Chapter VI
बुद्ध और चमार बनने की प्रक्रिया
बुद्ध होना यानि अपने मन से दुनिया के हर सत्य को जान लेना महसूस कर लेना। यह हमारे देश के महान बौद्धों की महान बुद्धि के आविष्कारों में से एक है। इसके बहुत से फायदे हैं जिसमें एक सबसे बड़ा फायदा होता है मन को साधने का। हमारे शरीर में जो सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है वो है मन। मन को जब कुछ काम करने को नहीं होता है तो वह कहीं पर भी घूमता रहता है और दुनिया जहान की बातें सोचता रहता है और जब मन वश में नहीं होता है तो यह किसी भी काम को संपूर्णता से नहीं कर सकता। इसलिए ही हमारे देश के महान बौद्धों ने मन को साधने के बहुत से आविष्कारों को जन्म दिया जिससे मन तो वश में आता ही है साथ ही साथ ये मन कुछ ऐसे आविष्कारों की खोज भी करने लगता है जो साधारण बुद्धि के साथ संभव नहीं है। बुद्धि को साधने से नकली धर्म बनाने वाले भी वश में ही रहते हैं चूंकि मन से विक्षिप्तता से और महान बौद्ध मूलनिवासियों के विपरीत दूसरा धर्म थोपने से जो विद्वेष अटल जेटली सुषमा जैसा असर नकली धर्म बनाने वालों की बुद्धि पर पड़ गया है।
मन आंखों के सामने जो घटित हो रहा है उसे तो देख लेता है आंखों के द्वारा, परन्तु जो शरीर के अंदर घटित हो रहा है और दूसरों के मन में चल रहा है उसे नहीं जान पाता है, ऐसा क्यों होता है? हमारे शरीर के अंदर बहुत सी प्रक्रियाओं का समावेश होता है और वे सभी लगातार शरीर के अंदर स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए लगातार करता रहता है। इन शारीरिक प्रक्रियाओं में जब कोई मानसिक बाधा आती है यानि जब जब मन बाहर की घटनाओं से अत्यधिक उत्तेजित होता है किसी मानसिक चिढ़न, डर इत्यादि से तो शरीर चूंकि मन से जुड़ा हुआ है वह अत्यधिक उत्तेजना की वजह से स्वयं के मन में तनाव पैदा करता है। जब माहौल में और मन में ऐसी उत्तेजनाओं की आदत बनने लगती है तो मन ही मन एकदूसरे के साथ किसी भी विचार को सही गलत मानकर माता पिता के विपरीत उत्तेजित होने से विकार बनते जाते हैं और यही विकार बहुत ज्यादा बढ़ कर बिमारी का कारण बनते हैं। इन बिमारियों का कारण सबसे पहले मन के सोचने के नज़रिये से पैदा होती हैं। 1950 के बाद नकली धर्म से झूठा नज़रिया हमारे देश में हिन्दू ब्राह्मण ने द्वेषपूर्ण मानसिकता से पैदा किया था वह झूठा नजरिया था हमारे देश की मूलनिवासियों की परंपरा में घुसपैठ करना, भगवान जो कि हमारी प्राचीनतम सभ्यता में दुनिया के सबसे बुद्धिमान कौम ने मन के अंदर प्राप्त किया उसका असली स्वरूप बदल कर नकली भंगेड़ी गंजेड़ी चिड़न वाले करैक्टर बना कर उन्हें भगवान बता कर नकली धर्म की आड़ में मानसिक भ्रम बना कर अपनी वासना और चिढ़न को मूलनिवासी बौद्ध मन पर थोपा गया। इसका असर आज मूलनिवासियों के मन में जो चिढ़न का भाव अपने परिवार के प्रति देखा गया है वह इस नकली धर्म की देन है और हमारे मूलनिवासी राजाओं के प्रति और अपने ही परिवार के प्रति झूठा धर्म बना कर चिढ़न और