डर

डर एक स्वाभाविक रूप से मन में आने वाली भावना है जिसका कारण कभी भगवान सुकिति बुद्ध ने दिया था एक सूत्र के रूप में। जिसने डर का अहसास लिया है उसके लिए डर से सहम जाना, अपने लक्ष्य को छोड़ देना, अपने आप को छुपाना, अपने मन को दबाव में रखना या फिर आवेश में आकर अपने आप का बचाव करना ऐसे बहुत से मानसिक संवेदनाओं से मन को गुजरते देखा जा सकता है। वह बाल्य मन जिसे सबकुछ जानने की इच्छा होती है उस पर जब माता पिता अपने स्वयं के डर से डरकर बच्चे के मन पर थोपते हैं तो ऐसा देखा गया है कि जिस बच्चे के मन पर इसका प्रभाव बैठ जाता है वह बच्चा आजीवन उस डर से लड़ता रहता है परन्तु उससे मुक्त नहीं हो पाता है और बिना जागृति के वह अपने बच्चों में भी बांट देता है/ देते हैं।जब भगवान सुकिति बुद्ध ने अपने मन के भावों को विस्तार पूर्वक बताया था तो उसमें उन्होंने उन बातों का भी जिक्र किया जिनका मनोवैज्ञानिक प्रभाव उनके मन पर पड़ा था। जीवन में जो बातें मन पर असर छोड़ती हैं वो हैं मन के भाव। जब बचपन में मां किसी बात को समझाती है तो बच्चे उनका कहना नहीं मानते, चूंकि मां के मन में यह बात वैचारिक दृष्टिकोण से पहले से ही अपने माता-पिता से जुड़ी हुई है कि वो कहना नहीं मानती थी अपने माता-पिता का यानि वो दृष्टिकोण जो उसके माता-पिता के मन में उसके प्रति पहले से ही बैठा हुआ है वहीं बच्चे के मन पर थोपा गया बिना स्वयं के मन की जागृति के।
जब अपने मन को खुद को पता है कि तृष्णा मेरे स्वयं के मन की है तो बच्चे के मन को सिर्फ अपने मन के अंदर से ही पहुंचाया जाता है कि वह बुद्धि से जो जानना चाहता है वह उसे पता है। चूंकि बच्चा इस जीवन में बहुत कुछ जानने के लिए पैदा हुआ है और जब वो माता पिता की थोपी गई तृष्णा से मुक्त होगा तभी उसकी बुद्धि आविष्कार कर सकती है।अब जिस बच्चे में स्वयं के अंदर डर है तो उसे अपने मन में स्वयं ही झांकना होगा कि वह डर उसके मन में कहां पैदा हुआ। चूंकि तृष्णा जब मन पर बैठती है तो सही गलत का आकलन होने लगता है और उसी सही गलत के चक्कर में बालक मन पर दोष मढ़ा दिया जाता है। अब जो बड़ा व्यक्ति अपनी तृष्णा या डर से मुक्त होने के लिए अपने माता-पिता को ही दोषी मानने लगता है वह स्वयं के मन के भीतर पड़ी तृष्णा को आग लगाता है और अंदर ही अंदर जलता जाता है, चूंकि ऐसे में वह अपने माता-पिता के प्रति अपने ही मन में द्वेष जगाकर खुद को उनकी ऊर्जा रूपी प्रेम से वंचित कर रहा है। यही द्वेष आगे चलकर डर के कारण के रूप में पैदा होता है। यही डर का असली कारण है। जब किसी बात को सही मानकर माता-पिता से द्वेष भाव पैदा करते हैं तो वही भाव आगे जाकर द्वेष करने की आदत बना लेता है और आगे चलकर डर के रूप में परिवर्तित होता है।
अब ये सभी घटनाएं बालक के मन में अपने जीवन में किस किस रूप में पैदा हुईं वह अपने खुद के ही मन में अंदर जाकर उसकी जड़ से भंग किए जाते हैं। यह भंग अवस्था ही पूर्ण सत्य अवस्था है जो हमारे माता-पिता के मन के साथ संपूर्णता स्थापित करता है।
जिस प्रकार से फैलाया गया है कि चीजें खाने से बिमारियां होती हैं यह एक प्रकार का मनोवैज्ञानिक डर है जो एक बच्चे के मन पर डरी हुई मां थोपती है। बिमारी उसके नज़रिये से पैदा होती है। नज़रिया यानि जो काम हम कर रहे हैं उसको देखने का दृष्टिकोण ही नज़रिया बनता है। हमारे शरीर की जागृत अवस्था हमें हर सत्यता से वाकिफ कर देती है। जैसे कि मां बच्चे को किसी भी खाने की चीज के लिए रोकती है तो वह अपने मन में स्वयं जाकर सच्चाई को जानने के बाद अपने बच्चे पर अपने विचार थोपना बन्द कर देगी चूंकि बच्चे को वही सब पसंद आता है जो माता पिता स्वयं भी पसंद करते होंगे। जब माता पिता अपने मन से ऐसे विचार को ही भंग कर देते हैं तो वह बच्चे के मन में भी स्वयं ही भंग होता जाता है। बच्चा जब किसी भी कार्य को माता पिता के विपरीत करता है तो उसके अंदर डर बैठता है जिससे वह अंदरुनी रूप में लड़ता है। यही दृष्टिकोण मनोवैज्ञानिक रूप में थोपा गया नजरिया है।यही दृष्टिकोण मनोवैज्ञानिक रूप में माता पिता अपने बच्चों पर थोपने लगते हैं जबकि वे स्वयं अपने मन में देखें तो उन्होंने स्वयं उस विचार को अपने मन से भंग नहीं किया है।

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