असंतुष्टी से संतुष्टि तक

Chapter IX


असंतुष्टि से संतुष्टि तक

देश में 70 सालों में ब्राह्मणवाद का झूठ था जिसने हमारे बौद्धत्व यानि दुनिया की सबसे महान सभ्यता का सत्य छुपाया हुआ था। नकली धर्म से एक झूठी सोच पैदा की गई थी जिससे एक प्रकार का नज़रिया यानि एक प्रकार का चश्मा पहनाया गया था जिसमें महान बौद्ध नंद वंश को और महान बौद्ध वीर मौर्य इत्यादि को शूद्र दलित इत्यादि नामक शब्दावली का नज़रिया दिया गया था और मानसिक रूप से हिन्दू यानि गुलाम शब्दावली  हिन्दू ब्राह्मण के द्वारा नकली धर्म की आड़ में थोपी गई थी। नकली देवी-देवताओं का मानसिक जाल बना कर जिससे महान मूलनिवासी बौद्धों की महानता को नकली धर्म से मनोवैज्ञानिक रूप से ढका हुआ था जिससे महान मूलनिवासी बौद्ध अपनी महान गर्वित मूलनिवासी सभ्यता से अलग रखे गए थे। नकली धर्म से चिढ़न वाली देवी को यह कहकर मानसिकता फैलाई गई कि ये मां है। मां एक सर्वश्रेष्ठ विचार है जिसमें नकली धर्म की आड़ में वासनात्मकता के इर्द-गिर्द ही धर्म को घुमाया जा रहा था। एक मां अपने बच्चे का विश्वास होती है, वह अपने विचारों से बच्चे के मन में विश्वास पैदा करती है और फिर वही विश्वास बच्चे के मन में मां के प्रति बनता है, जब मां का मन बौद्धिक है तो उसका विश्वास सच्चाई पर है और प्रबल है, जब वह नकली धर्म पर है तो अपनी मां के लिए विश्वास खत्म हो कर वह नकली धर्म वाली देवी पर गया और वह देवी है चिढ़न वाली टुच्ची ही करैक्टर।अब यह चिढ़न वाली देवी हिन्दू ब्राह्मण, हिन्दू राजपूत वैश्या के घर में ही जाने देते हैं, हम अपनी मां को महान बहुत बुद्धिमान नज़रिए से देखने की मानसिक सोच को बुद्ध की बुद्धि से जोड़ कर स्थापित करते हैं तो पाते हैं कि हमारी मानसिक विचारधारा श्रेष्ठतम है और हमारा पारिवारिक दृष्टिकोण भी श्रेष्ठ है और द्वेष मुक्त है। हमारी बुद्धि जब हमारे वश में है तो हम जो भी विचार प्रेषित करते हैं वह सभी के मन पर स्थापित होता है। जो मानसिक विद्वेष फैलाया गया है वह पूरा वासना के प्रति तृष्णा के रूप में स्थापित किया गया है और इसी के इर्द-गिर्द घूमता नजर आता है। चूंकि जिस मन को माता पिता से तृष्णा मिले वह अपने ही परिवार से इर्ष्या द्वेष करता है और स्वयं के मन को ही पारिवारिक बौद्धिक प्रेम से वंचित  कर देता है। वह बौद्धिक प्रेम यानि स्वयं के प्रेम और माता-पिता के प्रेम के प्रति असंतुष्ट हो जाता है। माता-पिता के प्रेम से असंतुष्ट मन वासना को ही प्रेम समझने लगता है। यह नकली नज़रिया नकली धर्म की आड़ में मूलनिवासियों के प्रति फैलाया गया था। इस नकली नज़रिये को भंग करने के लिए एक आसान सी प्रक्रिया है, मन के अंदर जाकर अपने बचपन की घटनाओं में यह जाकर खोजना है कि सबसे पहले मन में तृष्णा किस विचार से पैदा हुई। वह बच्चे के विचारों में जुड़ी कोई भी पहली घटना हो सकती है जिसे मन के द्वारा अपनी बुद्धि की शरण में जाकर स्वयं के मन से पूछा जाता है तो मन उस विचार तक पहुंचा ही देता है जिससे