घृणा के दृष्टिकोण को बनाया गया और थोपा गया है। बहुत जोर देकर बोलने से यह बोले गए शब्द मन के भाव की ऊर्जा से जुड़ कर पूरे वातावरण में फ़ैल जाते हैं और इसका असर हमारे मूलनिवासी समाज पर यह पड़ता था कि मूलनिवासी लोगों के मन में अपने ही परिवार एवं अपने ही समाज के प्रति घृणा और चिढ़न की सोच बनती थी। चूंकि मूलनिवासी समाज पहले से ही बौद्ध विचारधारा का था इसलिए नकली धर्म को ही अपना मानने लगा और नकली धर्म से अपने ही पूर्वजों के प्रति द्वेष वाला नजरिया बनने लगा, इस नए चिढ़न डर और कमजोर नजरिये की वजह है बचपन में ही बच्चों को रामायण और महाभारत पढ़वाना। रामायण और महाभारत में मनोवैज्ञानिक तौर पर हिन्दू ब्राह्मण ने अपने पूर्वज के रूप में पुष्यमित्र शुंग यानि राम की चोरी से ब्रहद्रथ मौर्य की हत्या को मनोवैज्ञानिक तौर पर जीत के रूप में स्थापित करके दिखाया और त्योहार बनाया गया उसकी जीत का दशहरे के रूप में। असलियत में देखा जाए तो यह नकली धर्म बनाने वालों की मानसिक टुच्च स्थिति को उजागर करता है और मूलनिवासियों के प्रति मानसिक विद्वेष की वजह से उन्हें ही मानसिक अपंग स्थिति में सड़ातन असर में ला रहा है। ये आज भी हमारे घर में आकर किसी की बुराई करते हैं तो इन्हें उठा कर बाहर का रास्ता दिखा दीजिए चूंकि ये आपके मन को किसी के प्रति द्वेष से भरने का नज़रिया थोप रहे हैं चूंकि ये खुद ही सड़ातन स्थिति में हैं, और अगर ये बड़ाई कर रहे हैं तो किसकी कर रहे हैं, ये किसी ब्राह्मण हिन्दू की या वैश्या ठाकुर की कर रहे हैं तो वर्णवाद से ग्रस्त टुच्च मानसिकता को दर्शा रहे हैं उसकी वजह से ये खुद ही मानसिक अपंग स्थिति में हैं। इस प्रकार से देखा जाए तो यह एक टुच्च स्थिति इनके मानसिक दिवालियेपन को ही दर्शाती है। जैसे देश के धन को लूटने वाले को क्या कहेंगे? इसी नकली जीत की अकड़ और चिढ़न को मूलनिवासियों पर थोपने की साजिश को ही कहा गया है नकली धर्म। नकली धर्म के रूप में मानसिक रूप से वासना में फंसाना शुरू किया गया जिसमें ब्राह्मण ब्रह्मा अपनी बेटी से संबंध स्थापित करता है इस्लाम संस्थापक की तरह और इसे नकली धर्म के रूप में थोप दिया गया और नाम दिया गया हिन्दू। एक प्रकार से नकली धर्म की आड़ में अपनी चिढ़न को थोपा जाना था मूलनिवासियों पर। अगर वासना मन में आई भी तो मन में आई, यह किसके मन से जुड़ रही है मन के अंदर जाकर महसूस करें तो उस प्रेम से जुड़ा जा सकता है जिसके द्वारा वह मानसिक प्रेम पहुंचाया गया। उसके लिए भी जागृत बुद्धि ही चाहिए । परन्तु नकली धर्म की आड़ में शिव की आड़ में पूरे देश में लिंग बताकर पर थोप कर मन लिंग पर डाला गया। जहां अपनी खुद की बुद्धि को जागृत और जीत पर रखना है वहां लिंग था जिसे आज के बुद्धि स्तूप से जोड़कर स्वयं की श्रेष्ठतम बुद्धि से जुड़ा हुआ महसूस किया जा सकता है। हमारे परिवार के शीर्ष पर पिता होते हैं ऐसे ही हमारी मूलनिवासी परंपरा में शीर्ष पर प्राचीनतम बुद्ध को माना जाए, जैसे विपस्सी बुद्ध