धर्म ग्रंथों को लिखने वालों की टुच्चता

Chapter IV


धर्म ग्रंथ या उसे लिखने वालों की टुच्चता


गीता का एक श्लोक हैं, कर्म किए जा फल की इच्छा मत कर ऐ इंसान जैसे कर्म करेगा वैसे फल देगा भगवान, फल मन स्वयं पैदा करता है और यह दृष्टिकोण हमारे माता-पिता बचपन से पैदा करते रहते हैं। हमारे देश के ऐतिहासिक मूलनिवासी परंपरा के अनुसार संपूर्ण सत्य को अपने मन से ज्ञात करने वाला ही बुद्ध कहलाता है भगवान है, परन्तु मंदिर में ब्राह्मणों ने हमारे इतिहास से नकली भगवान बनाए और उन्हें नीले रंग का जहर से भरा यानि चिड़न से भरा दिखा कर पेश किया और अपनी वासना, चिढ़न और साजिशों को नकली भगवान के रूप में सजा कर पेश किया। जिस घर में एक दूसरे से अत्यधिक चिढ़न है ऐसे घर में मानसिक संतुष्टि नहीं होगी और ऐसे लोग कहां भागते थे, नकली धर्म के मंदिरों में। नकली धर्म से मनोवैज्ञानिक टैलीपैथी से पहले पारिवारिक असंतुष्टी फैला दो उसके बाद जब वे अपने ही घर में असंतुष्ट हो जाएं तो नकली प्रेम जताकर अपना मुरीद बना लो और नकली भगवान के पैर पड़वा लो। हमारे देश की मूलनिवासी परंपरा में भगवान बना जाता है भग्न अवस्था में पहुंच कर, परंतु युनानी( ब्राह्मण के युनानी होने के प्रमाण मनोवैज्ञानिक रूप से प्रचलित शब्दावली इत्यादि में मनोवैज्ञानिक रूप में ढूंढा गया है जिसे सम्राट अशोक सीरियल में सेल्यूकस की हेलेना के साथ छोड़ी गई सहस्र सेना से जोड़कर देखा जा सकता है) वैसे पुष्यमित्र और दत्तामित्र, दोनों में मित्र है और इनमें एक हिन्दू ब्राह्मण है और दूसरा यूनानी राजा है। यह तथ्य भी युनानी और हिन्दू ब्राह्मण को जोड़कर दिखाता है। हिन्दु ब्राह्मण ने हमारे बुद्ध और बौद्ध इतिहास में घुसपैठ करके उसका स्वरूप बिगाड़ने की और इतिहास में मूलनिवासियों में चिढ़ इत्यादि को बढ़ावा देने की मूर्खता दिखाई । ड्रेन आफ ब्रेन करने के लिए मूलनिवासियों के बच्चों के मन को जातिवाद इत्यादि से हीन करने के लिए ही नकली धर्म का निर्माण किया गया था। भगवान  बुद्ध के कथन अनुसार बालक जब मां के पेट में होता है तो मां के मन से जुड़ा होता है । उस समय में बालक मन पर जो कुछ भी मां के मन से जोड़कर लिख दिया जाता है बालक के लिए वही एक सत्य के रूप में स्थापित होता है तब तक जब तक बालक स्वयं ही उसे भंग ना कर दे या जिन माता पिता के द्वारा जो दृष्टिकोण दिया गया है अपने बालक को वे स्वयं ही उसे जानने के पश्चात स्वयं के मन से और बालक के मन से भंग ना कर दें।(Brain start saving the information which have been transferred from mother's mind as well as the child brain starts forming in the womb of mother) और वह उसी के अनुसार ही कर्म करता है जब तक वो अपनी बुद्धि से स्वयं के मन का संपूर्ण सत्य और उसका असर ना जान ले यानि बुद्ध बन जाए। एक बालक के मन पर जो भी लिखा जाता है वह उसके माँ और पिता के द्वारा लिखा जाता है। बालक उन्ही विचारों को मन ही मन लेता जाता है जैसा उसके माता पिता उसके लिए सोच पैदा करते जाते हैं। हमारी बौद्ध परंपरा के अनुसार पूर्ण सत्यता को प्राप्त माता पिता अपनी संतानों के मन में पूर्ण सत्यता का निर्माण कर सकते हैं इसलिए हमारी परंपरा के अनुसार माता पिता बालक के लिए श्रेष्ठ भगवान होते हैं, और फल भी वही पैदा करते हैं। एक प्रकार से मां पिता अपनी अधूरी इच्छाओं को बच्चों को प्रदान करते हैं जो मानसिक रूप से तो अदृश्य हैं परन्तु मां के मन से टैलिपैथी के रूप में बालक के मन में विचार जा रहे होते हैं। जैसे की अगर कोई मां अपने लिए कोई ख्वाब पैदा करती है और वह पूरा नहीं हो पाता तो वह अपने बच्चों के मन में उस विचार को सहज रूप से पहुंचा देती है जिसे बालक मन स्वयं का विचार समझने लगता है। जब बालक अपनी बुद्धि की सत्यता को पहचानने लगता है यानि अपने विचारों को समझने लगता है तो वह अपने मन के विचारों को अपने अनुसार बना कर मन से स्वयं के लिए फल पैदा करने लगता है, परन्तु माँ के मन से बालक का मन जुड़ा होता है। इसीलिए ही नकली धर्म में बुद्ध के बुद्धि स्तूपों को लिंग बताकर प्रचलित करके मूलनिवासी स्त्रियों के मन में अत्यधिक वासना की भावना को जाग्रत कर उनके बालकों के मन को वासनात्मक करके बौद्धत्व के विपरीत दिशा में ले जाने के लिए ही नकली धर्म  प्रचलित किया गया था। ऐसे बालकों का कर्म बुद्धि को तीक्ष्ण करने के बजाय बुद्ध जैसा लीडर बनने के बजाय वासना पूर्ति में लग जाता होगा । नकली धर्म के अनुसार जो हर स्त्री से वासनात्मक संबंध स्थापित करता फिरे वो कृष्ण ऐसा गीता प्रेस गोरखपुर के सस्ते साहित्य से फैलाया गया है दूसरी तरफ देखें तो कृष्ण की आड़ में हरि यानि मोहम्मद, और हमारे देश की संस्कृति अनुसार जो वासना के कारण को भी जान लें और मां के मन से प्राप्त सत्य को जान ले और भंग कर दें वो भगवान, जो संपूर्ण सत्य का ज्ञाता वह बुद्ध। बौद्ध वह है जिनकी बुद्धि जागृत है जो बुद्धि से बहुत श्रेष्ठ हैं परन्तु नकली धर्म से फल बदल कर ध्यान बंटाया गया लिंग यानि वासना की तरफ वो भी मानसिक रूप में और वो भी अफवाह के साथ हिप्नोटिज्म का सहारा लेकर(नारायण दत्त श्रीमाली की प्रैक्टिकल हिप्नोटिज्म में दूसरे के मन को वश में करने के लिए रविदास साहब की चमार बनने वाली प्रक्रिया से कुछ भाग चुराकर लिखा गया है । दूसरे तरीके से देखा जाए तो हिन्दू ब्राह्मण ने नकली धर्म की आड़ में अपनी चिढ़न को वासनात्मक रूप में मूलनिवासियों पर थोपा था। जैसे ही महान बौद्ध नकली धर्म को दुत्कारते हैं तो महान बौद्धों की श्रेष्ठ बुद्धि जागृत होकर अपनी श्रेष्ठता को स्थापित कर लेती है।


