देश के महान बौद्ध आविष्कारकों को जातियों में विभाजित बताया गया

Chapter lll
   देश के महान बौद्ध आविष्कारकों को नकली धर्म में बताया जातिवाद 
‌अगर खुद के मन पर और विचारों को पढ़ने पर ध्यान केंद्रित किया गया है तो सच्चाई को मन के भीतर से भी जाना जाता है। जैसे कि मन के अंदर झांककर अपना इतिहास और उसका सच जानने के लिए मन को उस खोज पर लगाते हैं तो वह उस सच्चाई की तरफ जाने लगता है। इसी सच्चाई को हमारे इतिहास और अपने मन से इतिहास को जानने में लगाते हैं तो मन अपने अंदर से सच्चाई तक पहुंचा देता है। जैसे नालंदा विश्वविद्यालय की सच्चाई को जानने के लिए मन को लगाया जाए तो ऐसा प्राप्त होता है कि जो बच्चे भग्न अवस्था को प्राप्त कर लेते होंगे उन्हें ही भंगी उपाधि दी जाती होगी। ऐसा ज्ञात है कि यह महान भंगी वर्ग राग द्वेष को भंग करके अपने मन से ही शरीर में होने वाली सभी रासायनिक क्रियाओं को महसूस कर लेते होंगे, शरीर के अंदर ही ये आज के अणु विज्ञान इत्यादि के आविष्कार ये मन में ही महसूस कर लेते होंगे ऐसा प्रतीत होता है। चूंकि नालंदा विश्वविद्यालय जब जलाया गया था तो उसमें इतना पुस्तकों का भंडार था जो छह महीनों तक जलता रहा था। देश में नालंदा जैसे बहुत से विश्वविद्यालय थे जिनमें एक तक्षशिला (तक्षक नागवंशी से जुड़ा) विश्वविद्यालय भी है जो कि आज पाकिस्तान में है वह भी महान बौद्ध इतिहास की बुद्धि की विचारधारा से जुड़ा हुआ है। इसके अलावा बहुत से बौद्ध विश्वविद्यालय आज खुदाई में भी प्राप्त हो रहे हैं। इसी प्रकार से जैसे आज के कुम्हार हैं इन्होंने सिंधु घाटी के काल में ही मिट्टी पर प्रयोग करके उनसे बहुत सी उपयोगी वस्तुओं का निर्माण किया होगा ऐसा ज्ञात होता है चूंकि सिंधु घाटी के काल में ईंटों का आविष्कार करना और उनसे निर्मित अवशेषों का आज तक मिलना और यह खोज कितनी बड़ी साबित हुई इसका प्रमाण आज भी खुदाई के द्वारा प्राप्त उन ईंटों से निर्मित अवशेषों के सही सलामत मिलने से ज्ञात होता है। मिट्टी के बर्तनों का आविष्कार करना भी इसी महान बौद्ध वर्ग के द्वारा ही किया गया होगा जो बौद्धों की बुद्धि की श्रेष्ठता को हर मन पर स्थापित करती है। फेसबुक से प्राप्त एक विवरण से ज्ञात होता है कि जब ईरानी हिन्दू हमारे देश में आया था तो बौद्ध सभ्यता में कुएं देखकर ये अचंभित हो गया था क्योंकि ये तो एक नकली टुच्चा सा करैक्टर यानि इंद्र को पूजता था जिसे यह बारिश का देवता कहता था। ऐसा आज भी हमारे देश में प्रचलित है। हमारे देश में बुद्धि बल से तांबे और लोहे का आविष्कार और प्रयोग करने के विभिन्न आविष्कार भी किए गए हैं, जिन्हें मुगल काल में लोहार कहा गया होगा। 1955 के बाद हिन्दू ब्राह्मण ने हमारे देश के मूलनिवासी बौद्ध की परंपरा को विक्षिप्त करने के लिए ही नकली धर्म बना कर मनोवैज्ञानिक झूठ नकली गीता प्रेस गोरखपुर के माध्यम से फैलाया गया था और वर्णव्यवस्था बना कर झूठ बोल कर अपनी बिमार मानसिकता का भ्रमजाल फैलाया गया। हमारे देश में महान बौद्ध भगवान बना करते थे उस महान भगवान शब्द का प्रयोग नकली धर्म की आड़ में बौद्ध इतिहास की सत्यता को छुपाने के लिए ही किया था और मनोवैज्ञानिक रूप में मूलनिवासियों को तृष्णा भी थोपी गई थी और झूठ गीता प्रेस गोरखपुर के माध्यम से प्रचारित किया गया। नकली धर्म की आड़ में मन से सत्य की खोज करने वाले सभी मूलनिवासियों को कुंठा में जाति बताया गया। जबकि ये मन को वश में करके आविष्कार करने वाले महान बौद्ध हैं और अपनी बुद्धि की वजह से हमेशा ही श्रेष्ठ रहे हैं और हिन्दू ब्राह्मण और ईरानी हिन्दू इनके सामने अपने आप को सदैव टुच्चा और हारा हुआ ही महसूस करता रहा है जिसका प्रमाण है नकली धर्म जिसमें हमारी महान बौद्ध सभ्यता को टुच्चता से और हमारे जीत हासिल किए हुए महान बौद्ध राजाओं को और इतिहास को हारा हुआ दर्शाना चाहा और महान मूलनिवासियों के मन में अपने ही पूर्वजों को घृणा से देखे जाने का भ्रम बनाया गया था और टुच्चे से करैक्टर शिव की आड़ में अपनी नफरत को थोपा