इत्यादि, जिन्होंने जीवन जीने के बहुत से सूत्रों की पहचान की थी। परन्तु इनके स्थान पर द्वेषपूर्ण मानसिकता से प्रचारित किया गया गीता प्रेस गोरखपुर के नकली साहित्य से कि शिव जो कि नशेड़ी टुच्चा करैक्टर बता कर प्रचारित किया गया है, उसे नकली साहित्य से फैलाया गया कि वह विध्वंसक है और लिंग बताया गया बुद्धि स्तूपों को। मूलनिवासियों की जागृति के पश्चात इस प्रेस को अब डर की वजह से बंद कर दिया गया है। शिव के बारे में ये भी प्रचारित किया गया कि ये चिढ़न का मारा है, यानि मूलनिवासी बौद्ध समाज को संबोधित करा गया इस टुच्चे करैक्टर से और हमारे परिवार के पिता की छवि कैसी बताई गई कि वो चिड़चिड़े स्वभाव के होते हैं। हर मां अपने पति की छवि को बुद्ध जैसा मानें और वही भावना अपने बच्चों के मन में भी डालें तो बच्चों के प्रति पिता का मन करुणा और प्रेम से भरा हुआ दिखाई देगा और समाज में देश में विश्व में ऐसे पिता सम्मानित रहेंगे। अपनी बुद्धि से अगर जागृत अवस्था प्राप्त करने लगे तो देखा गया है कि हिन्दू ब्राह्मण आज भी किसी के घर में आकर बुराइयां करता है और मेहनत से जीने वाले लोगों के बारे में चोरी चकारी जैसी बात बोलकर नफरती दृष्टिकोण फैलाता है तो मन ही मन समझा जा सकता है कि वह सड़ातन असर में धंस कर मरणासन्न अवस्था में है। किसी के लिए भी ऐसा फैलाना यानि कि टैलीपैथी के प्रभाव से उनके मन में हीनता को पहुंचाना।अब ऐसे में हिन्दू ब्राह्मण मानसिक अपंग स्थिति में पहुंच कर खुद ही प्रचारित करने लगा है कि मूलनिवास श्रेष्ठ बौद्ध बुद्धि के लोग हैं और अपनी बुद्धि को जागृत कर श्रेष्ठ प्रदर्शन कर रहे हैं और ब्राह्मण को अपनी मानसिक मनोरोगी स्थिति का भी पता चला है। इस प्रकार प्रचारित यह किया गया कि दुनिया की सबसे बुद्धिमान और महान सभ्यता जो महान बौद्धों के रूप में थी अपनी बुद्धि का प्रयोग मन की सत्यता को पहचानने में लगाते है। उन्हें नकली धर्म की आड़ में इस टुच्चे शिव की तरह शमशान में पड़े रहने वाला बताया। इस टुच्चे करैक्टर से जोड़कर पशुपति यानि सिंधु घाटी सभ्यता के बुद्ध से जोड़कर प्रचारित किया गया। गीता प्रेस गोरखपुर के सस्ते साहित्य से फैलाया गया कि शिव नशेड़ी है यानि मनोवैज्ञानिक प्रभाव छोड़ा गया मूलनिवासियों की बुद्धि पर। इस प्रभाव से जो भी मूलनिवासियों पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव छोड़ा गया। जो भी अपने मन में मानसिक द्वेष के लिए अपने आप को दोषी मान रहा हो तो उसका कोई दोष नहीं है यह सब नकली धर्म की वजह से 1950 के बाद बाबासाहेब जी के बौद्ध धर्म को अपनाने के बाद विद्वेषपूर्ण होकर नकली धर्म को बनाकर उसकी आड़ में थोपा गया था। अब जो भी वासना पूर्ति के लिए भटक रहे हैं वे असलियत में पारिवारिक बौद्धिक प्रेम से वंचित हैं और स्वयं के मन में अपने ही माता-पिता के प्रति द्वेष से फंसे हुए हैं। जैसे बचपन में मां ने डरवश किसी बात पर बच्चे को झिड़का तो जीवन में पहली झिड़क होने की वजह से बच्चे के मन पर मनोवैज्ञानिक