नकली धर्म का भगवान कौन है? मूर्तियां ही भगवान हैं वो भी नकली, और इनकी आड़ में पूरे देश में एक मनोवैज्ञानिक विचार थोपा जा रहा था आपके आसपास युनानी हिन्दू ब्राह्मण द्वारा जो मन से रविदास साहब वाली चमार बनने की प्रक्रिया करके जो मन को वश में नहीं कर रहे हैं उनके ऊपर नकली धर्म का प्रभाव थोप रहा था। परंतु नकली मूर्तियों की आड़ में फैलाया गया मोहम्मदीकरण यानि इस्लाम और वासना। दूसरे तरीके से देखा जाए तो एक स्त्री को जिसका मन नकली धर्म से लिंग प्राप्ति में फंसाया गया  नकली धर्म से उसे वासना को ही प्रेम बताकर अपनी वासना को उसके मन तक पहुंचाकर वासनात्मक बना कर मानसिक उत्पीड़न करना ही है नकली धर्म तो फल की पूर्ति नकली धर्म के अनुसार क्या होगी? वह है मोहम्मदीकरण यानि इस्लाम।  चूंकि नकली धर्म की आड़ में धर्म चलाने वाला है हिन्दू ब्राह्मण जो कि नकली धर्म का संस्थापक है, यूनानी मूल से जुड़ा हुआ प्रतीत होता है। उसे भारतीय मूल संस्कृति के हिसाब से समझें तो बुद्ध बनना हमारी सभ्यता में रहा है जिसका प्रमाण कबीर साहेब, रैदास साहब गुरुनानक साहब के रूप में आगे की संस्कृति में दिखाई दिया है। इसका एक दृष्टिकोण बनता है, जैसे मैं अपने पिता को बुद्ध जैसा महान मानता हूं तो मेरे पिता भी बुद्ध की तरह ही द्वेष मुक्त रह कर अपने परिवार से मानसिक रूप से प्रेम स्थापित करते रहेंगे तो स्वयं का घर और वैचारिक दृष्टिकोण बनेगा श्रेष्ठ बुद्धि वाला परिवार और अगर नकली धर्म पूजते थे तो दृष्टिकोण क्या था शिव टुच्चे जैसा नीला चिढ़ से भरा भंगेड़ी और यह नजरिया थोपा गया था मूलनिवासियों पर नकली धर्म की आड़ में। शिव टुच्चे करैक्टर को नकली धर्म से बताया गया विध्वंसक, गीता प्रेस गोरखपुर के  द्वारा थोपे गए नकली कहानियों के दृष्टिकोण को जबकि बौद्ध और बुद्ध और हमारी सभ्यता क्या है मानसिक रूप से दुनिया की सबसे बुद्धिमान कौम और पूरी दुनिया के मन में बौद्धत्व को स्थापित करने वाली । अगर वासुदेव जैसे साजिश वाले करैक्टर को हमारे देश में मानसिक अपंग माना जाए और सिकंदर को बौद्ध नन्द के प्रभाव से तुरंत ही महामारी से मरते देखे जाने से यह दृष्टिकोण अपने-आप ही दिखाई दे जाता है कि जो महान बौद्धों के विपरीत कार्य करेंगे वे स्वयं ही देश से खत्म हो जाएंगे। ब्रह्मा को सृष्टि का निर्माता बता कर ब्रह्मा यानि ब्राह्मण अपने आपको ही भगवान बता रहा था और नकली धर्म की आड़ में ये सिर्फ ब्रह्मा को मोहम्मद से जोड़कर ही दर्शाया गया है। जैसे ब्रह्मा ने सरस्वती, गायत्री नामक अपनी बेटियों से संबंध स्थापित किए और मोहम्मद ने भी अपनी ही बेटियों से निकाह किया। नकली धर्म की आड़ में हमारी सभ्यता में घुसपैठ करके हमारे बौद्ध इतिहास का विकृतिकरण या इस्लामीकरण किया जा रहा था जिसमें मन की जागृति का कोई स्थान नहीं है। एक तरफ नकली धर्म की आड़ में इस्लाम परोसा गया और दूसरी तरफ भारतीय मुस्लिम से भी बीजेपी द्वेष फैला रही है, ऐसा क्यों?  चूंकि जिन मुस्लिमों के प्रति द्वेष फैलाया गया था वो भारत देश के मूलनिवासी बौद्ध ही हैं जो कभी मुसलमान बना कर निचले स्तर के मुस्लिम बताए गए हैं। जैसे सुकिति बुद्ध से प्राचीन बुद्ध को नकली टुच्चे करैक्टर शिव से जोड़कर प्रचारित किया। इस करैक्टर को भंगेड़ी नशेड़ी बता कर प्रचारित किया और अपनी टुच्चता से उस सोच को हमारे समाज पर सम्मोहन और टैलीपैथी की आड़ में थोपा जबकि बौद्ध परंपरा में मन को पूर्ण सत्य पर स्थापित किया जाता है और एक महान बौद्ध बुद्धि से दुनिया में सबसे श्रेष्ठ कहा जाता है चूंकि दुनिया में दिमाग के 92% हिस्से का प्रयोग करने वाले सुकिति बुद्ध को माना जाता है, और दूसरी तरफ आधुनिक युग में आइन्सटाइन को सबसे बुद्धिमान कहा गया है जिसने तकरीबन 11% दिमाग का प्रयोग किया है। इसी प्रकार शिव का बेटा गणेश को बताया गया और गणपति बताकर प्रचारित किया गया। गणपति यानि गण के प्रमुख और उनके लिए हाथी के सिर वाले टुच्चे करैक्टर गणेश को प्रचारित कर हमारे महान श्रेष्ठ बुद्धि वाले पूर्वज़ को हाथी का सिर वाला बता कर प्रचारित किया गया। चूंकि गणेश हाथी के सिर वाले करैक्टर की उपज़ ब्राह्मण की है तो ऐसा वैचारिक दृष्टिकोण ब्राह्मणों की संतानों के लिए ही छोड़ देते हैं। हम अपने बच्चों को बुद्धि से श्रेष्ठ बुद्धि वाला पैदा होने का दृष्टिकोण बनाते हैं। इन्हीं साजिशों की वजह से ही हमारे इतिहास को दर्शाया नहीं गया और छुपाकर रखा गया और साजिश करने वाले वासुदेव को कृष्ण की आड़ में भगवान बताया गया जो कि मानसिकता से सिर्फ हाथी के सिर वाला ही होना है और हम मूलनिवासियों के विघ्न हटाने का ही कार्य करने के ही लायक है।


