मन को पकड़ने की एक प्रक्रिया है। अगर उस प्रक्रिया को नहीं किया तो बुद्धि को कभी नहीं पकड़ पाएंगे। और बिना बुद्धि को पकड़े मन एक आवारा पशु है। जैसा नकली धर्म में पुजवाया जाता है, बंदर हाथी सिर वाला आदमी। बुद्धि को पकड़ने का असली तात्पर्य है अपने इमोशन को समझना। मन जब तक जानवर पूजता रहेगा वो जानवर बना रहेगा। उसकी बुद्धि को कोई भी चला सकता है। चूंकि इंसान जानवर को पालतू बना लेता है। पर कोई जाग्रत है, जिसे बुद्धि का अहसास है। जो अपनी भावनाओं को समझने लगते हैं उन्हें अपने वश में करने लगते हैं वही बुद्धिमान हैं। जब लगातार विपासना करते हैं तो मन जो भावनाओं में फंसा हुआ है वह आजाद होने लगता है। चूंकि जब मन को सांस पर रोका जाता है तो यह मन को इसी समय में रोकने की प्रैक्टिस कराता है इसी समय का मतलब है ना तो मन पास्ट में फंसा है नां ही फ्यूचर में। वह इसी समय यानि प्रैजैंट में है। इस प्रेक्टिस को करते रहने से मन जहां जहां उलझा हुआ है वह वहां से भी निकलना चालू हो जाता है। सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि मन की उलझनें क्या हैं। मन की उलझन है हमारे इमोशंस।इन इमोशन को पकड़ने की प्रैक्टिस करने से बुद्धि पकड़ में आने लगती है।जो अपने विचारों को पकड़ने लगते हैं। उनके विचार उनकी बुद्धि से चलते हैं। जिनके विचार उनकी बुद्धि अनुसार चलते हैं। वो अपने विचारों को चुन सकते हैं। जो अपने खास विचारों को चुनकर उनपर प्रबल विश्वास बना लेते हैं, वो विचार पूरे हो जाते हैं। यही है इच्छा की पूर्ति। जब इच्छा की पूर्ति में बुद्धि का सब खेल है और बुद्धि ही बुद्ध हैं और बुद्ध ही बुद्धि हैं।
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