रूप में वह मनोवैज्ञानिक रूप में चिढ़न के रूप में बच्चे के साफ मन पर पहली बार बीज के रूप में स्थापित होगा। इस प्रकार की झिड़कने वाली घटनाएं बच्चे के मन को मनोवैज्ञानिक प्रभाव देगी। इस बचपन के द्वेष से मुक्त होने के लिए सिर्फ अपने मन की सच्चाई को जानना है जो संभवतः माता-पिता से द्वेष के रूप में होती है और बचपन की किसी पहली घटना से जुड़ी हुई होती है। नकली धर्म की आड़ में यही मानसिकता मूलनिवासियों के मन पर थोपी गई थी क्योंकि नकली धर्म की वजह से अपने ही घर में तृष्णा का टुच्चा पन और विद्वेषपूर्ण हार वाली मानसिकता रामायण महाभारत की आड़ में मन पर थोपी गई थी। जिसे आज भी पढ़ाया जा रहा है और नकली मंदिरों की आड़ में और नकली धर्म से फैलाया गया और मनोवैज्ञानिक रूप में थोपा गया था लाउडस्पीकर बजा कर यानि जो नकली धर्म को पूजता था वह अपने ही मूलनिवासियों से द्वेष में फंसाया गया था और वह स्वयं के बौद्धिक प्रेम को माता पिता के साथ समझने के बजाय पारिवारिक नकली धर्म की फैलाई तृष्णा को ही सच मानकर अपने मन और परिवार में कलह कर रहे थे और बाहर प्रेम तलाश रहे थे। मूलनिवासियों को नकली धर्म की आड़ में बौद्धिक प्रेम, यानि स्वयं के प्रेम से भी वंचित किया गया था। बौद्धिक प्रेम यानि अपनी बुद्धि से प्रेम जो आपके माता-पिता ने आपको प्रदान की है। आज देश में जितने भी दलाल है जो मूलनिवासियों के वोट की दलाली का रहे हैं वे सभी मानसिकता से वही वंचित विचार वाले हैं और प्रेम प्राप्ति के लिए भटक रहे हैं और स्वयं और माता-पिता के असल प्रेम से वंचित हैं चूंकि माता पिता । हमारी बौद्ध सभ्यता में वासना तृष्णा समान है और नकली धर्म से वासना का ही प्रचार किया गया। देश में नकली धर्म की आड़ में वासना को ही थोपा गया और फैलाया कि सभी हिन्दू हैं, हिन्दू यानि मानसिक गुलाम जिसके मन में आसानी से जो चाहे भरा जा सकता था। इस वासनात्मक विचार को कैसे मन पर स्थापित किया गया था एक धर्म को मुस्लिम और बाकी सभी मतों को हिन्दू कहना शुरू कर दिया गया ताकि बाकी सभी नकली धर्म से वासनात्मक गुलाम जैसे व्यवहार करें। बुद्ध की जगह शिव टुच्चे करैक्टर और बुद्धि स्तूपों को लिंग बताकर प्रचारित करना उसी मानसिक टुच्चता का भाग है। यानि दोनों धर्मों के विचार एक ही प्रकार के और उन्हें संभालने वाले भी विदेशी मूल के। एक यूनानी हिन्दू ब्राह्मण ,ईरानी हिन्दू जो ठाकुर वैश्या है। दूसरे मोहम्मद के धर्म को मानने वाले भी दो भागों में है, एक वो मुस्लिम हैं जो ईरान इत्यादि जगह से हमारे देश में आए थे, और दूसरे मूलनिवासी बौद्ध जो कभी मुस्लिम बनाए गए थे। जो नीचे दर्जे के मुस्लिम हैं उसपर ही बीजेपी सरकार के काल में जानलेवा हमले हुए हैं। आखिर यह कौन सा मनोवैज्ञानिक गुस्सा मुस्लिम पर उतरवा कर और वो भी मूलनिवासी बौद्ध से ही मुस्लिम पर उतरवाया जा रहा था जबकि मनोवैज्ञानिक रूप में जो अत्याचार नकली धर्म से पैदा किया गया था उसका गुस्सा तो ब्राह्मण ठाकुर वैश्या पर उतरता। दूसरे शब्दों में देखा जाए तो यूनानी हिन्दू ब्राह्मण को वासना पसंद थी तो इस्लाम में ही रहना चाहिए था और तीन शादियां करता परन्तु जिस प्रकार हमारे देश के इस्लाम में जातियां बनाई गई है उसी प्रकार से हिन्दू की आड़ में भी वही जातीय मानसिकता थोपने की टुच्ची साजिश रची गई।