था। हमारे देश में मूल परंपरा में इन नालंदा जैसे विश्वविद्यालयों में आविष्कारकों को अनुसंधान हेतु अलग अलग वर्ग में डाला जाता रहा होगा जिन्होंने अपनी बुद्धि के बल से बहुत से आविष्कारों को किया होगा,और फिर शुरुआत होती है विदेशी आक्रमणकारियों की घुसपैठ की । जब सिकंदर ने हमारे देश में घुसपैठ की थी तो उस समय महान नंद वंश का काल था, सिकंदर ने महान बौद्ध देश में घुसपैठ की और उसकी पूरी सेना बुरी तरह से हारने के बाद महामारी का शिकार भी हुई, यानि द्वेष का मारा सिकंदर बौद्धों से पंगा करके मानसिक अपंग स्थिति में पहुंच गया और वह मन से विक्षिप्त होकर बिमारियों से ग्रस्त हुआ चूंकि राग द्वेष मुक्त मन बिमारियों से मुक्त होता है और बौद्ध राग द्वेष मुक्त समाज का निर्माण कर रहे थे। इसे पूरे विश्व से बौद्ध साहित्य को प्राप्त उसपर मानसिक शोध किया जाना चाहिए। उसके बाद सिकंदर का सेनापति आया सेल्यूकस निकेटर जिसे सम्राट चंद्रगुप्त ने हराया, इसने हार कर अपनी बेटी को चंद्रगुप्त के लिए छोड़ दिया ऐसा एक टीवी सीरियल सम्राट अशोक के माध्यम से दर्शाया गया था, और उसके साथ ही अपनी हजारों की संख्या में सेना को भी यहीं छोड़ दिया गया था, इस हारी हुई सेना ने मौर्य काल में सेना बन कर सेवा की होगी। फिर इनमें से एक को सेनापति का दर्जा दिया गया होगा और इसने दसवें मौर्य का खून करके सत्ता हथिया ली ऐसा आज सोशल नेटवर्किंग पर माना जा रहा है। चूंकि इतिहास में पुष्यमित्र शुंग ने दसवें मौर्य का धोखे से खून किया था ऐसा इतिहास की सभी किताबों में पढ़ाया गया है और सोशल नेटवर्किंग साइट पर यह भी बहुत प्रचलित होता रहा है ब्राह्मण विदेशी वर्ग है जिसका इतिहास में सिर्फ यही एक जुड़ाव दिखता है। इसके साथ ही यह खुद ही ब्राह्मणों ने लिखा है कि वे विदेशी हैं जैसे तिलक ने और नेहरू ने अपनी लेखनी से स्पष्ट लिखा है। इस प्रकार से महान बौद्ध सभ्यता में नकली धर्म वाले पनौती की घुसपैठ शुरू हुई है ऐसा इस दृष्टिकोण से सत्य साबित होता दिखाई देता है। आजादी के बाद फैलाया गया जो जीता वही सिकंदर, परन्तु सत्य है कि जो जीते वह महान नंद और मौर्य, जो हारा वो सिकंदर, पर इस प्रकार का झूठ मनोवैज्ञानिक तौर पर किसने फैलाया होगा? जिसे इस मनोविज्ञान का फायदा दिखाई दे रहा होगा। अब इस प्रकार प्रचारित करने से भी हिन्दू ब्राह्मण का जुड़ाव युनानी से जुड़ता हुआ दिखाई देता है। वैसे भी सम्राट अशोक सीरियल में भी यह बताया गया था कि चंद्रगुप्त मौर्य के साथ सेल्युकस ने हेलेना की शादी की और सहस्र सेना हमारे देश में छोड़ी। अब आज के समय में अगर सोचा जाए कि वो सहस्र सेना हमारे देश में कौन है? इसी लिए इस प्रकार की नकली मनोवैज्ञानिक हारने वाली सोच का भ्रम नकली धर्म की आड़ में क्यों फैलाया गया? ताकि मूलनिवासी मौर्य और नागवंशी अहीर और महार चमार के श्रेष्ठता वाले इतिहास को छुपाकर शूद्र यानि सेवादार बताया जा सके। श्रेष्ठ को नकली धर्म की आड़ में मनोवैज्ञानिक रूप में थोपा गया अपनी टुच्चता को। हमारे देश में 11 वीं शताब्दी तक बौद्ध विश्वविद्यालयों में इस पनौती वर्ग का प्रवेश निषेध रहा होगा ऐसा प्रतीत होता है चूंकि मानसिकता से हिन्दू ब्राह्मण बिमारी ग्रस्त ही रहा है जिसका सबूत है आज का नकली धर्म और जेटली सुषमा पर्रिकर अटल पर मानसिक असर। नालंदा विश्वविद्यालय जलवाकर वहाँ के बौद्ध ग्रंथों और बुद्धि संग्रह को हिन्दू ब्राह्मण ने ही खलजी काल (11वीं शताब्दी) में हथियाने के लिए साजिश की होगी ऐसा प्रतीत होता है। यहाँ से इन्हें बुद्धि के प्रयोग, शरीर का अणुओं से होने वाले निर्माण, शब्दों का ऊर्जा अणुओं के साथ टैलीपैथी के रूप में फैल जाना, इत्यादि का पता चला होगा और इन्होंने उसे वहाँ से चुराकर मन की शक्ति का पता चलने पर खुद तो उस पर कार्य करना और बुद्धि को वश में करने के कार्य करने लगा और मुस्लिम राजाओं को भी अपनी तरह विदेशी बता कर उनकी चाकरी में लगा रहा होगा। परन्तु 1950 में आजादी के बाद इनको कोई वोट नहीं देगा और महान बौद्धों के सामने