वह विचार माता-पिता से जुड़ा हुआ है तो उन्हें बताने से उस विचार के आस पास की तृष्णा भी भंग हो जाती है और मन तृष्णा मुक्त भी होता जाता है। जैसे बुद्ध के बुद्धि से जुड़े स्तूपों को शिव टुच्चे करैक्टर का लिंग कहकर प्रचारित किया गया ऐसे में वासना में फंसे मन को भी मुक्त किया जाता है। चूंकि वासना फंसाई गई है मन में और भगवान बता कर और मन फंसाया गया है लिंग पर जिस मन को हमेशा बुद्धि की शरण में ही रखा जाता है। इसी ध्यान को वापस अपनी बुद्धि में लेकर जाने से मन में फंसी हुई सच्चाई सामने आ जाती है जिसके साथ यह जुड़ी है और उस तृष्णा से उसे मुक्त कर देने से वह भंग हो जाती है। जितना अपने मन से उस तृष्णा को जोड़ते रहते हैं वह मन को उत्तेजित करती रहती है और जैसे ही अपने मन से उसे अपने भीतर खोजते हैं तो यह माता-पिता के विचारों से जुड़ी हुई है यह जानने के पश्चात भंग करते हैं तो वह भंग हो जाती है भगवान बुद्ध की पद्धति के अनुसार। नकली धर्म के शिव यानि पशुपति से जोड़कर बनाए जाने पर ये मूलनिवासियों के पूर्वज की श्रेष्ठतम बुद्धि को लिंग बताकर प्रचारित करते हैं ताकि वासनात्मक रूप में आकर्षित कर सकें।अब हमारे देश की हर एक स्त्री को समझ में आ जाएगा कि उनका पति शराबी या नशेड़ी क्यों है। चूंकि बुद्धि से वो अपने पति की बुद्धि को जागृत और श्रेष्ठ बुद्धि वाला माने तो ही तो उसे उसका पति श्रेष्ठ तृष्णा मुक्त प्रेम युक्त और अपनी बुद्धि से तृष्णा मुक्त रखकर धन वैभव और ऐश्वर्य प्रदान करे। अब उस लिंग की वैचारिकी को मूलनिवासियों से अलग कर बुद्ध की श्रेष्ठतम कौम की बुद्धि को ही आज पुजवाना है ताकि श्रेष्ठ बुद्धि के प्रयोग से देश सम्मानित रहे। हमारे देश की आज की मूलनिवासी बौद्ध कौम श्रेष्ठ और पूरे विश्व में सम्मानित है ऐसी विचारधारा प्रवाहित करनी है। ऐसे में देश में नए आविष्कार होते दिखाई देते रहेंगे और पूरी दुनिया में श्रेष्ठ मूलनिवासी बौद्ध ही दिखाई देने लगें। आज हर एक बौद्ध को दूसरे बौद्ध की बुद्धि का सम्मान करना चाहिए और मन के अंदर से ही एक-दूसरे के प्रति द्वेष मुक्त हैं ऐसा विचार प्रेषित करते रहना है और स्वयं की बुद्धि को ही बौद्ध स्तूप से जोड़कर पूजना है बुद्ध की श्रेष्ठतम बुद्धि को पूजना है और स्वयं की बुद्धि से ही जोड़कर रखना है। नकली नज़रिया नकली इतिहास पढ़ा कर झूठ फैला कर मूलनिवासियों का असली महान इतिहास छुपाकर बनाया गया था। आज समय है ब्राह्मणवाद के नकली धर्म से निकल कर सत्य की ओर यानि असंतोष से मानसिक संतुष्टि की ओर जाने का और देश में पुनः दुनिया की श्रेष्ठतम बुद्धि को जागृत करने का और उस नजरिए का जिससे हर बौद्ध को श्रेष्ठ माना जाता है, बोला जाता है और श्रेष्ठ ही देखा जाता है फैलाया जाना है। जिस प्रकार से इस्लाम में दूसरों को काफिर कहा है उसी प्रकार से हिन्दू ब्राह्मण ने नकली धर्म से हमारी बौद्ध सभ्यता को कुत्सित मानसिकता से छोटा बताया है और टुच्चे शब्दों का प्रयोग हमारी सभ्यता के लिए किया गया है।


