हिन्दू धर्म हिंदी इत्यादि में झलकती ब्राह्मण मानसिक अपंग की अपंगता

हिन्दी भाषा में एक शब्द है पुरुष जिसका अर्थ है  आदमी। पुरुष शब्द में जुड़ा हुआ है पुरु।  पुरु यानी पोरस अकेले भारतीय उपमहाद्वीप के राजा थे जो सिकंदर से हारे थे। पोरस का राज्य आज का हरियाणा पंजाब का राज्य समझिए। जब सिकंदर हमारे देश में आगे बढ़ा तो वो आगे नंद राजा थे जिनकी राजधानी पटना थी। यह एक बौद्ध राज्य था। बौद्ध होने की वजह से यह राज़ दुनिया का सबसे शक्तिशाली राज्य था। सिकंदर को इन्होंने मार भगाया था। अगर हिंदी भाषा में हम किसी शब्द का निर्माण करेंगे तो हम नंदुष शब्द का निर्माण करेंगे चूंकि नंद राजा ने सिकंदर को मार भगाया था। तो पुरुष शब्द का निर्माण किसके द्वारा किया जाएगा?  सिकंदर से हारने वाले राजा के नाम से जोड़कर बनाया गया पुरुष शब्द। पुरुष यानी आदमी। वो आदमी जो हारे हुए राजा से जुड़ा है। हारे हुए राजा से जोड़ कर कोई पुरुष शब्द का निर्माण करेगा तो वह जरूर ही युनानी होना चाहिए। तो ब्राह्मण ही वह युनानी है जिसने हारे हुए राजा पुरू का  शब्द उठाकर पुरुष शब्द का निर्माण किया और मनोवैज्ञानिक रूप में प्रभावित करने के लिए इस शब्द को हिंदी भाषा में डाल दिया गया। जब ब्राह्मण किसी से भी पूछता है कि क्या आप पुरुष हैं या महापुरुष हैं तो इसका सीधा सा अर्थ निकलता है सिकंदर से हारा हुआ। इस मनोवैज्ञानिक प्रभाव को वही दे सकता है जो बुद्धि से  इस प्रभाव को टैलिपैथी करना जानता है।  जो बौद्ध विपसना करते हैं वे बुद्धि से बहुत प्रभावशाली होते हैं और अपनी बुद्धि से दूसरे की बुद्धि को प्रभावित कर सकते हैं।  दूसरा वर्ग हमारे देश में निर्माण किया गया है गुलाम यानी हिंदू। हिन्दू शब्द का फारसी भाषा में मतलब बताया गया है काला गुलाम। अब जो  नकली धर्म के नकली टुच्चे देवी देवता पूजता है वह बुद्धिहीन है। वह अपनी बुद्धि से दूसरों की बुद्धि को प्रभावित नहीं कर सकता है।  ऐसे लोगों को युनानी ब्राह्मण मानसिक अपंग आराम से  हारी हुई मानसिकता थोप सकता है। पुरुष शब्द का प्रभाव ऐसे लोगों की मानसिकता पर डालना आसान होता है। दूसरा एक और शब्द है मनुष्य, इस शब्द में मनु शब्द छिपा है। इस शब्द का संधि विच्छेद करते हैं तो मनु+ शिष्य प्राप्त होता है। मनु वही है जिसको वर्ण व्यवस्था का संस्थापक बोला गया है। अब इस मनोवैज्ञानिक प्रभाव को थोपने वाले शब्द का निर्माण करने वाले विदेशी मूल के ब्राह्मण मानसिक अपंग की अपंगता से उसे किसको प्रभावित करना था। तमिलनाडु वालों पर हिंदी भाषा का कोई मनोवैज्ञानिक प्रभाव नहीं पड़ता है इसीलिए वहां के इस बार की विधानसभा में एक भी ब्राह्मण मानसिक अपंग नहीं है। इस प्रकार से ब्राह्मण मानसिक अपंग ने जो पूरा नकली धर्म का निर्माण किया था वह पूरा का पूरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव देने के लिए ही बनाया गया था। नकली धर्म पूजने वालों के घरों में पारिवारिक कलह जरूर होगी। वो चिढ़न और गुस्से से हमेशा भरे रहते होंगे।  चूंकि इस नकली धर्म का निर्माण ब्राह्मण मानसिक अपंग ने हमारे बुद्ध और बौद्ध इतिहास के विपरीत ही किया है जैसे बुद्ध के पूर्व बुद्ध को शिव शंकर टुच्चा भंगेड़ी नशेड़ी बताया गया है। अब अगर आपकी मां एक भंगेड़ी नशेड़ी को पूज रहीं हैं तो वो आपके ऊपर क्या मनोवैज्ञानिक प्रभाव छोड़ रही हैं। लिंग पूज रहीं हैं तो वासना थोप रहीं हैं और मां की बुद्धि का प्रभाव बच्चों पर सबसे ज्यादा पड़ता है। नकली धर्म पूजने से बच्चे चिड़चिड़े और वासना से अत्यधिक प्रभावित होंगे। ऐसी औरतें पर भी नकली धर्म टैलीपैथी के रूप में बहुत प्रभावित करता है। इच्छा शक्ति कम हो जाती है, डर का प्रभाव ज्यादा होता है, इत्यादि इसीलिए अगर पूजना भी है तो बुद्ध और बौद्ध स्तूप पूजो जिससे बुद्धि में बौद्ध शक्ति पैदा होगी। बौद्ध विपसना करने से बुद्धि भंग अवस्था प्राप्त कर भगवान हो जाती है और भगवान बनने से किसी भी इच्छा की प्राप्ति आसानी से की जा सकती है। चूंकि जब मन पर बहुत सी इच्छाएं बैठी होती हैं तो सभी इच्छाओं को पूरा करना, सभी इच्छाओं पर अपनी उर्जा लगाना आसान नहीं है, परंतु भंग अवस्था में किसी भी एक इच्छा को पूरा करना अपनी सारी ऊर्जा को एक इच्छा पर लगाकर इच्छा शक्ति से प्राप्त करना आसान होता है।

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