ये टटपुँजियो की तरह दिखाई देंगे । बौद्ध कौम बुद्धि में सर्वश्रेष्ठ है और बाबासाहेब आंबेडकर जैसे विद्वान महामानव पैदा करती है ऐसे डर का अनुभव करते ही इसके लिए इन्होंने नकली धर्म बनाया और उसमें अपने आप को झूठा श्रेष्ठ दिखाने के लिए नकली धर्म ग्रंथों का निर्माण किया, जिसमें मूलनिवासियों की श्रेष्ठता को छुपाकर छोटा दिखाने के लिए उनके पूर्वजों के नाम का प्रयोग करके नकली धर्म का और जातिवाद और वर्णवाद का निर्माण किया गया था और सभी किताबों में प्रचारित भी किया गया। प्राचीनतम बुद्ध के लिए सांकेतिक भाषा में बनाया गया नकली टुच्चा सा करैक्टर शिव, जो नीले रंग का जहर से भरा हुआ यानि चिढ़न से भरा दर्शाया गया था। चिढ़नवश बौद्ध स्तूपों को मनोवैज्ञानिक रूप से शिव टुच्चे का लिंग बताकर प्रचलित किया गया और बुद्धि स्तूप को लिंग बताकर प्रचलित करना यानि मूलनिवासियों के मन को वासनात्मक बनाने के लिए इस करैक्टर को प्रचलित किया जाना यानि विकृतिकरण मूलनिवासी बौद्धों का। शिव लंपट का बेटा बताया गोबर गणेश को और इस हाथी के सिर वाले टुच्चे करैक्टर को गणपति के नाम से संबोधन दिया गया और चूहे की सवारी कराई गई। यानि सर्वश्रेष्ठ बुद्धि वाले बुद्ध के लिए इस प्रकार का टुच्चता वाला प्रचार। सिंधु घाटी के बौद्धों ने धम्म चक्र के छः आरे यानि छह सूत्र दिए थे चूंकि सिंधु घाटी सभ्यता से प्राप्त सील पर छह आरे हैं। अपनी बुद्धि से जिसमें एक सूत्र विपस्सी बुद्ध के द्वारा दी गई विपसना भी रही होगी ऐसा प्रतीत होता है।
‌सिंधु घाटी सभ्यता से प्राप्त सील जिसमें ऊपर कोने में छह आरों का धम्म चक्र है। इस सील पर प्राप्त दो बातों में विशेषज्ञता है पीपल का पत्ता बौद्ध सभ्यता को दर्शाता है और यह एक आविष्कार को भी दर्शाता है कि पीपल वृक्ष के दिन और रात दोनों समय में आक्सीजन देने की महत्वपूर्ण खोज को हमारे बौद्ध मूलनिवासियों ने हजारों साल पहले ही मन से महसूस कर लिया था।
‌सुकिति बुद्ध ने धम्म चक्र में दो आरे यानि दो सूत्र बढ़ाने का कार्य किया होगा । यही धम्म चक्र सम्राट अशोक के काल तक 24 आरों का हो गया जो आज हमारे तिरंगे में स्थित है। गणेश के छोटे भाई के लिए कहानी बनाई गई मोर की सवारी वाले कार्तिकेय की यानि भगवान बुद्ध के बाद बौद्धत्व को पूरे विश्व में फैलाने वाले मौर्य साम्राज्य का संबोधन। शिव से लेकर कार्तिकेय तक सभी बौद्ध को एक परिवार बनाकर मनोवैज्ञानिक रूप में महान बौद्ध इतिहास को इस प्रकार विकृत कर दर्शाया गया। यही सत्य युग है। इसके बाद यूनानी राम यानि पुष्यमित्र शुंग 173BC. है इसे ही द्वापर युग कहा गया है। शुंग विक्षिप्त मानसिकता का मानसिक अपंग बताया जा रहा है जो चोरी से मौर्य राजा को मारता है और मानसिक अपंग स्थिति में सड़ातन असर से मरता है, ऐसे टुच्चे करैक्टर को भगवान बना कर पेश क्यों किया गया? यही है नकली धर्म की सच्चाई और उसकी आड़ में बौद्ध इतिहास का विकृतिकरण। अगला करैक्टर है कृष्ण यानि कृष्ण की आड़ में हरि यानि 5वीं शताब्दी का मोहम्मद। हरि सेलामत राय यह मोहम्मद यानि इस्लाम से जुड़ा हुआ शब्द है। मोहम्मद ने कौन सी भंग अवस्था प्राप्त की थी जो भगवान का दर्जा दिया गया? भगवान का दर्जा तो सिर्फ बुद्ध को ही प्राप्त हुआ है। एक करैक्टर इनका है ब्रह्मा, इसने अपनी बेटियों से संबंध स्थापित किए और मोहम्मद ने भी बच्चियों से ही निकाह किए। नकली हिन्दू धर्म में भी इन्होंने बताया कि ब्राह्मण यानि ब्रह्मा ने इस सृष्टि का निर्माण किया और इस्लाम में भी ऐसा ही प्रचारित किया गया यानि हिन्दू धर्म इस्लाम है। रामायण में 10 मौर्यों को सांकेतिक भाषा में रावण कह कर मौर्य साम्राज्य का अपमान किया गया और मौर्यों को मनोवैज्ञानिक रूप में विलेन वाली मानसिकता दी जिससे भावनात्मक रूप में वे विलेन होना महसूस करते रहे होंगे और अपने को हमेशा सच्चा और ईमानदार होते हुए भी नकली धर्म से मानसिक रूप से प्रताड़ित होते होंगे। उसके साथ ही अहि रावण जिसे रावण का भाई बताया गया है, वह कौन है? अहि यानि अहीर रावण, यानि यादव।