ मुस्लिम के सबसे बड़े दुश्मन के रूप में भी उभर कर सामने आया है और उनके खिलाफ ही प्रोपोगेंडा फैलाने में लगा हुआ है। नरेंद्र मोदी की सरकार बनाने के लिए पहले नकली धर्म की आड़ में मूलनिवासी जो कभी मुस्लिम बने होंगे और जो आज मुस्लिम धर्म के अनुसार निचले दर्जे के बताए जाते हैं उन लोगों को मरवाया गया और फिर उसका खूब प्रचार किया गया। यानि मानसिक रूप में छोटी जाति वाला मुस्लिम भी हिन्दू ब्राह्मण और मुगल का दुश्मन है।
शब्द मनोविज्ञान से सिर्फ बुद्ध और बौद्ध शब्द ही हमारे देश में सर्वश्रेष्ठ कहा जाता है और संपूर्ण सत्यता को अपने मन से स्थापित करने की भग्न्ता हमारे देश में बौद्धों को ही प्राप्त होती है चूंकि बौद्ध सभ्यता में हमारे देश की परंपरा में बुद्ध की बुद्धि से जुड़ाव हर बौद्ध के तरंग कण में मौजूद है चूंकि प्राचीन बौद्धों की बुद्धि से उत्पन्न तरंग कण भी हमारे देश में विद्यमान होंगी। इसको गहराई से ज्ञात करने के लिए जिन स्थलों पर प्राचीन बौद्ध विहार या विश्वविद्यालय रहे हैं वहां आज के समय में कुछ खास बच्चों को उनकी बुद्धि पर रिसर्च करने के लिए रखा जाना चाहिए। बुद्ध शब्द के साथ भी हिन्दू ब्राह्मण की चिढ़न को देखा जा सकता है, बुद्ध यानि संपूर्ण सत्य का ज्ञाता, और हिंदी भाषा में अत्यधिक चिढ़नवश बुढ्ढा शब्द ईजाद किया गया बुजुर्ग के लिए।
इन सभी सच्चाईयों को मनोवैज्ञानिक रूप से स्थापित करने के लिए असली इतिहास और शब्दों के असली अर्थ उनके पैदा होने की पृष्ठभूमि को भी लिखा जाना आवश्यक हो जाता है और सही शब्दावली को ही पढ़ाया जाना आवश्यक हो जाता है जिससे देश के मूलनिवासी बच्चों पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी श्रेष्ठ रूप में ही स्थापित हो। किसी भी शब्द की उत्पत्ति का मूल कारण है और उसके पीछे का इतिहास है जिसकी जानकारी होना जरूरी है इसलिए नकली धर्म पर आस्था को जोड़ा गया। परंतु आस्था अगर रखनी ही है तो असली भगवान बुद्ध और अपनी श्रेष्ठ बुद्धि में रखनी है ताकि हर सत्यता को बुद्धि बल से देखा जा सके, खोजा जा सके जाना जा सके महसूस किया जा सके।
जैसे सिखी बुद्ध और गुरु नानक साहेब का महान सिख धर्म का निर्माण, गुरुमुखी में सिख शब्द का प्रयोग हमारी प्राचीन पाली प्राकृत भाषाओं का जुड़ाव दर्शाता है कि सिख धर्म में हमारे महान बौद्धत्व का जुड़ाव है और सिखों का लंगर चलाना मूल रूप से बौद्धत्व की मानवता का ही मूल रूप है और 28 बुद्ध में एक बुद्ध का नाम सिखी बुद्ध भी है।इसी प्रकार से पगड़ी भी हमारे प्राचीन सभ्यता में पहनने का रिवाज रहा है जिसे पुराने शिलालेखों मूर्तियों इत्यादि में मौर्य राजाओं को पगड़ी के साथ दर्शाया गया है। इसलिए सिख धर्म में प्राचीन बौद्ध इतिहास की छाप बरकरार है
ऐसे ही पाली प्राकृत भाषा का जुड़ाव देश की प्राचीनतम भाषा तमिल से भी जुड़ा हुआ है इसलिए तमिल भाषा पर भी शोध आवश्यक है। इसी प्रकार से हमारे देश की सभी भाषाओं में पाली और प्राकृत भाषा का जुड़ाव साफ तौर पर दिखाई देता है। अब पाली प्राकृत भाषा का अन्य भारतीय भाषाओं के साथ रिसर्च होना आवश्यक हो जाता है, चूंकि हमारी प्राचीन भाषाओं के कुछ शब्दों के मतलब को हिन्दी में टुच्चे शब्द बनाकर पढा़या गया हैं जो हमारे देश की प्राचीन भाषाओं की शब्दावली के अर्थ को बिलकुल उल्टा ही दर्शाते हैं, जिससे अर्थ का अनर्थ दिखाई देता है। हमारी महान परंपरा को नकली धर्म में टुच्चता के साथ प्रस्तुत किया गया है और नकली धर्म की आड़ में