इस मनोवैज्ञानिक नकली धर्म के नज़रिए को हमारी संस्कृति पर थोपा गया है।
आज जो भी मूलनिवासियों के मन में अपने ही माता पिता और परिवार के लिए जो भी चिढ़न इत्यादि का भाव पैदा हुआ है वह इस नकली धर्म की वजह से अपने पूर्वजों के प्रति घृणित नजरिये की वजह से ही है जिसे अपने मन से भंग करने के लिए अपने ही मन के अंदर सांस को पहचान कर या पकड़ कर मन वश में करके अपने विचारों को पढ़कर उसमें उठते हुए कारण को भंग कर मन को मुक्त रखते हैं। अपने नजरिये को सबसे पहले अपने मूलनिवासी बुद्ध इतिहास और राजाओं के प्रति श्रद्धा के भाव में परिवर्तित करने से और अपने माता पिता और परिवार के प्रति पूर्ण सम्मान की दृष्टि को मन में स्थापित करने से देश में पुनः बौद्धत्व स्थापित होता जाएगा। इसी को गौतम बुद्ध ने कारण और असर(cause and effect) का रूप कहा है। मन में चिढ़न इत्यादि का वास्तविक कारण अपने ही मन में है, जिसे अपने मन के अंदर जाकर खुद से ही खोजा जाता है, जैसे हमारे देश में चिढ़न का रूप है नकली धर्म का संस्थापक और नकली धर्म जिसमें मनोवैज्ञानिक रूप में चिढ़न को नकली धर्म, रामायण महाभारत और नकली शब्दावली के रूप में थोपा। अगर मन में सबसे पहली बार चिढ़न का अनुभव करें तो वह बचपन से जुड़ी घटनाओं के रूप में होता है। ये घटनाएं अपने ही माता पिता से अपने ही बुजुर्गों से जुड़ी घटनाओं पर आधारित होती है जिसे नकली धर्म के द्वारा स्थापित किया गया था। हर कारण को जब स्वयं के मन में स्वाभाविक रूप में देखा जाता है तो उसका असर सब तरफ से भंग हो जाता है। अपनी चिढ़न इत्यादि को स्वयं के मन से ही भंग करने के लिए सांस के द्वारा मन के अंदर जाकर खुद ही खोजना है और मन को भंगी बनाकर दूसरों के द्वारा दी जाने वाली मानसिक चिढ़न से विचलित होने से बचकर बौद्ध सत्य को बुद्धि बल से और जो जीवन में प्राप्त करना है उसे स्थापित करते जाना है इससे किसी भी लक्ष्य की प्राप्ति बहुत आसान और सत्य हो जाती है।
उस चिढ़न इत्यादि को जो किसी घटना के रूप में होती है और बचपन तक उसे पहचान कर उसमें पैदा हुए द्वेष को दूसरे के प्रति भंग करके स्वयं के मन को मुक्त किया जाता है और यह जिस जिस के मन से जुड़ा है उसके बीच के द्वेष से भी मुक्त किया जाता है। परंतु नकली धर्म की आड़ में एक नकली विचार मूलनिवासी के मन पर थोपा गया था। महान बौद्ध राजा महिषासुर को नकली धर्म की आड़ में बलात्कारी बताकर प्रचलित किया जबकि बलात्कार हमारे देश की संस्कृति ही नहीं है और वे बहुत ही महान है और आज भी आदिवासी समाज झारखंड में उनकी पूजा करता है। यानि बलात्कार की संस्कृति को नकली धर्म के रूप में हमारे देश पर थोपा गया। इसी प्रकार से प्राचीन