अहि का पाली भाषा में मतलब होता है नाग, यानि नागवंशी ऐसा पाली भाषा के अनुवादकों ने बताया है। ये वही नागवंशी हैं जिन्होंने बौद्ध धम्म को मौर्यों की तरह ही बहुत प्रचलित किया था और अहीर की उत्पत्ति भी नागवंशी महारों से ही है। इस प्रकार से पूरा नकली धर्म और ग्रंथ में मूलनिवासियों को मानसिक रूप में हारा हुआ दर्शाया था जो असलियत में हमेशा ही जीत को प्राप्त हैं। जैसे लालू प्रसाद यादव मूलनिवासी यादव है और अपनी विद्वत्ता से हमारे समाज को जागृत कर रहे थे तो उनके लिए फैलाया जाने लगा कि वो विलेन यानि भ्रष्ट हैं इस प्रकार से नकली धर्म की वजह से एक उठते हुए मूलनिवासी लीडर को मानसिक रूप से मन में पहुंचाया गया कि वे भ्रष्टाचार में लिप्त हैं और नकली धर्म के फैलाए भ्रमजाल की वज़ह से यह लोगों के मन में फैलाना आसान हो गया कि वो अहीर रावण है और नकली धर्म के अनुसार वो विलेन हैं। यह पूरा नकली धर्म युनानी हिन्दू ब्राह्मण और ईरानी हिन्दू राजपूत वैश्या की घृणा और मानसिक टुच्चता का नतीजा हैं जिसकी वजह से जागृत मूलनिवासी इनके नकली धर्म की टुच्चता से आजाद महसूस कर श्रेष्ठता का अनुभव करना चाह रहे हैं और नकली धर्म सड़ातन रूप में इनके ही मन पर असर दे रहा है जिसका तुरंत का उदाहरण जेटली सुषमा पर्रिकर अटल है। यह नकली धर्म वालों की विक्षिप्त मानसिकता का नतीजा है और तब तक खत्म नहीं होगा जब तक ये महान बौद्धों की शरण में अपना सबकुछ ना त्याग दें । मुगल काल में भी मूलनिवासी बौद्ध अपनी बुद्धि के लिए खास बने रहे हैं और बौद्ध परंपराओं में लगे रहे हैं। इसके खास उदाहरण कबीर साहेब, रविदास साहेब और गुरु नानक साहेब हैं जिन्होंने मुगल काल में भी बुद्धि के प्रयोग से अपने को अलग और खास बना कर रखा, इसी काल में रविदास साहब ने चमार का आविष्कार किया, चमार यानि चर्म, मांस ,रक्त में होने वाली प्रक्रियाओं को मन से देखने वाले महान बौद्ध की अगली पीढ़ी। जब मन अत्यधिक असंतोष में फंस जाता है तो उसका मन को कारण नहीं पता होता है। बौद्धत्व में वह कारण मन के अंदर ढूंढा जाता है और चमार बनने की प्रक्रिया में अपने मन की ऊर्जा⚡ को जो दूसरों से राग या द्वेष(चिड़न, डर इत्यादि)में व्यय होती है ,वह अपने ही शरीर को स्वस्थ रहने में लगाई जाती है,और अपने विचारों को पकड़ने में लगाई जाती है | हमारा शरीर हमारी चमड़ी यानि skin से संवेदनाओं (sensation) को ग्रहण करता है, ऐसे ही हमारे शरीर में खून यानि रक्त पूरे शरीर को उस ऊर्जा ( ATP molecules) बाकी minerals और आक्सीजन मांस में पहुंचाता है ताकि मांस में होने वाली सभी शारीरिक क्रियाएँ (protein synthesis) सुचारू रूप से होती रहें और पूरा शरीर स्वस्थ रहे,और जब हमारे मन में राग द्वेष इत्यादि अटकता है तो मन में वह दिमाग पर बोझ देना शुरू कर देता है, यह बोझ हमारे दिमाग के एक भाग (hypothalamus) पर असर देता है जिससे पिट्यूटरी ग्रंथि (pituitary gland) पर असर आता है जो दिमाग से ही जुड़ा होता है और इससे हारमोनल असंतुलन (hormonal Disbalances) होता है, जिससे शारीरिक विकार या बिमारी पैदा होती हैं। नकली धर्म की आड़ में यह राग द्वेष मूलनिवासी के अपने ही पूर्वजों यानि अपने परिवार से बनाया गया है और वह था नकली धर्म से वासना को थोपकर श्रेष्ठ बौद्ध मूलनिवासियों को भगवान बुद्ध के विपरीत नकली धर्म से चिढ़न को थोपना। इस चिढ़ से मुक्त होने के लिए अपने मन में झांक कर कारण जानने के पश्चात अपने माता-पिता को सच्चाई बता कर अपने प्रति माता-पिता के मन में राग द्वेष मुक्त हुआ जाता है। बौद्धत्व से इस विकार को जहाँ से विचारों में राग द्वेष यानि बिमारी पैदा हुई है उसे जड़ तक खत्म किया जाता है। परन्तु रविदास साहब ने सांस को रोककर उसे शरीर के रोग वाले भाग में पहुँचाने की प्रक्रिया को करने से उसे रोग मुक्त करने की तकनीक विकसित करके चमड़ी मांस और रक्त के द्वारा ऊर्जा के सदुपयोग और सोए हुए अंग को मन से जोड़ कर जागृत अवस्था में भी लाकर बिमार मानसिकता से मुक्त कर मन पर विजय प्राप्त