मन की कुंठा

अगर मन में कुंठा है तो वह कुंठा आपके विचारों में गहरी हैं। बचपन से किसी विचार के आसपास आपका मन घूम रहा है। यह कुंठा थाइराइड हार्मोन पर जरूर प्रभाव डालेगी। चूंकि यह कुंठा तीव्र इमोशनल स्ट्रैस देती है जिससे हाइपोथेलैमस प्रभावित होता है। यह हाइपोथैलैमस पिट्यूटरी ग्रंथि को जरूर प्रभावित करेगा जिसका सबसे आसान शिकार थाइराइड ग्लैंड होता है। इस कुंठा को जड़ तक देखें तो यह मन की असंतुष्ट इच्छा से पैदा हुआ लगता है। यह अधूरी इच्छा जीवन भर मन को अधूरापन देती है चूंकि बचपन का मन बहुत साफ़ होता है और उसमें पैदा हुआ विकार एक प्रकार का अधूरापन बच्चे के मन पर पैदा करता है। यह अधूरापन अगर जीवन में दोबारा हो जाए तो यही कुंठा का रूप ले लेगा और आजीवन मनोवैज्ञानिक रूप में उसे वही अधूरापन दिखाता रहेगा और वह इंसान उस अधूरेपन के पीछे आजीवन लगा रहेगा। चूंकि मन में अधूरापन है तो वह हर बार उस विचार से अधूरा ही रहेगा और इसी को फेलियर की परिभाषा में डाला गया है और यही मानसिक कुंठा का रूप है। सहज हो कर जैसे ही किसी रिश्ते में इस अधूरेपन को महसूस कर कुंठा से मन आवेशित होने लगता है तो सजग हो जाइए। जाग जाइए और इस कुंठा के विचार को ही अपने रिश्ते से भंग कीजिए। रिश्तों में आज़ादी महसूस करने लगेंगे।

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