नकली धर्म का प्रभाव अटल जेटली सुषमा इत्यादि की साज़िश करने वाली बुद्धि पर पड़ते देखा जा सकता है। सारे देश से हमारी सभ्यता के अवशेष मिटाए गए और बौद्ध मंदिरों पर कब्जा कर शूद्र का प्रवेश वर्जित किया गया ताकि नकली धर्म की आड़ में इस्लाम परोसा जाए और नकली धर्म की आड़ में इस्लाम की तरह ही छोटी जातियों वाला वर्गीकरण किया जा सके। इसीलिए महान बौद्ध भंगियो को नकली वाल्मीकि पकड़ा कर मानसिक फल दिया गया सफाई का, जो भंगी (पाली भाषा का भंग यानि भगवान से जुड़ा शब्द है) महान बौद्ध हैं उन्हें ही यूनानी हिन्दू ब्राह्मण ने बौद्ध धम्म के बिलकुल विपरीत नकली धर्म बना कर सफाई कर्मी बना कर हीनता की भावना पैदा कर महान बौद्धों की ऊर्जा को अपने को श्रेष्ठ दिखने के लिए इस्तेमाल किया था। दुनिया के सबसे महान बौद्धों को नीचा दिखाया उनके अंदर नकली धर्म से हिन्दू ब्राह्मण ने अपनी हीनता को थोपा, तभी तो खुद को ऊंचा दिखा पाया। परन्तु इसे बौद्ध इतिहास और आज के महान बौद्ध की मानसिक बुद्धि को प्राप्त वैचारिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो बौद्ध कौम हमेशा से ही मानसिक जीत को प्राप्त कौम है जिन्हें हमेशा ही हर तरह से ब्राह्मण हिन्दू और ईरानी हिन्दू से मानसिक जीत हासिल रही है ऐसा ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखा जा सकता है। बौद्ध जागृति के साथ ही वर्णव्यवस्था भी उलटी हो जाती है। इसीलिए ही जो हमारे देश के महान बौद्ध थे जो बुद्धि से हमेशा ही श्रेष्ठ थे वो आज बुद्धि के कार्य करने के बजाय नकली धर्म की आड़ में सफाई कर्मी बना दिये गये थे। जबकि आधुनिक युग के सबसे ज्यादा ज्ञान प्राप्त करने वाले को बाबासाहेब आंबेडकर कहा जाता है। नकली धर्म ग्रंथों में महान बौद्धों को कुंठित सोच की वजह से लिखा गया अछूत, दलित, शूद्र इत्यादि ताकि इन शब्दों की आड़ में स्वाभिमान गिराया जा सके। पर महान बौद्ध हमेशा महान ही रहेगें और हैं भी। बौद्धत्व महान मूलनिवासियों के खून में है उनके पारिवारिक पृष्ठभूमि में है, उनके विचारों में है। नकली धर्म से बाहर आते ही महान बौद्ध की बुद्धि जागृत होने लगती है। इसको बहुत स्पष्ट रूप में समझने के लिए ब्राह्मण के लिखे काल को समझें, सतयुग यानि पूर्ण सत्य पर चलने वाला युग यानि सिंधु घाटी से लेकर मौर्य काल तक का बौद्ध काल। कलयुग यानि झूठ युग जिसमें ब्राह्मण के नकली धर्म और नकली भगवान भी चल जाएं। इसलिए ही ब्राह्मण मनोवैज्ञानिक रूप से कलयुग कलयुग कहता फिरता है ताकि लोग मानसिक रूप से हामी भरते रहे और झूठ का भ्रम बना रहे। इस झूठ के भ्रम को तोड़ने के लिए ब्राह्मण की बात को सिरे से खारिज करते हुए सत्य की मन में खोज पर अडिग रहने वाले मूलनिवासी अपनी श्रेष्ठ बुद्धि को जागृत करते जा रहे हैं। अपनी बुद्धि से बार बार सत्यता को खोजते रहने से मन स्वयं ही पूर्ण सत्यता को सामने ले आता है। जितना अपनी बुद्धि से सत्य की खोज करने पर लगाते हैं उतना ही बुद्धि जाग्रत होती जाती है और सत्यता पर मन को पहुँचा ही देती है और सत्य मन ही श्रेष्ठ और जीत हासिल किए हुए होता है और बौद्ध ही पूर्ण सत्य है।      