करने और शरीर को रोग मुक्त रखने की तकनीक को ईजाद किया होगा और इसी अवस्था को उपाधी के रूप में चमार कहा गया था। इस तकनीक से मन पर भी विजय प्राप्त होती है और मन स्वयं के बस में आ जाता है। जो मन से चर्म मांस और रक्त पर विजय प्राप्त करे वही कहलाता था चमार। पर नकली धर्म की आड़ में प्रचारित किया गया जाति के रूप में। जो अपने आप को महान बौद्धों के बीच में टुच्चे की तरह देखता है तो अपने को श्रेष्ठ दिखाने के लिए ईरानी मूल के ठाकुर हिन्दू और वैश्याओं हिन्दू के साथ मिलकर बनाया गया नकली धर्म जिसमें जातिवाद और वर्णव्यवस्था बनाकर अपने को महत्वपूर्ण दिखा रहा था बस अंदर से निम्न मानसिक स्थिति में ही पैदा होता रहा होगा। यही है नकली धर्म और उसकी आड़ में मूलनिवासी पर अपना राग द्वेष थोपने की साजिश। नकली धर्म बनाने वाले ब्राह्मण हिन्दू की महामूर्खता देखो कि जिन तकनीकों से शरीर को रोगमुक्त रखा जाता है पूर्ण जागृत रखा जाता है उस प्रकार की तकनीक को ये हिप्नोटिस्म की तकनीक बता कर नकली धर्म का भ्रम और शिव जैसे टुच्चे करैक्टरों को भगवान बता कर मूलनिवासी के मन पर थोप रहा था। नारायण दत्त श्रीमाली की 'प्रैक्टिकल हिप्नोटिस्म' पब्लीशर पुस्तक महल, दिल्ली नामक किताब में चमार बनने की प्रक्रिया को हिप्नोटिस्म की प्रक्रिया बताया है और इसी हिप्नोटिज्म के सहारे से मूलनिवासियों पर नकली धर्म थोपा गया था। अब हमारे महान पूर्वज बुद्धि के सर्वश्रेष्ठ प्रयोग से शरीर को स्वस्थ रखने के लिए बुद्ध और चमार बना करते हैं और उससे ये नकली धर्म वाले सम्मोहित हो जाते हैं तो इसे सम्मोहन करना बता कर प्रचारित किया गया जो कि अत्यंत हास्यास्पद है। आज नकली धर्म से ये सम्मोहन करने के लिए ही चमार जैसी प्रक्रिया को अपने घरों में करते होंगे और अपनी पूरी बुद्धि का प्रयोग कर नकली धर्म थोपते रहे होंगे। ऐसी हरकतों से ही पता चलता है ब्राह्मण की चोर वाली स्थिति का। इन्होंने हर चीज़ हमारे देश से चोरी करके अपना नाम देकर दिखाई है। इसी कुंठित सोच की वजह से ब्राह्मण ने मासूम बौद्धों के दिमाग़ को, जो कि अपने मन को स्वस्थ रहने के लिए खुश रखने के लिए, अत्यधिक उत्तेजना से बचाने के लिए चमार बना करते रहे हैं उससे इनका दिमाग़ सम्मोहन में आ जाता है तो इन्होंने आजादी के बाद चमार जैसी महान उपाधी को जाति ही बता दिया और महान को दलित इत्यादि बता कर हीन भावना को प्रचारित किया। नकली धर्म से शांत बौद्धों पर अपनी वासना थोपने और भ्रमित करने के लिए नकली धर्म ही बना डाला, जिसमें हमारे पूर्वजों को विलेन दिखा कर नकली कहानियों और धर्म ग्रंथों को बनाया गया और फिर मनोवैज्ञानिक रूप से मूलनिवासियों के लिए और उनकी महान बौद्धत्व शांत और राग द्वेष से विमुक्त संस्कृति के विपरीत एक कुंठित अवस्था में चिड़न का माहौल पैदा किया गया नकली धर्म की आड़ में । नकली धर्म कुछ और नही बस हिन्दू ब्राह्मण की कुंठित अवस्था ही है। सिर्फ मूलनिवासियों के मन पर थोपा गया चिड़न और वासना का व्यापार है। इसीलिए इसे बनाए रखने के लिए ही बौद्ध मंदिरों का विकृतिकरण किया और प्राचीन मंदिरों में जो बौद्ध विरासतें हैं उन्हें भी नकली धर्म की आड़ में छुपाया गया और इस्लामिकरण कर यानि मोहम्मद के हरि नाम से भी फैलाया गया। ब्राह्मण अपने मन से मूलनिवासियों के मन में चिड़न और वासना भेजता होगा मानसिकदूरसंवेदन (telepathy) से और जिनका मन वश में नहीं है वे भ्रमित हो जाते हैं। मूलनिवासियों को अपने मन को पूर्ण सत्यता पर स्थिर करना होता है ताकि ब्राह्मण के द्वारा भेजे गए विचारों को मन में आते ही भंग करके मानसिक विद्वेष और भ्रम से मुक्त रह सकें। कबीर साहेब ने भी भंग अवस्था को प्राप्त कर यह शब्दावली दी थी " ना काहुँ से दोस्ती, ना काहूँ से बैर" । इतिहास में देखा जाए तो हमारे देश में बौद्ध संस्कृति को सबसे ज्यादा संरक्षण नागवंशियों ने और मौर्यों ने ही किया है इसीलिए हमारे देश में जहाँ भी खोदा गया है वहाँ से इनके सबसे ज्यादा पुरातात्विक अवशेष प्राप्त हुए हैं। साधारण शब्दों में बात करें तो हमारे देश में जितनी भी जातियों बनाई गई है नकली शास्त्रों में वे सभी मूलनिवासी बौद्ध हैं बाकी वर्ण वाले मूल रूप में हिन्दू ब्राह्मण और हिन्दू ठाकुर और वैश्या ही होंगे जिनका मूल विदेशी है।  