बुद्ध जो सुकिति बुद्ध से पहले के बुद्ध हैं को नकली टुच्चे करैक्टर शिव से जोड़कर प्रचारित किया गया और अपनी टुच्चता से भरी मानसिकता से दुनिया के सबसे बुद्धिमान और जागृत बुद्ध को छुपाकर भंगेड़ी करैक्टर शिव बताकर प्रचारित किया गया और नकली कहानियों की आड़ में महान मूलनिवासियों के लिए टुच्चता को फैलाया गया। बुद्धि स्तूप को टुच्चे शिव का लिंग बताकर ब्राह्मण ने मूलनिवासियों के मन में वासना का भ्रम फैलाया और अपनी वासना को दुनिया के सबसे महान बौद्धों पर थोपा। बुद्ध एक मन का विज्ञान हैं जिसमें बुद्धि की हर अवस्था और सत्य को खोजा जाता है और मन स्वयं ही हर सत्य को खोज ही लेता है।
अब मन को पूर्ण सत्य पर स्थापित करने के लिए सबसे पहले नकली धर्म की आड़ में जो राग द्वेष हमारे अपने ही पूर्वजों के खिलाफ बनाया गया है उसे नकली धर्म को खत्म करके मन से भंग करना है और बुद्ध को फिर से देश में सम्मान सहित स्थापित करना है। ऐसा करते ही देश के हर महान बौद्ध से दूसरे महान बौद्ध के मन का दृष्टिकोण पूर्ण राग द्वेष मुक्त सत्यता की तरफ स्थापित होता दिखाई देने लगा है और श्रेष्ठता का भाव मन में स्थापित होता जा रहा है। हमारे मन में जो ऊर्जा का प्रवाह है जो हमारे पूर्वजों और बौद्ध संस्कृति से प्रवाहित होता था वह नकली धर्म की वजह से पारिवारिक चिढ़न घृणा इत्यादि में व्यय होता था से निकल कर महान मूलनिवासियों के मन में फिर से प्रवाहित होने लगा है। हमारी महान बौद्ध विचारधारा फिर से प्रवाहित होने लगी है। इस प्रवाहित ऊर्जा से मन को उलझनें के बजाय सुलझाने पर लगाया जाना हो जाता है। अब बुद्ध बनने की प्रक्रिया को समझना बहुत आसान हो जाता है। बुद्ध बनने के लिए सबसे पहले मन को शरीर के अंदर झांकने की तकनीक पर कार्य करना है।
मन को पूर्ण रूप से वर्तमान में स्थापित करने के लिए अपनी सांस पर ध्यान लगा कर उसे महसूस करना है कि वह शरीर में कहाँ कहाँ अंदर से छू रही है। हमारा मन बहुत सी पुरानी बातों में लगा होता है या भविष्य में पहुँच जाता है। सांस को पकड़ने से वर्तमान में मन को पूर्ण रूप से स्थापित किया जाता है और जो विचार मन को अपने ही अंदर के सत्य को पहचानने से रोकते हैं वे सामने आने लगते हैं जिन्हें स्वीकार कर और यह मान कर भंग किया जाता है कि यह मेरे ही मन से उठता हुआ विचार है जो बचपन से मेरे मन में मैंने ही राग द्वेष को बढ़ा कर स्थापित किया था और यह विचार मेरे मन में आने वाली सच्चाई को ढक रहा है। यह विचार किसी भी प्रकार का हो सकता है जैसे किसी से पुरानी चिढ़ के रूप में, अत्यधिक रूप में बढा़ई गई वासना के रूप में, अत्यधिक लालच किए जाने से शारीरिक विकार भी पैदा होते हैं। जैसे ही इस प्रकार के विचार को सहज रूप में स्वीकार करते हैं तो वह स्वयं: ही भंग हो जाता है और उसका असर भी भंग हो जाता है। इसे भंग करने का दूसरा कारगर उपाय है उसे उस इंसान के साथ साझा कर द्वेष भाव को नष्ट कर दें जिसके साथ वह द्वेष पैदा किया गया है। इस प्रकार विचारों को परत दर परत नीचे जाकर देखने से संपूर्ण सत्य मन में प्रकट हो जाता है। इस मनोवैज्ञानिक सत्य से संपूर्ण सत्यता को स्वयं के मन में ही देखा जा सकता है और उसे पूर्ण रूप से अपने वश में भी रखा जा सकता है। इसी प्रकार बचपन से जो भी तृष्णा मन पर डाली गई थी वह भंग होती जाती है और रिश्तों में भी सहजता और सरलता स्थापित होती है ।