                      एक और श्लोक है जिसका भावार्थ कुछ इस प्रकार से दिया गया है जो कुछ होता है उसी की मर्जी से होता है उसकी मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता है। किसकी मर्जी के बिना? यह सिर्फ नकली धर्म ग्रंथों की टुच्चता है सत्यता को परखें तो एक बौद्ध मन जिसे स्वयं के मन को वश में रखा है भंग अवस्था में रखा है, उस श्रेष्ठ बौद्ध मन की मर्जी के अनुसार तो प्रकृति भी साथ चलती है। बुद्ध मन में प्रकृति से जुड़ने की भी क्षमता होती है। बचपन में बच्चे के मन पर माता पिता का प्रभाव होता है और उनके मन का प्रभाव बच्चे के मन पर रहता है। जैसे माँ बचपन में बच्चे के मन में गलत सही की धारणा पैदा करती है जिसके पूरे ना होने पर और अपने बच्चों को अच्छा दिखने के लिए गुस्सा चिड़न और डर देती है जो बच्चे के पूरे जीवन को प्रभावित करती है, यही गुस्सा चिड़न डर वह बालक मन अपने रिश्तों में ढोता रहता है जब तक वह स्वयं जाग्रत ना हो जाए और वह अपनी अगली पीढ़ी को जाग्रति पहुँचाए। जितना जागृत मन है बच्चे के मन पर उसका वैसा ही प्रभाव भी है। अब माता पिता की बुद्धि पर किसका प्रभाव है? इसीलिए ही नकली धर्म बनाया गया था तो उसका प्रभाव भी तो वही होगा जो विचारों में फैलाया गया मंदिरों का भ्रमजाल था इसीलिए इस भ्रमजाल को फैलाने के लिए ही घंटा श्लोक, रामायण पाठ, लाउडस्पीकर से फैलाया जाता था ताकि दूसरों के कानों में अपने नकली टुच्चे धर्म को टैलिपैथी से स्थापित किया जा सके। जब शब्दों को तरंगकण के रूप में प्रवाहित किया जाता है तो वह दूसरे के कानों से अंदर जाकर दिमाग में पहुंचाए जाते हैं। इन शब्दों को जिस सोच से प्रवाहित किया जाता है यह शब्द मन में जाकर स्थापित हो जातें हैं और मन पर असर छोड़ते हैं और इसी मनोवैज्ञानिक प्रभाव की आड़ में हमारी बौद्ध सभ्यता को कुत्सित मानसिकता से द्वेष से दिखाया गया था। इसलिए अपनी बुद्धि को जागृत करना हर मूलनिवासी का कर्तव्य है। यह धर्म ग्रंथ कुछ और नहीं है बस सिर्फ महान मूलनिवासी की मूल संस्कृति के प्रति नकली धर्म बनाने वालों की कुंठित अवस्था है। हमारे देश में बौद्ध मूलनिवासियों के विपरीत दो धर्म ग्रंथों का निर्माण किया गया है, जो है रामायण और महाभारत। रामायण में रावण यानि दस मौर्यों के प्रतीक को राम नामक एक टुच्चे से करैक्टर से हार को दिखाया गया है। यानि नकली धर्म की आड़ में,  इतिहास में यूनानियों पर दो बार(सिकंदर को महान नन्द वंश ने मानसिक तौर से डरा कर हराया, दूसरा चंद्रगुप्त मौर्य ने सेल्यूकस को हराया) जबरदस्त  जीत हासिल करने वाले महान बौद्ध मौर्यों को, नकली धर्म की आड़ में चोरी से मौर्य राजा को मारकर सत्ता पर कुछ समय विकृत मानसिकता में राज करने वाले राम यानि राम की आड़ में शुंग से हारा हुआ जताया गया। ऐसे ही अहिरावण यानि अहीर रावण को भी नकली धर्म में हारे हुए दिखाया गया है। यहीं ऐतिहासिक सच्चाई देखें तो महान मौर्यों ने यूनानियों पर हमेशा ही मानसिक और शारीरिक जीत हासिल की है। रामायण में महान बौद्ध राजा बलिराज के लिए वानर राजा बाली और सुग्रीव की कहानी बनाई गई। इसमें जताया गया कि दो भाईयों में राजपाट, पत्नी के लिए मानसिक संग्राम की कहानी बनाई गई थी। आज मूलनिवासियों के बीच में भाइयों के बीच में इस नकली धर्म की आड़ में ही मानसिक द्वेष पैदा किया गया था। जबकि इस प्रकार का मानसिक द्वेष ब्राह्मण राजपूत वैश्यों में सड़ातन असर होते हुए देखा गया है और मूलनिवासी बौद्ध हमेशा ही ऐसे द्वेष से मुक्त बौद्ध विचारधारा में रहते आए हैं। ऐसा ही नकली धर्म की आड़ में आदिवासी सम्राट महिषासुर को दुर्गा जैसी टुच्ची करैक्टर से हारा हुआ दर्शाना यानि बौद्ध राजा महिषासुर वासना से हार गए या उन्हें वासना के आकर्षण में फंसा कर नकली धर्म में प्रचलित किया गया है बस। यह प्रतीकात्मक नकली धर्म महान बौद्ध राजाओं के विपरीत दर्शाया गया है और मानसिक रूप से थोपा गया था। ब्राह्मण मानसिक अपंग स्थिति में नकली धर्म में सिर्फ अपनी विकृत मानसिकता का उदाहरण देता दिखाई देता है। जैसे इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय के इतिहास के पाठ्यक्रम में प्राचीन काल से आठवीं सदी ईस्वी के पेज 6 पर विवरण दिया गया है "हर्ष चरित्र के लेखक बाण के वृत्तांत पर विश्वास किया जाए तो वह ब्राह्मण मंत्री वासुदेव के षड्यंत्र का शिकार हो गया" । अब ध्यान देने योग्य बात यह है कि कृष्ण को वासुदेव कहकर भी प्रचलित किया गया है। अब वासुदेव को इतिहास में षड्यंत्रकारी के रूप में बताया गया है। अब एक षड्यंत्रकारी को भगवान जैसे पवित्र शब्द के साथ प्रचारित करना और वो भी हिन्दू ब्राह्मण के नाम पर पूजा जाना यानि जाति विशेष के पूर्वज को वो भी षड्यंत्रकारी को नकली धर्म की आड़ में पुजवाया जाना और तो और जो बुद्धि से निम्न स्तर का कार्य करता है ऐसे को पूजना यानि देश में भगवान शब्द को अपमानित करने जैसा है। क्या हम अपने बच्चों को अपने ही घर में षड्यंत्रकारी बनाना चाहेंगे। यही है नकली धर्म की मानसिक टुच्च स्थिति। षड्यंत्रकारी मानसिक रूप से विक्षिप्त होता है और साफ बौद्ध सभ्यता के प्रति विद्वेष की वजह से हिन्दू ब्राह्मण नकली धर्म से भी सड़ातन असर पाकर हारा हुआ दिखाई दे रहा है और आज के बौद्ध दृष्टिकोण से जिसका उदाहरण अटल जेटली सुषमा के मन पर सड़ातन के रूप मेें स्थापित हुआ है चूंकि मूलनिवासियों के विरुद्ध सनातन नामक दूसरे नकली धर्म की साज़िश थी।