बौद्धत्व का एक और मानसिक रहस्य है और वह है पूर्ण जागृत अवस्था, यानि अपनी बुद्धि से ही हर सत्य को स्थापित करें, इसी को कहा गया है बुद्ध की शरण में अपनी बुद्धि को ले जाओ, यानि अपनी बुद्धि की शरण में जाओ और प्राचीन बुद्ध से जोड़कर संपूर्ण सत्य को अपनी बुद्धि में जानकर उसे स्थापित कर सको। जब हिन्दू ब्राह्मण यानि के नकली धर्म के द्वारा वासना को ही प्रेम बना कर हमारे देश में फैलाया गया कृष्ण की आड़ में,तो उन्होंने वासना के भ्रमजाल का आकर्षण पैदा किया यानि मोहम्मदीकरण किया गया। जिससे वे अपने मन को चमार बनाते हैं और ब्रह्मा की तरह बेटियों से भी संबंध स्थापित करते हैं इस्लाम की तरह और बाकी सभी को पकड़ा दिया गया नकली भगवान का घंटा ताकि स्वयं का मन उस नकली टुच्चे करैक्टर से प्रेम मांगे और जिनसे प्रेम करना है वह है स्वयं का मन और माता पिता और अपना परिवार जिसके प्रति नकली धर्म की आड़ में मूलनिवासी के घर में राग द्वेष पहुंचाया गया। जिससे स्वस्थ शरीर मन के जुड़ने से रहता है उसे ब्राह्मण से प्रेम प्राप्त करने के लिए आकर्षण में फंसाया गया। मन दूसरों से आकर्षित होता है और वासना रोगी हो कर बार बार वासना में फंसाता है और जब वासना की पूर्ति नहीं होती है तो मन चिड़न की तरफ जाता है और इसी चिड़न से पैदा अहंकार के सिर पर बैठने से शारीरिक बिमारियाँ पैदा होती हैं। स्वयं से प्रेम यानि राग द्वेष से मुक्त मन । अपना मन स्वयं के शरीर में झांककर उसे जागृत करता है और मन के अंदर से शरीर के बहुत से रहस्यों को उजागर करता है। स्वयं का जागृत मन स्त्री के जागृत मन से जुड़कर श्रेष्ठ बुद्धि की संतान को पैदा करते हैं और 
नकली धर्म बनाने का असली कारण था बाबासाहेब आंबेडकर जैसे बुद्ध विचारों से देश में सर्वश्रेष्ठ विद्वान का पैदा होने से रोकना चूंकि बाबासाहेब आंबेडकर कबीरपंथी थे। कबीरपंथी होने की वजह से बाबासाहेब के पिता के मन में परिवार से अत्यधिक स्नेह और विद्वता विद्यमान है जिसकी वजह से वे दुनिया के महान विद्वानों में विराजमान हो गए। इतने महान और विद्वान सिर्फ हमारे देश की असली बौद्ध कौम के विचारों में और परिवारिक पृष्ठभूमि में ही होते हैं । इसी से डर कर नकली धर्म, नकली भगवान और नकली कहानियाँ प्रचलित करके महान बौद्ध मूलनिवासियों को मानसिक रूप से वासना रोगी बनाने की मुहिम और नकली मंदिरों का जाल बनाकर हमारे देश में फैलाया गया भ्रमजाल था। एक भ्रमजाल इस तरह से भी विचारों में फैलाया गया था कि बिमारी का कारण खाने और पेट से होता है बल्कि बिमारियों का कारण है मन। मन जाग्रत है तो वह मन मैं ऐसे विचार जो राग द्वेष से जुड़े हुए हैं और जिनसे रोग पैदा होता है ज्ञात कर लेता है जिस विचार की शरीर को जरूरत ही नहीं है उसे भंग कर देता है। जागृत अवस्था में शरीर के मनोभाव को पहचानें तो जिस भी खाने वाली वस्तु की जरूरत शरीर को है मन उसे पहचान लेता है। जिस प्रकार से एक छोटा बच्चा मिट्टी खाता है इसका मतलब कोई विकार नहीं है इसका मतलब है कि मिट्टी से बच्चे को कैल्शियम और खनिज पदार्थ यानि मिनरल्स की प्राप्ति होगी और बच्चे का श्रेष्ठ मन उस अनुभूति को प्राकृतिक रूप में जानता रहा है। अब जो माता पिता उसे ऐसा करने से रोकते हैं यानि मिट्टी खाने को गलत सही करके बच्चे के मन पर दबाव बनाने लगते हैं ऐसे में बच्चे का मानसिक संतुलन तृष्णामय होने लगता है। एक प्रकार से देखा जाए तो बालक वही है जो माता-पिता का उसके प्रति बचपन से ही मानसिक दृष्टिकोण बनाया जाता है। अगर माता-पिता खुद किसी तृष्णा में फंसे हैं वैचारिक तौर पर तो वह तृष्णा जाने अनजाने अपने बच्चे को दे सकते हैं। जिस तृष्णा से बच्चे के मन को आजीवन लड़ना पड़ता है जब तक वह खुद ही अपने मन के भीतर का सत्य माता-पिता के सामने रख उनकी दी गई तृष्णा से मुक्त ना हो जाए या स्वयं ही मन की तृष्णा को भंग करने लगे।