मनोवैज्ञानिक रूप से महान बौद्ध मूलनिवासियों के स्वाभिमान को ठेस पहुंचाने का काम भी किया गया है। वैसे आजादी के बाद देश में दो धर्म बनाने की मानसिक टुच्चता दिखाई गई थी। इसके पीछे बहुत बड़ी साज़िश थी, हिन्दू ब्राह्मणों का ईरानी हिन्दू मुगल वैश्या के साथ बनाया गया आज का सनातन यानि सड़ातन, और मुस्लिम, सिर्फ दो धर्म और दोनों विदेशी के, भारतीय मूलनिवासी का कोई भी धर्म नहीं, सिखों को भी हिन्दू कहा, यानि ईरानी गुलाम शब्द थोपा गया और पूरे देश में नकली धर्म के मंदिरों का जाल फैला कर लाउडस्पीकर लगा कर मूलनिवासियों के मन में नकली धर्म की मानसिक टुच्चता को मनोवैज्ञानिक रूप में टैलीपैथी से फैलाया गया। जैसे हम लंका को आबाद करते हैं तो मनोवैज्ञानिक रूप में मौर्य साम्राज्य की स्थापना करते हैं तो यह हमारी सभ्यता की जीत है। हमारे इतिहास को छुपाकर उसके लिए टुच्चता वाली शब्दावली का प्रयोग किया गया है जिसे नकली धर्म की आड़ में संस्कृत में लिखा गया है। हम जब नकली धर्म की जबान बोलते हैं तो वह अपने ही पूर्वजों को गाली देने जैसा है। जैसे कि मेरे एक फेसबुक मित्र ने बोधगया का विश्लेषण किया है कि सम्राट अशोक ने इस स्थान को संबोधी कहा है मनोवैज्ञानिक रूप में बोध के संग यानि बुद्धि जागृति से संबंधित। बोधगया यानि बुद्धि गई, संबोधी यानि जागृत बुद्धि के संग। ऐसा नाम रखना वो भी उस स्थान का जो बुद्ध से हमारे मूलनिवासी इतिहास से, बुद्धि जागृति से जुड़ा हुआ है। यह एक प्रकार की मनोवैज्ञानिक साजिश थी। अगर पुष्यमित्र शुंग जिसे राम से जोड़ कर दिखाया गया है और जिसने साजिश करके बौद्ध मौर्य राजा ब्रहद्रथ को मारने वाला ही है तो ऐसा करैक्टर हमारे देश में पूजनीय कतई नहीं हो सकता है। साजिश करने वाले का मानसिक रूप तो विक्षिप्त है। ऐसे दूषित करैक्टर का मंदिर बनाया जाना यानि दूषित मन को पैदा करके उसे सड़ातन असर प्रदान करना है यह सड़ातन असर देश के मूलनिवासियों के विरुद्ध चलने वालों जैसे जेटली सुषमा अटल जैसों पर ही रहता है। ऐसा ही साजिश से भरा विवरण वासुदेव का बताया गया है। यानि नकली धर्म की आड़ में साजिश करने वालों को धर्म के रूप में थोपा गया। अब जो भी सिकंदर की तरह हमारे देश में महान मूलनिवासी बौद्ध के विपरीत साजिश करने की सोच भी रखता है उसकी मानसिकता सिकंदर की तरह ही महामारी के रूप में नष्ट हो जाएगी इसका बेहतरीन उदाहरण है आज का कोरोना। जब सिकंदर ने महान बौद्ध सभ्यता वाले नन्द वंश पर आक्रमण किया था तो वह मानसिक रूप से विक्षिप्त होकर महामारी की चपेट में आकर अल्पायु में ही मर गया था और आज कोरोना का देश में आना। हमारा बौद्धत्व, हमारी सभ्यता आज भी 83 देशों में स्थापित है और वह मानसिक सम्मान और प्रेम हमें उन देशों से प्राप्त हो ही रहा है। देश के सत्य और पूर्ण सत्य पर आधारित इतिहास का लिखा जाना और बच्चों को सिर्फ वही मनोवैज्ञानिक रूप में पढ़ाया जाना अति आवश्यक हो जाता है। सिर्फ इतिहास ही नहीं बुद्धि को जगाने के मनोवैज्ञानिक तरीके भी आज शोध के विषय होने चाहिए ताकि हमारे बौद्ध इतिहास का जो मनोविज्ञान है उसपर अलग से शोध हो सके और बुद्धि के और भी छुपे हुए रहस्य हैं वो उजागर किए जा सकें। इसलिए ही आज की आवश्यकता के रूप में बौद्ध मूलनिवासी सरकार का होना ही हमारे देश को मनोवैज्ञानिक रूप से अपराध बोध से मुक्त कर सकता है और भी बहुत से मुद्दों के हल जागृत बुद्धि से खोले जा सकते हैं।
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