       इस नकली धर्म की आड़ में हमारे मूलनिवासियों और बुद्ध और बौद्धों का अपमान कर हमारी धम्म भावनाओं को भी आहत किया गया है। मानसिक उत्पीड़न, धर्म के नाम पर सामाजिक द्वेष, बौद्ध इतिहास को नष्ट करना, बौद्ध संपदाओं को नकली टुच्चे करैक्टर बना कर बुद्ध की पवित्रता को दूषित करना, बुद्ध के बुद्धि स्तूपों को लिंग कहकर पूरे विश्व के बौद्धों की बुद्ध के प्रति सम्मान को ठेस पहुँचाना, नकली धर्म के द्वारा मूलनिवासियों की महान बौद्ध परंपराओं को नष्ट करना और असली इतिहास को गायब करना, नकली धर्म के द्वारा मूलनिवासी राजाओं का अपमान करना उन्हें विकृत रूप में दिखाना जिससे मनोवैज्ञानिक रूप में एक ऐसा मानसिक माहौल नकली धर्म से पैदा करना जो मूलनिवासियों को मानसिक रूप से हारा हुआ महसूस कर सके। जबकि मूलनिवासी बौद्ध रूप में मन को जीतने वाली श्रेष्ठ कौम हैं और युनानी सिकंदर और सेल्यूकस निकेटर पर जबरदस्त मानसिक जीत स्थापित कर चुके हैं। ऐसे में मूलनिवासियों के विपरीत बनाया गया नकली धर्म और वर्ण व्यवस्था जैसी ऊंच नीच की सोच पैदा करने वाले नकली धर्म और धर्म ग्रंथ असंवैधानिक है और मूलनिवासियों के विपरीत किया जाने वाला आपराधिक अपराध (criminal crime) भी हैं । इस नकली धर्म की आड़ में हमारे मूलनिवासियों और बुद्ध को किसी नकली करैक्टर विषाणु का अवतार बताकर बुद्ध और बौद्धों का अपमान कर हमारी धम्म भावनाओं को भी आहत किया गया है। मूलनिवासियों के विपरीत बनाया गया नकली धर्म और वर्ण व्यवस्था जैसी ऊंच नीच की सोच पैदा करने वाले नकली धर्म और धर्म ग्रंथ पूर्ण रूप से असंवैधानिक है। पूरे विश्व में बुद्ध पर रिसर्च हो रही है बुद्ध को ही पूर्ण सत्य का मार्गदर्शक माना गया है और हमारे देश में नकली टुच्चे से करैक्टर पुजवाऐ जा रहे थे या कहें तो नकली धर्म की आड़ में भारत का इस्लामीकरण करने की भी साज़िश थी। मूलनिवासियों के विपरीत बनाया गया नकली धर्म नकली देवी देवता बना कर पुजवाने से मन में भेदभाव और चिड़न जैसी भावनाएं पैदा करना,और वर्ण व्यवस्था जैसी ऊंच नीच की सोच पैदा करने वाले नकली धर्म और धर्म ग्रंथ असंवैधानिक है और जातिवाद और वर्णवाद पर आधारित धर्म ग्रंथ और मनुस्मृति पूर्ण रूप से अनुच्छेद 19 का उल्लंघन करते हुए शूद्रता यानि मानसिक गुलामी (slavery) को आधार बनाते हुए मानवाधिकारों (Human Rights) का भी पूर्ण रूप से उल्लंघन करते हैं।
      यह वर्णवाद और जातिवाद अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करते हुए राम और उसमें जुड़े ग्रंथ में equality को नष्ट करने की भावनाओं को पैदा करते हुए दिखाया गया है।

        राम को क्षत्रिय कहते हुए यूनानी हिन्दू ब्राह्मण ने नकली धर्म ग्रंथों में मूलनिवासियों को शूद्र इत्यादि कहने से और नकली धर्म के करैक्टर racism को दर्शाते हुए  अनुच्छेद 15 का भी पूर्ण रूप से उल्लंघन करते हैं। रामायण भी मूल रूप से वर्णवाद को दर्शाने के कारण असंवैधानिक ग्रंथ है साथ ही साथ यह मनोवैज्ञानिक रूप में हमारे इतिहास का विकृतिकरण भी है। इसी प्रकार से मनुस्मृति भी अनुच्छेद 15 का


उल्लंघन करने वाला नकली धर्म ग्रंथ है जिसमें वर्णवाद को फैलाया गया था नकली धर्म की आड़ में और इसमें स्त्रियों के प्रति वैमनस्यता भी फैलाई गई है।