 प्रकार से 2014 में मोदी की सरकार बनते ही दाल की जमाखोरी करके 250 रू. प्रति किलो तक दाल बिकवाई, इस दाल का जमाखोर तब भी अडानी को ही बताया गया था और वहीं आज गेंहू के लिए भी किया जा रहा है। ये वही नकली धर्म वाले हैं जो झूठ का प्रचार करके नकली धर्म बनाते हैं, घटिया कौड़ियों का सामान देश में भ्रम से अच्छा कह कर बिकवाते थे और सिर्फ एक नकली धर्म वालों की लाबी यानि ईरानी वैश्या को ही धन इकट्ठा करवाते थे। आज देश में जो भी सरकारी संस्थाओं को बेचा गया है वो सभी इसी नकली धर्म वालों की ही लाबी है जो आज बौद्ध देश में मानसिक बिमारियों से ग्रस्त हो गए हैं।
अडानी को भी घटिया पामोलिन तेल फार्च्यून रिफाइंड के नाम से, जो अमेरिका के लिए बेकार था को रिफाइंड अच्छा और सरसों के तेल और देसी घी से बिमारियाँ होती हैं ऐसा प्रोपेगेंडा और भ्रम फैला कर धन लूट करवाई गई थी। इसे अगर मन के भीतर से देखें तो मन इस सच्चाई पर जाकर खड़ा कर देगा। फार्च्यून रिफाइंड को अच्छा बता कर बिकवाया और झूठ से प्रचारित हिन्दू वैश्या अडानी को भी मानसिक अपंग बनाया गया। चूंकि चोरी से घटिया सामान को अच्छा बताकर नासमझ को खरीदने के लिए प्रेरित तो कर दिया गया परन्तु जो ऐसे घटिया सामान को लाया उसकी मानसिकता तो टुच्ची ही होगी। ऐसे ही एक हिन्दू वैश्या जाति वाला अग्रवाल भी लीद को मसाले में मिलाकर बेचते हुए पकड़ा गया यानि धन इकट्ठा करने के लिए मानसिक अपंगता करता हुआ और फिर ये बिमारियों से मानसिक अपंग स्थिति में मरे तो ऐसे में मूलनिवासियों को मनोवैज्ञानिक सच्चाई को जान लेना आवश्यक हो जाता है कि बौद्ध सभ्यता में कितनी ईमानदारी रही होंगी। नकली धर्म वालों में कोई ईमानदारी से कमाई करने की सोच नहीं थी बस सिर्फ धन लूटने के लिए मानसिक टुच्चता से वैश्यावृत्ति से चोरी करके मानसिक अपंग स्थिति में पहुंचने वाला ईरानी वैश्या हिन्दू अग्रवाल है बस। नकली धर्म वालों के प्रोपोगेंडे बौद्धत्व से साफ दिखाई देने लगे हैं कि बौद्ध देश के मूलनिवासियों के धन संपदा पर नज़र रखने वाले मानसिक अपंग स्थिति में जरूर आते हैं ऐसा आज साफ तौर पर दिखाई देने लगा है। 
कुछ ऐसा ही प्रतीत होता है कि जो मुगल काल के बाद जो मूलनिवासी बौद्ध मुसलमान बने थे वो दूसरे दर्जे के नीच मुस्लिम बताए गए हैं और मोदी राज में अत्याचार भी उन्ही पर किया गया था। बाकी राम मंदिर के नाम पर भी जमीन हिन्दू ईरानी और ईरानी मुस्लिम के बीच बांट दी गई और ईरानी मूल के मोदी को नकली ओबीसी बना कर पूरा खेल रचवाया गया था। इसी प्रकार से बौद्ध मूलनिवासी की प्राचीन बौद्ध विरासत, सिंधु घाटी की हड़प्पा सभ्यता मोहनजोदड़ो और गुरु नानक साहब की जड़ों को पाकिस्तान बनवा कर मूलनिवासी बौद्ध से अलग करने की भी मानसिक अपंग साजिश नकली धर्म वालों ने ही की थी।
इसी प्रकार से हमारे देश में नकली धर्म की आड़ में हरिद्वार स्थापित किया गया, हरि यानि मोहम्मद यानि इस्लाम धर्म का संस्थापक। हिन्दू धर्म की आड़ में फैलाया गया भारत में इस्लामीकरण और महान मूलनिवासियों का भी इस्लाम की तरह ही वर्गीकरण है। बौद्धों की श्रेष्ठतम बुद्धि को दुनिया भर में आदर मिलता है, अपने देश के हर एक मूलनिवासी की प्रशंसा कीजिए, मन में द्वेष को भंग कर सम्मान कीजिए प्रेम कीजिए चूंकि पूरे विश्व में जो दिल को प्रेम से संबोधित किया गया है वह भी हमारी बौद्ध सभ्यता से जुड़ा हुआ ही प्रतीत होता है जिसमें पीपल के पत्तों का आकार दिल यानि प्रेम से जोड़ा गया होगा । इसीलिए भी पीपल को हमारी बौद्ध सभ्यता में श्रेष्ठ माना जाता रहा है जिससे दिन और रात दोनों समय में आक्सीजन प्राप्त होती है। इसे ही द्वेष रूप में फैलाया गया था कि पीपल के पेड़ पर भूत रहते हैं जो कि बिमारी ग्रस्त मानसिकता वाले नकली धर्म बनाने हिन्दू ब्राह्मणों के द्वारा प्रचारित मनोवैज्ञानिक मनोरोग यानि मनुरोग था।आज देश में किसान आंदोलन की क्यों जरूरत पड़ी और इसका नकली धर्म से क्या जुड़ाव है? 
