#नागपंचमी #नाग #राजा
हमारे पूर्वज 28 बुद्ध के द्वारा दिए गए धम्म और इस धम्म को मानने वाले राजाओं के उपासक रहे हैं। जो भी राजा हमारे देश में हमारे रक्षक के रूप में रहे, सभी नागरिक उन्हें श्रेष्ठ मानते थे और उनकी उपासना करके उन्हें अपनी बुद्धि, से ऊर्जा प्रदान करते थे। ऐसे ही हमारे बौद्ध इतिहास में पांच राजाओं का जिक्र है जो हमारे लोगों की रक्षा के लिए विदेशी आक्रमणकारियों से जीत हासिल करते रहे हैं। ऐसे सबसे पहले महान बौद्ध राजा थे धनानंद। इन्होंने सिकंदर को मसल कर रख दिया था। हमारे बौद्ध विपासकों की वजह से सिकंदर और उसकी सेना बिमारी ग्रस्त होकर प्लेग से मर गई थी। इनके इतिहास के साथ ब्राह्मण ने मानसिक अपंग होकर जो छेड़छाड़ की है वो है इन्हें उग्र बताया जाना। ये बौद्ध विपासक थे और एक बौद्ध विपासक कभी भी उग्र स्वभाव का नहीं हो सकता है। वो बुद्धि से शांत और गंभीर रहेगा। उसके बाद इसका सेनापति सेल्यूकस निकेटर लड़ने के लिए हमारे बौद्ध देश में आया और ये भी बौद्ध चन्द्र गुप्त मौर्य से बुरी तरह हारकर अपनी लड़की और हारी हुई सेना को हमारे देश में छोड़कर चला गया था। ये आज जो ब्राह्मण बना घूम रहा है ये उसी हारी हुई सेना का टुच्च वंशज है जिसने हमारे बौद्ध इतिहास और उत्सवों को विकृत कर नकली त्योहारों में बदला। ऐसे ही हमारे बौद्ध इतिहास में विदेशी आक्रमणकारियों से बचाव करने वाले रहे हैं सम्राट महिषासुर जिन्हें आज भी झारखंड का आदिवासी मूलनिवासी बौद्ध समाज पूजता है। इनकी महानता से चिढ़ कर ब्राह्मण ने जानबूझकर एक नकली धर्म में नकली कहानी जोड़ कर प्रचारित की, जिसमें किसी टुच्ची वैश्या दुर्गा को देवी बताकर उनकी महानता को द्वेष के रूप में प्रचारित किया गया। ऐसे ही हमारे बौद्ध इतिहास में हमारे मूलनिवासी बौद्ध राजा थे पांच नाग राजा। इन पांच महान बौद्ध मूलनिवासी राजाओं का जिक्र हमारे बौद्ध इतिहास में है। हमारे मूलनिवासी लोग इन पांचों बौद्ध नाग राजाओं के उपासक थे जो आज भी नाग पंचमी के रूप में पूजे जाते हैं। परंतु महान बौद्ध नागवंशी राजाओं के असली पर्व की जगह हर जगह फैला दिया गया सांपों का त्योहार। यानी जो मूलनिवासियों का उत्सव था उसे बताया गया सांपों का त्योहार।
“तथागत बुद्ध का पवित्र संदेश एवं उनका उपदेश अखंड जम्बूद्वीप में जिन नाग लोगों ने पहुंचाया , जिन्होंने #बौद्ध #धम्म का प्रचार और प्रसार किया , उनकी याद में “नागपंचमी” का यह उत्सव संपूर्ण भारत देश में मनाया जाता हैं| नाग लोग यह तथागत बुद्ध के अनुयाई , उपासक एवं बौद्ध धम्म के प्रचारक थें , तथागत बुद्ध के प्रथम पांच शिष्य भी नागवंशी थें|
पांच नाग राजाओं के स्वतंत्र गणतांत्रिक राज्य थें , “अनंत नाग” यह सबसे बड़े थें , जम्मू-कश्मीर का अनंतनाग शहर उनकी स्मृति का प्रमाण हैं| दुसरे नागराज “वासुकी” यह कैलास मानसरोवर क्षेत्र के प्रमुख थें , तीसरे नागराज “तक्षक” थें , जिनकी स्मृति में आज तक्षशिला पाकिस्तान में स्थित हैं| चौथे नागराज “करकोटक” और पांचवें “ऐरावत” थें|
पांच शक्तिशाली नाग राजाओं की स्मृति में उनके क्षेत्र के लोगों द्वारा आयोजित वार्षिक उत्सव को “नागपंचमी” के रूप में जाना जाता था , धीरे-धीरे यह उत्सव संपूर्ण भारत में मनाया जाने लगा , किन्तु ब्राह्मण मानसिक अपंग पौराणिक साहित्यकारों ने नागराजाओं का वर्णन एक “सांप” के रूप में प्रचारित किया जिसको फैलाने में उनका साथ दिया विदेशी मूल के ठाकुर वैश्या ने। चूंकि ब्राह्मण मानसिक अपंग स्थिति में नागवंशी यानी मूलनिवासी नागरिकों को सांप की तरह खतरनाक मानता है और हमारे बौद्ध नागवंशियों से हमेशा ही हार जाता है इसलिए उसने इस महान उत्सव को सांपों की पंचमी बताकर प्रचारित किया और महान बौद्ध नाग लोगों की महान बौद्ध पंचमी गायब हो गईं|
आज के समय में नागपंचमी का पर्व सांप को दूध पिलाना यह ब्राह्मण ने मानसिक अपंग होकर फैलाया है। हमारी प्राचीन प्राकृत पाली के अनुसार नाग शब्द का अर्थ होता है आदमी ,परंतु इसे ब्राह्मण के टुच्चपन के द्वारा हिंदी में इसका अर्थ बदल कर किया गया सांप। नाग शब्द का असली अर्थ आज भी प्रचलित शब्दों में साफ झलकता है, जैसे नागरिक, नगर, नागपुर इत्यादि।परंतु आज भी गांव देहात की महिलाएं घर की दीवारों पर पांच नागों का चित्र बनातीं हैं , यह उन पांच नाग राजाओं की स्मृति का सबसे बड़ा प्रमाण हैं , बस वह उनका वास्तविक स्वरूप , उनकी पहचान एवं उनका इतिहास भूल गए थे जिसे इस लेख के द्वारा जाग्रत कर सुद्रिड़ किया जा रहा है। नागपंचमी का संबंध सांप से नहीं , बल्कि नागपंचमी का संबंध पांच बौद्ध शक्तिशाली पराक्रमी नाग-राजाओं से हैं|
तथागत बुद्ध के प्रथम पांच शिष्य नागवंशी थें , बौद्ध धम्म का प्रचार और प्रसार करनेवाले इन नाग राजाओं की संख्या भी पांच थीं , इसलिए पौराणिक साहित्यकारों ने “पांच पांडवों” की कथा बनाई हैं| इतना ही नहीं बल्कि बौद्ध साहित्य में ओर सौ (शंभर) नागों का जिक्र मिलता हैं , इसलिए पौराणिक साहित्यकारों ने “१०० कौरवों” की कथा बनाई , इस तरह से बौद्ध पात्रों का ब्राह्मणीकरण किया गया है| आनेवाले समय में हम “नागों का असली इतिहास दुनिया के सामने आ गया है। बस दृढ़तापूर्वक अपने उत्सवों को फिर से प्रचारित करना और उत्साह पूर्वक मनाया जाना आवश्यक है।
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