      इसी प्रकार से संविधान की धारा 16 के अनुसार आरक्षण (reservation in state jobs) मानवाधिकारों के मूलनिवासी अवधारणा (indigenous origin) के तहत दिया गया है ताकि किसी भी विदेशी कौम के द्वारा मानवाधिकारों का उल्लंघन ना हो और मूलनिवासियों के मानवाधिकारों को संरक्षित किया जा सके।
आज हर भारतीय का मौलिक कर्तव्य  ( Fundamental duty) है के वैज्ञानिक अवधारणा (scientific temper) को बढ़ावा देने के लिए इस नकली धर्म को पूर्ण रूप से खत्म करें और चाहे तो बल पूर्वक सारे नकली मंदिरों को ध्वस्त कर दिया जाए।  नकली धर्म  भी मूलनिवासी सरकार चुनने का एक बहुत बड़ा मुद्दा है। 
सिखों में सेवादार और सेवा का वर्णन है यानि सेवा हर किसी को करनी है चाहिए, परन्तु युनानी हिन्दू ब्राह्मण ने इसका प्रयोग मनुस्मृति में वर्णव्यवस्था में कर दिया और मनोवैज्ञानिक रूप से पूरे नकली धर्म की पटकथा ही मूलनिवासी सिख बौद्ध के विपरीत लिख दी गई यानि सेवा करने वाला शूद्र बता दिया गया। यानि शूद्र शब्द को नकली धर्म की आड़ में महान बौद्ध के सिख दर्शन पर भी थोप दिया गया। इस प्रकार से पूरा नकली धर्म और उसके सारे ग्रंथ असंवैधानिक हो जाते हैं और मूलनिवासियों को चाहिए कि अपनी महान बौद्ध संस्कृति के सभी प्राचीन मंदिरों को नकली धर्म वालों से और उनकी टुच्ची सोच से तुंरत ही मुक्त कराया जाए। यह फैलाया गया था हिन्दू ब्राह्मण के द्वारा की सरदार कौम हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए बनाया गया था तो यहां यह साफ कर दिया जाना जरूरी है कि सरदार कौम मूलनिवासी बौद्ध परंपरा को ही बचा रहे हैं और इसीलिए ही गुरु गोविंद सिंह साहब जी ने खालसा का निर्माण किया था।आज अपने प्राचीन बौद्ध इतिहास से जुड़ी कलाकृतियों को ध्यान से जानें तो सिर्फ सिख ही प्राचीन बौद्ध से जुड़े प्रतीत होते हैं। प्राचीन परंपरा का कुछ भाग इनमें ही शेष है।एक तरफ मनोवैज्ञानिक रूप में देखा जाए तो नकली धर्म से आपराधिकरण को भी मूलनिवासियों कि बुद्धि पर थोप कर बढ़ाया गया है। हमारे देश में नकली धर्म की आड़ में उज़बेकी ईरानी हिन्दू और यूनानी हिन्दू ने हमारे देश के बौद्धत्व में वासना को थोपकर मूलनिवासी बालक मन को भी अपराध बोध दिया।‌ 

वासना गलत है और नकली धर्म से उसे बालक मन में पहुंचाकर मूलनिवासी बौद्ध बालक का मन अपराध बोध में फंसाकर एक प्रकार के अपराधीकरण को फैलाया गया। 

इसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव जो मूलनिवासी बौद्ध के मन पर पड़ा है और इसकी वजह से बहुत से बहुजन जो जेलों में बंद किए गए हैं उन्हें भी मुक्त किया जाए। देखा जाए तो पहले चोरी से बौद्ध विरासतों को चुराया गया यानि नकली धर्म से उन बौद्ध विरासतों को मनोवैज्ञानिक तौर पर बदला गया और चोरी की मानसिक टुच्च स्थिति को नकली धर्म की आड़ में फैलाया गया और इसे मूलनिवासियों का धर्म बता कर वासना प्रचारित करने वाले अपराधिकरण को बढ़ावा देने नकली धर्म को पूजने वाली मासूम मां के मन से उसके बच्चे के मन तक पहुंचा कर देश में अपराधिक मामलों को पैदा करवाया गया (नकली धर्म से अपराधीकरण का पैदा किया जाना )। 

फिर जो हिन्दू ब्राह्मण इस्लामीकरण और ब्रह्मा के करैक्टर को समझते हुए अपनी बेटियों से भी संबंध स्थापित कर लेता हो और इसे जैसा कि ब्रह्मा के बारे में हर जगह फैलाया गया है कि उसने गायित्री और सरस्वती से शादी की यानि ब्रह्मा को मोहम्मद के अपनी बेटियों आयशा इत्यादि से निकाह करने को जोड़कर दिखाता है इसीलिए वो बौद्ध विरासतों को वासनात्मक बना कर पेश करता है और मूलनिवासी बौद्ध के मन को उस वासना में फंसाकर मनोवैज्ञानिक अपराधीकरण को भी फैलाता है। यहां समझना अनिवार्य है कि प्रेम एक मानसिक दृष्टिकोण है जिसमें अपने मन से स्त्री के मन और विचारों को जोड़कर एक सामंजस्य बनाया जाता है यह सामंजस्य भी जागृत बुद्धि और अपने मन के भाव से बनाया जाता है यदि मन में माता पिता की तरफ से वान यानि तृष्णा बढ़ाई गई है तो वह अपने रिश्तों में भी दिखाई देगी अपने बच्चों में भी दिखाई देगी, ऐसे में अगर नकली धर्म पूजने लगे तो जो काम अपनी बुद्धि के अंदर जाकर सच्चाई को जानने में लगाना था वह वो नकली धर्म की तरफ लगाया जाने लगा तो वहां से क्या मिला, सिर्फ अपराध बोध। अगर गहराई में जाकर सच्चाई को जाना तो तृष्णा किसी भी रूप में माता पिता से मिली जिसे स्वाभाविक रूप में मन में पहचान कर परिवार में बातचीत से भी भंग किया जा सकता है। परन्तु नकली धर्म वालों से मांगा तो वहां से वही मिलेगा जो उनकी मर्जी होगी और जब स्वाभाविक रूप से मन जागृत है तो उसे मालूम है कि जो भी प्राप्त होता है माता-पिता से और उनकी ही ऊर्जा से जुड़ा हुआ है और जो बनाया जाता है वह स्वयं के जागृत मन से ही बनाया जाता है तो मन को कहां लगाया जाएगा, मन में जो आपके माता-पिता से जुड़ी हुई ऊर्जा है और उसको जो भी तृष्णा यानि उनके प्रति स्वयं के मन में चिढ़न गुस्सा डर इत्यादि आता है उसे अपने मन के भीतर जाकर भंग किया जाता है और जो ऊर्जा माता-पिता से मानसिक प्रेम के रूप में प्राप्त होती है उससे जुड़ कर अपने कार्य को पूर्ण जागृति से किया जाता है। परन्तु शिव टुच्चे की टुच्चता जो कि गीता प्रेस गोरखपुर से प्रचलित की गई थी को पुजारी के मन में होगा वो वही थोप सकता है टैलीपैथी से जैसा की हीन भावना दिखाई ही गई है महान बौद्धों को नकली साहित्य में दलित शूद्र अछूत इत्यादि करके और जिसका असर सड़ातन के रूप में जेटली सुषमा अटल पर साफ साफ दिखाई दिया है। बौद्धत्व एक जागृत अवस्था को कहा जाता है जो वान यानि तृष्णा को स्वयं के मन से भंग कर दे। एक तरफ नकली धर्म