      मुकेश अंबानी का सबसे बड़ा बिज़नेस है पैट्रोकैमिकल इंडस्ट्री, जो अब धीरे धीरे खत्म होने की कगार पर है, और बैटरी से चलने वाले कार इत्यादि के आने के कुछ साल बाद ईरानी मूल के वैश्या हिन्दू अंबानी का धंधा पूरी तरह से खत्म हो जाएगा, तो इस नकली धर्म के ईरानी हिन्दू को और उसके धंधे के लिए और ब्राह्मणवाद के लिए, नये धंधे खोजे गए और प्राइवेटेशन का नया खेल शुरू किया गया ताकि इन नकली धर्म वालों की मानसिक अपंगता जारी रहे और ये अटल बिहारी की तरह रगड़ रगड़ कर मरें। ब्राह्मणों को मानसिक अपंग मौत मारने के लिए और वैश्या हिन्दू को लाइलाज बिमारियों से ग्रसित करने के लिए ही नरेंद्र मोदी जो कि ईरानी मूल का हिन्दू वैश्या है को नकली धर्म को डूबने से रोकने के लिए और वैश्या हिन्दू को देश की संपत्ति सौंपने के लिए ही ईवीएम चोरी वाली सरकार बनाई जाती है, वैश्या हिन्दू मुकेशअंबानी को शिक्षा, किसान की उपज में बड़ी हिस्सेदारी ( भारत में प्रारंभिक खाद्य पदार्थ यानि दाल चावल गेहूं इत्यादि पर बिजनेस नहीं चमकाया जा सकता है, इसलिए ही भारत सरकार खाद्य पदार्थ की खरीद करती है और उसे गरीबों में वितरित करती है)और देश के पैसे पर 
ईरानी वैश्या हिन्दू को हमारे देश की संपत्ति में चोरी और अडानी को रेल, एयरपोर्ट इत्यादि के धंधे पकड़ाए गए हैं। धर्म खत्म तो धन पकड़ने का दूसरे तरीके का विदेशी मूल के हिन्दू का प्राइवेटेशन का नया खेल और हिन्दू ब्राह्मण वैश्या को मानसिक अपंगता में रखने का माडल तैयार किया जा रहा है। पहले नकली धर्म में फंसा कर मूलनिवासी बौद्ध को देश की सत्ता पर बैठने से रोका गया था और अब संसथानिक लूट के लिए ईवीएम चोरी सरकार बनाई गई। नकली धर्म बनाने वालों को देश से मुक्त करने के लिए इनका सामान लेना बंद कर दो, मूलनिवासी बौद्ध के सामान का उपयोग करना शुरू करो। फैला दो मूलनिवासी बौद्ध वालों को और उनके सामान का विवरण। नकली धर्म बनाने वाले चोर मानसिक अपंगो का और उनके सामानों का पूर्ण बहिष्कार करो। यूनानी हिन्दू ब्राह्मण मानसिक अपंग और वैश्या हिन्दू अंबानी अडानी के हर सामान का देश में बहिष्कार करें। यह एक नया आंदोलन है जो देश में रह रहे चोरों से देश को आजाद कराएगा, मानसिक आजादी का आंदोलन नकली धर्म बनाने वाले युनानी हिन्दू ब्राह्मण मानसिक अपंग और ईरानी वैश्या हिन्दू का देश में पूर्ण बहिष्कार करना शुरू करें। 
देश में सिर्फ मूलनिवासी बौद्ध के सामान ही उपयोग करें। 

    जब अटलू टुच्चे की सरकार बनी थी तो आते ही उसने प्याज 100 रू किलो तक बिकवाई, और महाराष्ट्र में बीजेपी की सरकार के समय प्याज 50ps/kg बिकी, क्यों? No minimum support price, why? वैसे अटलू टुच्चे की मौत, वह मरा था, 15 साल तक सड़ कर रगड़कर
2014 में मोदी की सरकार बनते ही दाल की जमाखोरी करके 250 रू. तक दाल बिकवाई, इस दाल का जमाखोर तब भी अडानी ही था,ये कमाते नहीं हैं धन लूटेरे हैं और बाकी मूलनिवासी बौद्ध होने की वजह से कमाते हैं धन लुटेरे नहीं है, ये देश का धन लूटकर शाह जैसे टुच्चे की औलाद को धनवान तो बनवा देते थे पर आज जाग्रत मूलनिवासियों से इन्हें मानसिक अपंग होने से कौन रोकेगा, बौद्धत्व को लाओ नकली धर्म वालों को मानसिक अपंग रहने दो
ईरानी मूल के चाय वाले को भी ऐसे ही लाया गया था नकली ओबीसी बना कर,और अडानी को भी घटिया पामोलिन तेल, जो अमेरिका के लिए वेस्ट था को रिफाइंड अच्छा और सरसों के तेल से बिमारियाँ होती हैं ऐसा प्रोपेगेंडा फैला कर धन लूट करवाई गई थी, फार्च्यून रिफाइंड को अच्छा बता कर बिकवाया और अडानी को भी मानसिक अपंग बनाया, ऐसे ही एक ईरानी मूल का हिन्दू लीद को मसाला बता कर बेचते हुए पकड़ा गया, वह ईरानी वैश्या हिन्दू अग्रवाल है , नकली धर्म वालों के प्रोपेगेंडे से बाहर आने के लिए नकली धर्म वालों को अपने से दूर करना शुरू कर दो, अपने मूलनिवासी संगठनों से जुड़ कर खुद के बौद्ध धम्म से जुड़ें और देश को बौद्धमय करें।

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