ये जो नकली धर्म बनाया गया है ये इन्होंने अपने लिए बनाया है यह इस्लाम का रूप है, हमें अपनी सभ्यता और संस्कृति को इनसे अलग करना होगा।


आज देश को नई बौद्ध मूलनिवासी सरकार की जरूर है जो देश को बौद्ध राष्ट्र बनाने के लिए और बौद्ध धरोहरों को नकली धर्म से मुक्त कर बौद्धों को वापस दिलवाने के लिए, बौद्ध इतिहास को पुनर्जीवित करने के लिए, असली इतिहास जो मूलनिवासी एससी एसटी और असली ओबीसी से जुड़ा हुआ है उसका सच लिखे जाने के लिए ताकि उनके वंशज़ अपने इतिहास पर गर्वित रहें और सबसे बड़ा मुद्दा ईरानी हिन्दू वैश्या वर्ग (नीरव, अडानी, अंबानी इत्यादि) से लूटे गये धन को मूलनिवासियों को वापस करवाने और मूलनिवासी का समुचित विकास करने के लिए दोबारा बौद्ध सच्चाई और विचारधारा का विकास जरूरी है जिसके लिए मूलनिवासी बौद्ध का देश की सत्ता पर पूर्ण कब्जा स्थापित किया जाना आवश्यक है। 70 साल तक हिन्दू ब्राह्मण ने नकली धर्म की टुच्चता को देश के महान बौद्ध कबीर के विचारों पर थोपा और झूठ फैलाकर मासूम बौद्ध विचारधारा वाले देश में अपनी मानसिक टुच्चता को मनोवैज्ञानिक रूप में फैलाया और थोपा जिससे मूलनिवासी बौद्ध नकली धर्म में फंसकर अपने कबीर बुद्ध की महान विचार धारा को छोड़कर खुद भी असंतोष के मार्ग पर चलने लगे थे चूंकि बिमारी ग्रस्त ब्राह्मण मानसिक टुच्च स्थिति में जेटली सुषमा अटल के ऊपर साजिश करने की मानसिकता के टुच्चेपन से सड़ातन असर होते देख चुका है और आगे नकली धर्म का भविष्य सड़ातन भी हिन्दू ब्राह्मण, राजपूत, वैश्या ईरानी हिन्दू को मानसिक टुच्च स्थिति में समझ आ गया है इसलिए मनुवाद के लिए आखिरी अपंगता वाला दांव अपनी चोरी वाली मानसिकता से ईवीएम इत्यादि सैट करके सत्ता वैश्या हिन्दू मोदी के हाथ में डालकर अलग-अलग तरीकों से लूटपाट कर खूब असंतुष्ट माहौल बनाया जाना था और देश के सारे कानून जैसे पहले देश से विदेश में पैसा ले जाने की न्यूनतम सीमा कम थी को खूब बढ़ा कर देश का पैसा माल्या नीरव चौकसी इत्यादि  के हाथों विदेश में लेकर भगाया गया ताकि जब झुठलर चौराहे पर खड़ा किया जाए तो सभी झोलाछाप झोला उठाकर भाग सके। जब लोगों ने इसके चोरों को चोरी करने पर भी चौराहे पर नहीं खड़ा किया तो दूसरे कानून बनाने पर चोरी छिपे काम शुरू किया गया परन्तु नकली धर्म वाले उनकी मानसिक मनुस्थिति और उनपर सड़ातन असर को भांप चुके हैं इसलिए ही बौद्ध मूलनिवासी अपनी श्रेष्ठ बुद्धि के प्रयोग से मूलनिवासियों को श्रेष्ठतम अवस्था में देख रहे हैं। इन्होंने नकली धर्म की आड़ में हमसे जो कुछ भी लूटा है वह स्वयं ही हमारे पास वापस आने लगा है बस अपने बुद्धि के दृष्टिकोण को पारिवारिक रुप में तृष्णा मुक्त और प्रेम करुणा से भरपूर कर दें। यह सबसे पहले अपने ही माता-पिता के प्रति अपने मन में पैदा करना शुरू कर दें। जब भी तृष्णा आए उसे उसके  पैदा होने वाले स्थान पर जाकर भंग कर दें। और किसी के साथ भी तृष्णा को पैदा ना होने दें। तृष्णा को कैसे समझें? जब किसी कार्य को शुरू करते हैं तो मन अंदर से एक आवाज देता है। वह आवाज या तो डर के रूप में होती है या विश्वास के रूप में। अगर डर है तो तृष्णा है और डर को पहचानने के लिए ही मन के भीतर जाकर सच्चाई जानकर उसे भंग किया जाता है।डर का जुड़ाव मां पैदाइश माता-पिता के मन से जुड़ा होता है जो बचपन से किसी घटना या कारण से जुड़ा होता है।  मुकेश अंबानी ने अपने इसी डर की वजह से ही कि