यह फैलाता है कि मोहम्मद यानि हरि और कृष्ण एक हैं दूसरी तरफ किताबों में प्रचारित किया कि कृष्ण वासुदेव है जो कि साजिश रचने वाला कोई टुच्च है। दूसरी तरफ भगवान शब्द है जो सिर्फ बुद्ध से जुड़ा पाया जाता है आज जिसका खुलासा प्राचीन पाली भाषा में लिखित हैं, जिसका प्रयोग इन टुच्च करैक्टरों के लिए किया गया। मौर्य राजा के लिए प्रयुक्त होने वाले गणपति शब्द को हाथी के सिर वाले गणेश जैसी मानसिकता का बताना है। इस प्रकार प्रचारित किये गए कार्य को मनोवैज्ञानिक आपराधिकण से जुड़ा हुआ माना जाता है और जितने भी मनोवैज्ञानिक रूप में नकली धर्म की वजह से प्रभावित मूलनिवासी जेलों में बंद किए गए हैं उन्हें अपने मन की सच्चाई को जानने के लिए विपासना ध्यान पर केन्द्रित करना चाहिए। नकली धर्म एक संपूर्ण सभ्यता के विपरीत विदेशी हिन्दू ब्राह्मण के द्वारा मानवाधिकार का उलंघन करार दिया जाता है। नकली धर्म कुछ और नहीं सिर्फ मूलनिवासी के मन में आपराधिक सोच को फैलाना था। एक लड़की जिसके मन में नकली धर्म से वासना को बढ़ाया गया, वह नकली धर्म को पूजती है तो वासना बनती है, घर में बुद्ध यानि बुद्धि जागृत करने का भी अभाव है तो ऐसे में किसी हिन्दू ब्राह्मण के द्वारा हिप्नोटिज्म करके संबंध बनाए जाने पर उसके मन में एक अपराध बोध को पैदा किया गया और इस डर की वजह से अपने ही घर में वह सत्य को छुपाती है और मन में डर यानि तृष्णा पैदा करती है जो कि बिमारियों के रूप में बनती है और यही अपराध बोध उसके बच्चों में भी जाएगा। दूसरी तरफ शिव टुच्चे करैक्टर को प्राचीन बुद्ध यानि जान व्हीलर के द्वारा ढूंढे गए सिंधु घाटी सभ्यता की सील पर अंकित और पशुपति से जोड़कर प्रचारित किया गया सस्ते गीता प्रेस गोरखपुर के नकली साहित्य से। यानि यह हमारे पूर्वज हैं और हमारे पूर्वज इस टुच्चे करैक्टर से प्रभावित होंगे, यानि जिनका ध्यान लिंग पर डाला गया है। आज जितने भी मूलनिवासियों के बच्चे नकली धर्म की वजह से फैलाई गई और मन में पहुंचा कर बैठ गई वासना से ग्रसित हो गए हैं वो बौद्धिक विचारों को भी नहीं समझ पाएंगे चूंकि मन में बोध पैदा नहीं हुआ है। मनोवैज्ञानिक रूप में बुद्ध के मनौती स्तूप यानि बुद्धि स्तूप और उनकी जगह फैलाया गया शिव नशेड़ी का लिंग यानि मनोवैज्ञानिक अपराध एक पूरी कौम के प्रति। 

बौद्ध स्तूप जो अफगानिस्तान में है, इसे साभार डा. राजेन्द्र प्रसाद जी की फेसबुक पोस्ट से लिया गया, ऐसे स्तूपों को ही लिंग बताकर प्रचारित किया


