त्योहार शब्द हिंदी भाषा का शब्द है, इसके सन्धि विच्छेद करने पर दो शब्द बनते हैं, एक है त्यो, यानी तुम्हारा, तुम, तेरा इत्यादि, और हार, यानी विफलता वह, असफलता इत्यादि। एक बहुत गज़ब का तर्क दिया जा रहा है कि त्योहार शब्द की उत्पत्ति तवहार जो फारसी का शब्द है उससे हुआ है।, संस्कृत प्राचीन भाषा है, तो फारसी उससे भी प्राचीन होगी, हिन्दी संस्कृत से पैदा हुई, और संस्कृत पाली से, तो त्योहार शब्द पाली से ना लेकर तवहार यानी फारसी से लिया गया बता रहा है ब्राह्मण मानसिक अपंग। तो त्योहार शब्द भारतीय नहीं है तो फारसी है, जब यह फारसी है तो पर्व भी फारस का ही हुआ? यानी दिवाली फारसी त्योहार है, यह दशरथ मौर्य से संबंधित पर्व नहीं है।
अगर पाली भाषा के प्राचीन शब्दों से पैदा हुए शब्दों को जानें तो हमारे प्राचीन शब्द हैं उत्सव, पर्व। उत्सव में उत्साह झलकता है। वह दिवस जिस दिन अत्यधिक उत्साह मन में पैदा हो जाए और मन प्रफुल्लित रहे। हमारी बौद्ध बुद्धिमान संस्कृति में शब्दों के प्रवाह और उससे उत्पन्न ऊर्जा के मानसिक संवर्धन को लेकर शब्दों का निर्माण किया गया है परंतु हिंदी भाषा को पैदा करने वाले चिढ़ से भरे हुए मानसिक अपंगो ने नकली धर्म की आड़ में शब्दों में एक टुच्चा मनोविकार पैदा किया। त्यो हार यानी तुम्हारी हार, ऐसे शब्द का निर्माण करने की क्या जरूरत थी। चूंकि हमारी श्रेष्ठ बौद्ध सभ्यता को नष्ट किए बिना हमारी बुद्धि पर अपनी बुद्धि को थोपना आसान नहीं था इसीलिए ही 11 वीं शताब्दी में नालंदा विश्वविद्यालय को जलवाकर हमारी श्रेष्ठ बौद्ध सभ्यता को नष्ट किया गया था। ऐसा ही एक और शब्द है लिंग, नकली धर्म में सिंधु घाटी के बुद्ध की जगह नकली टुच्चा शिव बना कर प्रचारित किया गया। अब हमारे देश में जो बौद्ध स्तूप यानी बुद्धि स्तूप होते थे उन्हें छुपाने के लिए शिव टुच्चे का लिंग बताकर प्रचारित किया गया। अब जैसे ही शिवलिंग पर सवाल खड़े किए गए तो टुच्चों ने फिर एक नया झूठ बताया कि लिंग का मतलब होता है प्रतीक। अब लिंग का मतलब प्रतीक होता है तो अंग्रेजी में मतलब phallus worship क्यों पढ़ाया गया। यानी ब्राह्मण टुच्चा साबित होने के लिए झूठ को बचाने के लिए और झूठ बोलेगा, परंतु वह भूल गया कि यह बौद्ध देश है यहां झूठ फ़ैलाने से ब्राह्मण मानसिक अपंग हो गया है।
अब दिवाली का इतिहास क्या है? सुप्रीम कोर्ट इसे काल्पनिक ग्रंथ बोलती है। अब जो कल्पना पर आधारित है तो उसे महत्वपूर्ण ग्रंथ क्यों साबित किया जा रहा था हिंदू धर्म यानी नकली धर्म का। आज सुप्रीम कोर्ट के अनुसार हिन्दू कोई धर्म नहीं है। जब हिन्दू कोई धर्म ही नहीं और रामायण काल्पनिक है तो यह दिवाली त्योहार क्यों? इसमें भी ब्राह्मण वैश्याओं ठाकुरों की हार स्थापित होती है और जीत मूलनिवासी की है। चूंकि मूलनिवासी लगातार बौद्ध होता जा रहा है और बुद्धि से सर्वश्रेष्ठ होता जा रहा है और ताकतवर भी। तो त्योहार का मतलब है ब्राह्मण को मानसिक अपंग होकर जेटली सुषमा पर्रिकर अटलू टुच्चे जैसे सड़ातनी होकर मरते जाना। यानी ब्राह्मण मानसिक अपंग की हार। इस विचार को इतना प्रचारित करो कि मूलनिवासी बौद्ध ताकतवर होकर देश को लूटने वाले वैश्या मानसिक अपंग से मुक्त कर सकें और देश चोर सर्वपल्ली राधाकृष्णन जैसे को चोर ही कहे और श्रेष्ठ मूलनिवासी को श्रेष्ठ।
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