बाबा साहब ने हमें बौद्ध बनने के लिए क्यों कहा था?
आजादी के बाद देश में कुछ बदलाव दिखाई देने लगे थे।बाबा साहब ने सामाजिक परिवर्तन करके देश के मूल निवासियों को बौद्ध बनाया, क्योंकि बाबा साहब जी ने म्यांमार से विपस्सना की थी तो वे मन की असीमित शक्तियों को पहचान चुके थे मन की शांति को पहचान चुके थे और सम्मान की दृष्टि से भारत के मूलनिवासियों के असली इतिहास में यह पाया कि वे उस कौम के वंशज़ हैं जिसने बहुत से बुद्ध दुनिया को दिए और उनमें से एक बुद्ध को तो पूरी दुनिया में उनके विचारों और मन को पढ़ने के ज्ञान के कारण अनुसरित किए जाते है और उनके दिए गए ज्ञान और विपसना को पूरे विश्व में माना जाता है,इसलिए उन्होंने मूल निवासियों को बौद्ध बनने की सलाह दी और धर्म परिवर्तन करवाया ताकि वे अपनी विश्व प्रचलित बौद्ध सम्मान को और दुनिया की सबसे श्रेष्ठ बुद्धि को पहचान कर फिर से नालंदा विश्वविद्यालय जैसे विश्व विख्यात हो कर रहें।
एक सवाल फिर से उठता है कि आखिर बाबा साहब ने ऐसा क्या जाना कि जिस से नागपुर में लाखों लोगों को धर्म परिवर्तन करवाया?
वह था मन से संपूर्ण सत्य को पहचानने की क्षमता।हमारा मन इतना शक्तिशाली है कि उसने प्रकृति के हर सत्य को ढूंढने और पहचानने और महसूस करने की क्षमता रखता है, जिसके लिए हमारे मन का पूर्ण रूप से वर्तमान में होना आवश्यक है।
मन को पूर्ण रूप से वर्तमान में लाने के लिए क्या किया जाए?
मन के अंदर विचार हमेशा चलते रहते और वे विचार हमेशा भूतकाल यानी पास्ट के विचारों का अहसास दिलाते रहते हैं, यह विचार इतनी तेजी से आते हैं कि पल पल में बदलते रहते हैं।विचारों का पल पल में बदल ना यह दर्शाता है कि मन अभी भी भूतकाल में है और भूतकाल में सीखी हुई चीजों से ही मन जुड़ा है और वर्तमान में होने वाली सभी घटनाओं की सत्यता को पूर्ण रूप से नहीं पहचान पाता है।यह मनोवैज्ञानिक रूप से देखा गया है कि जब मन भूतकाल से जुड़ा होता है तो उस समय के मन में चिड़न गुस्सा द्वेष मोह राग इत्यादि में मन फंसा होता है।यह सभी विकार समय-समय पर वर्तमान के पूर्ण सत्य को पहचानने नहीं देते हैं, मान लीजिए किसी से बात करते समय गुस्सा आ जाए तो वह पूर्ण सत्यता को पहचानने नहीं देता है और गुस्से की वजह से वार्तालाप अधूरा ही रह जाता है और यह अगर किसी कार्य से जुड़ा हुआ है तो वह कार्य भी अधूरा रह जाता है। इसी प्रकार से अगर आप वर्तमान में अपने मन को देखते हैं तो आपको समझ में आता है कि दो अलग-अलग तरह के भाव आपको एक अच्छा फीलिंग या एहसास देते हैं और दूसरा विचार बुरी फीलिंग यह बुरा भाव दे सकता है, इन दो अलग-अलग भावों के विचारों के बीच एक छोटा सा खाली स्थान बनता है, इस खाली स्थान को लगातार बढ़ाते रहने से संपूर्ण शून्यता का भाव पैदा होता है।यह विचार शून्यता ही सत्य को पूर्ण रूप से पहचानने में सहायक होती है।धीरे धीरे करके जब इस विचार शून्यता को बनाए रखने की आदत बनने लगती है तो मन पूर्ण रूप से वर्तमान में रहने का आदि होने लगता है और बौद्धत्व को प्राप्त करने लगता है।वर्तमान में रहने वाला मन बहुत शक्तिशाली और किसी भी कार्य को पूर्ण क्षमता के साथ करने में सक्षम होता है।इस विचार शून्यता को पाने में बौद्ध विपस्सना यानि सांस को ध्यानपूर्वक महसूस करने और देखने से और ज्यादा आसानी से प्राप्त किया जा सकता है, इस प्रकार भावशून्यता प्राप्त मन बहुत शांत रहता है और बिना विचलित हुए बहुत से कार्य करने में सक्षम होता है, यह भाव शून्यता मन को शांत और एकाग्र करने में सहायक होती है और और दूसरों के विचारों पर प्रतिक्रिया करने से भी मुक्त करती है।
विचार शून्यता से किया गया कोई भी कार्य समय के अंदर ही पूर्ण करने की क्षमता पैदा हो जाती है और समाज में, देश विदेश में पहचान बनती है।
इस प्रकार विचार शून्यता का सबसे बड़ा फायदा होता है कि प्रकृति के पूर्ण सत्य को महसूस करने लगता है मन, इसका एक सबसे बड़ा फायदा है कि मन पूर्ण रूप से भावशून्यता से तनाव मुक्त रहता है, शारीरिक विकारों से पूर्ण रूप से मुक्त रहता है तो शारीरिक बिमारियों से भी मुक्त रहता है, और दूसरे के मन को पढ़ सकता है काबू कर सकता है।
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