सांस एक ऐसी प्रक्रिया है जो हमेशा वर्तमान में चलती है। सांस को मन से महसूस करते रहने से मन की ऊर्जा जो इधर उधर व्यय होती थी वह अपने मन के साथ वर्तमान में स्थापित हो जाती है। जितना ज्यादा मन सांस पर लगाया जाता है मन वश में आता जाता है। जितना मन वश में होता है उतना ही एकाग्रता से पढ़ाई या जो भी कार्य करना है उस पर मन को लगाना बहुत ही आसान हो जाता है। अब वश में आए मन को धीरे धीरे सिर में लेकर जाना है, यहाँ पर जो भी महसूस देता है उसे महसूस करते जाना है देखते जाना है (सिर के अंदर सबसे ज्यादा ऊर्जा का उपयोग होता है और यह ऊर्जा सबसे ज्यादा न्यूरान के द्वारा प्रयोग की जाती है इसलिए इस ऊर्जा की गति को मन से शरीर में आसानी से महसूस किया जा सकता है) ऊर्जा के बहाव को महसूस करते हुए धीरे धीरे सिर के पीछे गर्दन में देखते हुए महसूस करते हुए उस ऊर्जा के बहा्व के प्रवाह को आगे बढ़ते हुए पैरों में देखते हुए अंगूठे उंगलियों के छोर तक देखना है महसूस करना है, इसी प्रकार से अंगूठे उंगलियों के छोर से महसूस करते हुए पैर कमर गर्दन से सिर तक ऊर्जा के प्रवाह को महसूस करना है ऐसे ही आगे की तरफ माथा, कान, गाल ,नाक, गला, दिल, सीना/छाती से पेट और नाभी( खास तौर पर) , और नीचे गुदा के पास तक महसूस करते जाना है और इसी प्रकार वापस सिर तक देखना है । ऊर्जा के प्रवाह को बच्चा जब माँ के पेट में होता है तो अपनी नाभी से महसूस करता है चूंकि वह सारा खाना वहीं से प्राप्त करता है , इसलिए अपनी नाभी पर सबसे ज्यादा ध्यान केंद्रित करने से ऊर्जा के प्रवाह को बहुत जल्दी ही महसूस किया जाता है। इस प्रकार से शरीर में देखते हुए महसूस करते हुए मन उस कण की खोज भी मन के अंदर ही कर लेता है जिससे प्रकृति की हर एक वस्तु निर्मित है। इसी कण को कबीर साहेब ने निर्गुण कहा है यानि इसका कोई गुण नहीं है और इसी से ही सारी सृष्टि का निर्माण हुआ है। इसी खोज को मन से करने वाले ऊर्जावान बौद्ध को ही भगवान कहा जाता है और हमारे देश के सभी बुद्ध इसी अवस्था की खोज मन में ही करते रहे हैं। ऊर्जा को इस अवस्था में जमीन से भी सोख लिया जाता है इसलिए ही सुकीति बुद्ध ध्यान की अवस्था में अपना एक हाथ जमीन से छूकर जमीन की ऊर्जा को भी महसूस करते रहे होंगे, चूंकि बुद्ध अवस्था दुनिया की सबसे जाग्रत अवस्था है जिसे आजतक सिर्फ भारतवर्ष के मूलनिवासी ही प्राप्त करते रहे हैं। इस अवस्था में सारी सृष्टि में ऊर्जा के प्रवाह को शरीर के साथ नियंत्रित किया जा सकता है।