पैट्रोकैमिकल इन्डस्ट्री अगले दस साल में खत्म हो जाएगी और हिन्दू ईरानी वैश्या मुकेश अंबानी  का धंधा चौपट हो जाएगा ऐसा जानते हुए भी किसानों की खेती और उपजों पर इनकी नज़र पहुंच रही थी। इस नकली धर्म के हिन्दू वैश्या ने किसी आविष्कार इत्यादि को प्रोत्साहित नहीं किया बस सिर्फ लूटपाट की मानसिकता को ही बढ़ाया। नकली धर्म के भंग होने से मूलनिवासियों पर इसका प्रभाव भंग होने पर बुद्धि जागृति के भाव बढ़ने लगे हैं।


नकली धर्म के खत्म होने के बाद किसान और मूलनिवासी बौद्ध ही अमीर और श्रेष्ठ होने लगे हैं  चूंकि महान बौद्ध अपनी बुद्धि को जागृत करने लगे हैं तो नकली धर्म वालों को गटर सफाई से बचाने के ईरानी मुगल हिन्दू वैश्याओं को लूट लूट कर धन सौंपना और मूलनिवासी बौद्ध किसानों की किसानी वाले स्वाभिमान में घुसपैठ करने के लिए ही हिन्दू वैश्या मोदी की सरकार में कानून बनाए गए।  कृषि हमारे देश में हमेशा से ऐसा क्षेत्र रहा है जिसमें ईरानी वैश्या हिन्दू की घुसपैठ आजादी के बाद से वर्जित रखी गई है। अब इस क्षेत्र में घुसपैठ करने की मानसिक अपंग सोच के बाद नकली धर्म की टुच्चता से भी देश की आजादी सुनिश्चित होती है और देश की सत्ता पर मूलनिवासियों का कब्जा होना स्वाभाविक हो जाता है। सारे देश में बौद्ध धरोहरों को नकली धर्म वाले मानसिक बिमारों से आजाद कर देश बचाना आवश्यक हो जाता है। इस समय में एक ऐसे फार्मूले की आवश्यकता है जो सभी बौद्ध मूलनिवासियों को रोजगार और श्रेष्ठ बुद्धि और शिक्षा की सुगमता को जोड़ कर चल सके, यह फार्मूला कृषि के विकास के साथ और हर गांव में कृषि के औद्योगिकीकरण जो किसानों के ही हाथ में हो से संभव है जिसे मूलनिवासी बौद्ध ही अपनी श्रेष्ठ बुद्धि से देशवासियों को प्रदान कर सकते है। इसके साथ ही यह भी ज्ञात हो जाता है कि बिना मूलनिवासी बौद्धों के और उनकी जागृत अवस्था के पूरा विश्व ही बौद्धत्व से परिपूर्ण नहीं हो पाएगा चूंकि जागृत बुद्धि का विकास पूरी दुनिया में भारत की बौद्ध कौम की ही देन है और पूरे विश्व का बौद्धत्व मूलनिवासी बौद्ध कौम से जुड़ा होने की वजह से बुद्ध की शांति से भी दूर हुआ, जिसका एक बड़ा उदाहरण है फलिस्तीन और इज़राइल, ईरान की अमेरिका से झड़प, इत्यादि है। वैसे भी मक्का मदीना में स्थापित बौद्ध स्तूप के इर्द-गिर्द चक्कर लगाने से और उसको हज़ के रूप में जोड़ कर देखे जाने से यह तो स्थापित हो जाता है कि बुद्ध इतिहास की जागृत बुद्धि ही सर्वश्रेष्ठ है और इस्लाम आज भी उसी जागृत बुद्धि के इर्द-गिर्द घूम रहा है। बौद्ध तकनीक ही पूरे विश्व में मन में संपूर्ण सत्य को स्थापित करने में सक्षम है। बुद्धि की जागृति से ही देश में एकता की भावना प्रबल हो सकती है और देश की जीत संभव है,इसलिए चलो बुद्ध और बौद्ध सत्ता की ओर।

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