नकली धर्म की वजह से हमारे मूलनिवासी समाज को इस टुच्चे करैक्टर से जोड़कर दिखाया गया और गीता प्रेस के माध्यम से भगेंड़ी बताना यानि हमारे पूर्वजों का विकृतिकरण और इसका विकृत प्रभाव कांवड़ के रूप में आज भी दिखाई देता है। जिन बालकों को अपनी बुद्धि से पढ़ाई लिखाई करनी थी, अपने मन को श्रेष्ठ पदों पर स्थापित करने में लगाना था वो कांवड़ में जाकर कितनी श्रेष्ठ बुद्धि वाले हो पाएंगे। यानि इस नकली विचारधारा को हमारे लोगों पर थोपा जाना यानि मनोवैज्ञानिक अपराधिकरण। इस प्रकार तृष्णा आगे की पीढ़ी में भी नकली धर्म से पहुंचाई गई। मनोवैज्ञानिक तौर पर जो माता पिता तृष्णा के प्रति जागृत हैं वे अपने बच्चों को भी सच्चाई के प्रति जागृत रखते हैं। मन जागृत अवस्था में रहता है पूर्ण सत्य के साथ रहता है तो पूर्ण स्वस्थ रहता है। इधर नकली धर्म तृष्णा को ही फैलाता है, झूठ पर बनाया गया झूठ को फैलाने वाला, यानि पूर्ण रूप से मनोवैज्ञानिक अपराधीकरण। देश में जितने भी मूलनिवासी बौद्ध जेलों में बंद हैं उसका सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक कारण है नकली धर्म । जैसे बौद्धत्व में नशाखोरी चोरी इत्यादि वर्जित है चूंकि इससे मन पर डर पैदा होता है यह एक प्रकार की तृष्णा है जो मन को अंदर ही अंदर खाती है, परन्तु नकली शिव नशाखोरी का मारा ऐसा नकली करैक्टर बुद्ध के जैसा दिखने वाला को नकली धर्म से प्रचलित करके महान बौद्धों को विद्वेष का शिकार बनाया गया। खुद बौद्ध साहित्य से चोरी करके नकली ग्रंथो के सहारे हीनभावना फैलाई गई। जो खुद हीनभावना से ग्रस्त हैं नकली धर्म के सहारे हीनभावना को छुपाए बैठे हैं, और नादिरशाह की तरह आज भी बौद्ध देश में बीजेपी की सरकार बनाकर मूलनिवासी के धन की लूटपाट कर रहे हैं। नकली धर्म वाले हमारी बुद्ध कबीर की महान विचारधारा से बिलकुल अलग है इसलिए इनको सामाजिक व्यवस्था में महान बौद्धों से अलग किया जाए और इनकी इस्लामिक सोच वाले धर्म को भी और उनके नकली धर्म के विद्वेष को उन्हीं पर छोड़ते हुए मूलनिवासियों को अपने मन से अलग कर दिया जाए।‌ एक नई विचारधारा अपने माता-पिता के लिए, हर एक मूलनिवासी बौद्ध के लिए प्रेरणा के रूप में स्थापित की जाए ताकि हर एक मूलनिवासी दूसरे मूलनिवासी की बुद्धि को श्रेष्ठ भाव से देखने का नज़रिया प्राप्त करने लगे। दूसरे मूलनिवासी का मन से सम्मान करने लगे और श्रेष्ठ बुद्धि से धन वैभव की प्राप्ति होती जाए और मौर्य साम्राज्य की तरह देश वैभवशाली और पूर्ण बौद्धत्व को प्राप्त हो और हिन्दू ब्राह्मण नामक कौम जिसने मौर्य साम्राज्य को साजिश से नष्ट किया वो गोबर गणेश हो कर पैदा होने लगे और बुद्धि से एक आज्ञाकारी हाथी जैसा हो कर बना रहे जिसकी स्वयं की बुद्धि ठस्स हो और जिसे जो आज्ञा दी जाए वह सिर्फ वही करे जो श्रेष्ठ बौद्ध उसे संचालित करें । इस प्रभाव को आप उन मूलनिवासियों के मन पर देख सकते हैं जो ब्राह्मण के बहुत आज्ञाकारी हैं और दौड़ दौड़ कर उनके काम करते रहते हैं परन्तु अपनी बुद्धि को जागृत कर उनको आज्ञाकारी नहीं बनाते। जीवन में सबकुछ वैचारिक दृष्टिकोण है। मन में जो दृष्टिकोण नकली धर्म की आड़ में थोपा गया उसे बौद्त्व से भंग कर नए विचारों और दृष्टिकोण के साथ स्थापित किया जाए ताकि हमारे श्रेष्ठ बौद्ध कौम की श्रेष्ठतम बुद्धि और उसके आगे की बौद्ध कौम श्रेष्ठ बुद्ध यानि लीडर्स को पैदा करते रहें। एक प्रकार से मनोवैज्ञानिक अपराध यह ज्योतिष भी है, इसमें पहले कुंडली इत्यादि का मानसिक अपंग खेल खेला जाता है और फिर टैलीपैथी से मन पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव के रूप में थोपा जाता है। जो इंसान अपने मन के अंदर जाकर सच्चाई को जानने के बजाय इन हिप्नोटिज्म करने वाले मूर्खों के चक्कर में पड़ जाते हैं वे पारिवारिक बौद्धिक प्रेम से भी वंचित किए जा सकते हैं और कुंडली इत्यादि से उन के मन पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी डाला जाता है। इस प्रकार से मनोवैज्ञानिक प्रभाव से जो कुंडली में लिख दिया गया है एक फंसा हुआ मन उसी को पढ़ कर सच मानता रहता है और उसके मन में बैठे हुए प्रभाव से ही मनोवैज्ञानिक रूप में सच्चाई स्थापित होती जाती है तो उसे लगने लगता है कि उसने सच ही बोला था। मन एक प्रकार की मिट्टी है जो बचपन से ही परिवार के द्वारा दी गई वैचारिकी को उगाता रहता है। बच्चे के मन पर सबसे ज्यादा प्रभाव अत्यधिक उत्तेजना या विचलित माता-पिता का मन मनोवैज्ञानिक रूप में स्थापित करता है। जैसे मेरी बहन के मन में डर सबसे पहले मेरी मां के द्वारा इस प्रकार पहुंचाया गया जब मेरी बहन तकरीबन तीन वर्ष की आयु की रही होंगी और मेरी मां के द्वारा उन्हें एक अलग बने हुए कमरे में जाने से रोका जा रहा था। जब मेरी बहन उस कमरे में जाने से बार बार रोकने पर भी नहीं रुक रही थीं तो मां ने उन्हें झिड़क दिया। यह उनके जीवन की पहली झिड़क थी जिसका पहला प्रभाव उनके मन पर स्थापित हुआ। जब मेरी बहन ने खुद से मन के अंदर जाकर सच्चाई को खोजा तो उन्हें अपने मन में डर का पहला बीज जो मां ने अपने मन की झिड़क के साथ दिया था की जागृति हुई। इस बात को मेरी बहन के द्वारा मां को अब बताए जाने पर मां का मन भी उस घटना से जुड़ा और उन्हें आभास हुआ कि वह घटना जो हुई थी उसका कारण था कि उस छोटे कमरे में कभी सांप निकला था और मां का डर उस सांप की सोच से जुड़ा होने की वजह से खुद भी डरा हुआ था और उस डर को स्वाभाविक रूप में अत्यधिक उत्तेजनावश उन्होंने बहन के मन में पहुंचा दिया। यहीं पर अगर मां का मन जागृत होता तो सहज रूप में वह अपने ही घर से मुक्त होतीं और आगे बहन के मन में वह नहीं गया होता। यहीं पर डर के विपरीत अगर अपने मन को वश में रखकर ,विपसना करके, मन के अंदर की तृष्णा के प्रभाव को नष्ट कर खुश मन से जो भी स्वयं के मन से विचार बनाया जाता है वह सत्य होता जाता है यही बौद्ध विचारधारा है जिसमें जागृत मन से तृष्णा भंग हो जाती है। जैसे जो अपने घर में अपनी बुद्धि को जागृत करने के बजाय नकली धर्म में अपने मन को फंसा रहा था वह अब बौद्ध विपसना कर मन को जागृत अवस्था में रखकर श्रेष्ठ बुद्धि वाली मानसिक स्थिति में रहकर देश को अपना श्रेष्ठ प्रदान करने में भी सक्षम है। एक प्रकार से देखा जाए तो नकली धर्म की आड़ में जो मानसिक प्रेम अपनी ही मां के विरुद्ध डर के रूप में बना उसे ढूंढा जा रहा है दूसरों में। अगर अपनी मां के प्रति कोई रुका हुआ द्वेष बचपन की भावनाओं से मुक्त कर दिया जाए जो किसी भी रूप में था तो मानसिक प्रेम जैसे ही स्वयं की मां से जुड़ता है तो पूरी मानवता से जुड़ जाता है।

एक प्रकार से देखा जाए तो हिन्दू ब्राह्मण ने खुद को अच्छा दिखाने के लिए पूरे देश पर विकृत मानसिकता थोपी और स्वयं अपने घर में श्रीमाली वाली हिप्नोटिज्म की प्रक्रिया करता रहा और दूसरों को विकृति प्रदान करता रहा। 

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