जातियां मूलतः थोपी गई व्यवस्था है कश्यप समाज को कस्सापा बुद्ध से जोड़ कर देखिए यहां समझ आता है कि कश्यप समाज प्राचीन काल में कस्सापा बुद्ध को फौलो करता होगा, उसके बाद कश्यप सरनेम पैदा हुआ, आज की व्यवस्था के अनुसार कश्यप समाज पर थोपे गए शब्द धींवर को देखिए चूंकि ब्राह्मण पहले लोगों की कुंडली वग़ैहरा बनाता था इसी की आड़ में ब्राह्मण ने कश्यप समाज को धींवर शब्द थोपना शुरू कर दिया । धीं + वर यानी धीं का वर। इस शब्द को ऐसे ही ब्राह्मणों ने थोपा मूलनिवासियों के सिर पर।धीं पंजाबी भाषा में बेटी को कहा जाता है। पंजाबी शब्द को चुराकर उसे मूलनिवासी बौद्ध ओबीसी को अपमानित करने के लिए थोप दिया गया शब्द धींवर। अब हमारे गांव में जो कश्यप समाज है वो अपने आप को शब्दों के अर्थ का सही मतलब जाने बिना धींवर बोलने लगा। ऐसी टुच्चता ब्राह्मण मानसिक अपंग स्थिति में सभी मूलनिवासियों के साथ कर गया और नकली धर्म की आड़ में वर्णवाद थोप दिया गया और दुष्टता से अपमानजनक शब्द भी थोपे। किसी के दिमाग पर कुछ थोपना हो तो मन की भीतरी ताकत से ज़ोर ज़ोर से बोलकर एक प्रकार का भगवान का डर बनाकर ऐसे शब्दों को थोपा जाता था। जो विपसना इत्यादि नहीं करते उनके मन पर कुछ भी थोपना आसान होता है। एस सी समाज में कहीं कहीं पर बौद्ध विपसना की जाती है इसलिए बौद्ध इतिहास की कुछ सामाजिक सच्चाई कुछ हद तक बची रही। परंतु ओबीसी में जो हजारों जातियां बना कर थोपी गई उसके पीछे का सत्य यही है कि ओबीसी विपसना भूल चुका था और नकली धर्म में फंसाकर नकली धर्म की आड़ में उनके मन के साथ खिलवाड़ करना, उसके मन पर डर को हावी करना इत्यादि आसान हो गया था। उसी की आड़ में हजारों जातियां ब्राह्मणों ने मूलनिवासी समाज पर थोपीं। मूलनिवासी सिख समाज ने नकली धर्म को कभी नहीं अपनाया था इसीलिए सिख समाज ब्राह्मण की टुच्चता से हमेशा ही बचा रहा और आज जातिवाद से बाहर है। देश के बौद्ध समाज को फिर दोबारा से बुद्ध को देश में वापस स्थापित करना होगा और ब्राह्मण के द्वारा थोपी गई जातियों का मूल सत्य ढूंढना होगा। चूंकि हर शब्द का एक अर्थ होता है और हर अर्थ का असर सुनने वालों के मन पर होता है। इसी प्रकार से और गहरी जांच करेंगे तो भंगी शब्द का इतिहास समझ में आता है। भंगी शब्द भगवान शब्द से जुड़ा हुआ शब्द है। हमारे पूर्वज बौद्ध थे हमारी मूल संस्कृति बौद्ध है। सिंधु घाटी की सभ्यता में उजागर सत्य हमें बौद्ध होने का सबूत देते हैं। इसी प्रकार हमारे 28 बुद्ध का इतिहास उजागर होता है और उससे जुड़े हुए शब्दों से आज के शब्दों को जोड़कर देखें तो जुड़ा हुआ इतिहास समझ में आ जाता है। भंगी शब्द भंग अवस्था प्राप्त करने वालों से जुड़ा हुआ शब्द है। भंग अवस्था प्राप्त करने के लिए जब लगातार बौद्ध विपसना की जाती है तो मन जो इधर-उधर भागता जाता था कभी पुरानी यादों में कभी मन फेंटेसी बनाने में वह मन रुकने लगता है थमने लगता है और मन के अंदर चलने वाले सारे विचार भंग होने लगते हैं। जब वो पूर्ण रूप से भंग हो जाते हैं तो मन में शून्य का निर्माण होता है। बौद्ध आचार्य नागार्जुन ने इसी पर शून्यवाद दिया है जिसे इंडियन फिलोसॉफी में पढ़ा जा सकता है। इन्हीं यादों में फंसा हुआ मन इंसान को शारीरिक बिमारियों में भी फंसाता है जिसपर अलग पोस्ट में चर्चा की जाएगी। हमारे बौद्ध इतिहास में 28 वें बुद्ध के बाद से हमारे बौद्ध विहारों ने बौद्ध विश्वविद्यालयों का रूप ले लिया था। इन्हीं विश्वविद्यालयों में विदेशी छात्र बुद्धि को जागृत करना, अपने भीतर के मन को पढ़ना, उसे शून्य करना विचारों को भंग करना सिखाया जाता था।इसी भंग अवस्था को प्राप्त करने वाले बौद्धों को भंगी उपाधि से सम्मानित किया जाता था। जिसे आज भंगी जाति बोलकर नीच इत्यादि बताकर प्रचारित किया गया वो किसी समय में सबसे श्रेष्ठ बुद्धिमान और महान हुआ करते थे। एक तरफ भंग अवस्था प्राप्त करने वाले छात्र और दूसरी तरफ धींवर शब्द थोपना यानी वासना में इतना फंसा हुआ की बेटी से ही संभोग कर ले। ऐसे शब्दों को थोपा जाना, पूरा नकली धर्म जिसे हिंदू कहा जा रहा है और उसकी आड़ में वासना का पूरा जाल थोपा गया है। ब्राह्मण खुद को ब्रह्मा बेटी संभोगी बताकर प्रचारित कर चुका है और यही उसने बाकी मूलनिवासियों पर भी थोपा है। ऐसा क्यों किया ब्राह्मण ने?
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