इस अवस्था में आते रहने के साथ साथ ही जैसे जैसे मन दूसरों के साथ बांधे गए राग द्वेष से भी मुक्त होता जाता है तो मन शरीर में जहाँ जहाँ जाता है वहाँ की शारीरिक बंधन या पीड़ा से भी शरीर खुलता चला जाता है और कमल की भांति खिल जाता है यानि मुक्त भाव को प्राप्त हो जाता है इसी को सुकीति बुद्ध का लोट्स सूत्र भी कहा जाता है। इसे विज्ञान के अनुसार समझें तो हमारे दिमाग में पूरे शरीर को नियंत्रित करने वाले प्वाइंट होते हैं जिससे पूरे शरीर का जुड़ाव न्यूरान नामक कोशिका की सहायता से शरीर से जुड़ा होता है। जब मन में बार बार की गई कोई उत्तेजना दिमाग के उस खास स्थान पर असर या दबाव देती है तो दिमाग का जुड़ाव उस शरीर के अंग पर भी उत्तेजना देता है। इसका सबसे सीधा उदाहरण है डाइबिटीज। पेट में मौजूद पैनक्रियाज में एल्फा सैल होते हैं जो हमारे दिमाग में मौजूद पिट्यूटरी ग्रन्थि से जुड़े होते हैं और पिट्यूटरी ग्रन्थि नियंत्रण में होती है हाइपोथैलेमस नामक दिमाग के एक भाग से, जो मन के द्वारा की गई अत्यधिक उत्तेजना से प्रभावित होता है।
रविदास साहब के चमार बनने की खोज से शरीर में ऊर्जा की खोज करने को नया आयाम मिला है। रविदास साहब ने भी मन को साधने के लिए सांस को रोककर उसे पूरे शरीर में पहुँचाने की क्रिया को करके सांस के द्वारा ऊर्जा उत्पादन और उसके पूरे शरीर में होने वाली प्रकृति को भी समझा है। जब सांस को रोकते है तो वह अंदर ही अंदर खून में घुल जाती है यहाँ से पूरे शरीर के मांस में पहुँच जाती है और मांस की हर एक कोशिका में ऊर्जा का उपयोग करने में सहायक होती है। इसी ऊर्जा की मन से खोज करते हैं तो यह शरीर में महसूस होने लगती है, इस प्रक्रिया को लगातार रोजाना करते रहने से मन बहुत हल्का हो जाता है शून्य हो जाता है परिणामस्वरूप शरीर बहुत हलका रहता है, सुना है रविदास साहब इस प्रक्रिया के दौरान हवा में उठ जाते थे चूंकि मन राग द्वेष विमुक्त होता है तो सिर पर किसी भी प्रकार का कोई बोझ नहीं होता है और शरीर अपने अंदर उस अवस्था को महसूस कर लेता है जो एक तरंग कण यानि वेव पार्टिकल है । इसी प्रक्रिया से ही मन को वश में करने की क्षमता भी पैदा हो जाती है। जिसका स्वयं का मन वश में हो वह किसी के भी मन को वश में कर सकता है जैसे नकली धर्म से हिन्दू ब्राह्मण ने हमारे प्राचीनतम बुद्ध को नकली करैक्टर शिव बता कर प्रचारित किया और अपनी चिढ़ मूलनिवासी बौद्ध पर थोपने के लिए महान बौद्धों के श्रेष्ठ बुद्ध के लिए नीले रंग का चिढ़न से भरा करैक्टर बताया और अपनी टुच्चता और नफ़रत को नकली धर्म की आड़ में मूलनिवासियों पर थोपा। मूलनिवासी बौद्ध के मन से इस नफरती विचारधारा से मुक्त रखने के लिए सभी प्राचीन मंदिरों से बौद्ध स्तूपों को इनकी टुच्चता और झूठ से भरे तृष्णामय विचारों से मुक्त कराना होगा और पुनः बुद्धि स्तूपों को बुद्ध की बुद्धि से जोड़कर मूलनिवासियों को अपनी श्रेष्ठ बुद्धि के प्रति जागरूकता और सम्मान स्थापित करना होगा और सारे प्राचीन बौद्ध स्थलों को अपने अधिकार में भी लेना होगा।
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