ब्राह्मण बौद्ध से ही क्यों डरता है?

हमारे दिमाग और शरीर के बीच में होता है मन, मन फंसा होता है तृष्णा में, तृष्णा है मन का आवेश( पैसा काम मोह क्रोध खूबसूरती इत्यादि)। बचपन से इस आवेश में मन फंसता जाता है। जितना ज्यादा मन इन आवेशों में फंसता जाता है उतना ही शरीर के भीतर से जुड़ाव कम करता जाता है। जितना शरीर से जुड़ाव कम होगा उतना ही व्यक्ति इमोशनल कमजोर होगा। मन को शरीर से जुड़ाव बनाने के लिए प्रैक्टिस जरूरी है जिसका श्रेष्ठ मार्ग भगवान बुद्ध ने दिया है। विपस्सी बुद्ध ने विपसना दी मन को सांस के द्वारा पहचानने के लिए और सुकिति बुद्ध यानी गौतम बुद्ध ने लोट्स सूत्र दिया दिमाग को नाभि से जोड़ कर देखने का मार्ग।मन नाभि से जुड़ते ही अत्यधिक शक्तिशाली और हर बिमारी से मुक्त रहता है। अब ब्राह्मण  हमारे बौद्ध इतिहास से डरता क्यों है, क्योंकि ये  नकली धर्म की आड़ में सबको वासना में फंसा कर रखना चाहता था। चूंकि बौद्ध विपसना करने से बुद्धि वश में आती है, जिससे कोई भी वश में आ जाता है इसीलिए ये नकली धर्म की आड़ में बौद्धत्व को गायब किए हुए था। बुद्ध का लोट्स सूत्र इस धरती का सब कुछ है। इस पर प्रैक्टिस जरूरी है। सभी मूलनिवासी विपसना प्रक्रिया को अपनाएं और नकली धर्म से पूर्णतया मुक्त रहें। स्वस्थ रहना जरूरी है विचारों को समझना जरूरी है। मन जिसका काबू में उसके सब काबू में।ं

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