जैसा हम सोचते हैं वैसा हम बोलते हैं, जैसा हम बोलते हैं वैसा हम करते हैं, जैसा हम करते हैं वैसा ही हमें मिलता है, जैसा हमें मिलता है उसी से हमारी सोच बनती जाती है। अब यह सोचना या विचार कहां से पैदा हुआ?
जब बच्चा मां के पेट में होता है तो मां जो भी गहराई या अत्यधिक उत्तेजना से सोचती है, वह उत्तेजना तीन महीने के बच्चे के मन में मां के मन से जानी शुरू हो जाती है। चूंकि बच्चे का दिमाग बनना तीन महीने के बाद से शुरू होने लगता है।
अब मां के मन पर क्रिया प्रतिक्रिया कहां से बनती हैं?
परिवार से।
अब परिवार में वैचारिकी, सोचने का ढंग, नज़रिया, क्रिया प्रतिक्रिया कहां से पैदा होती है?
धर्म से।
धर्म के द्वारा विचार मां के मन तक कैसे पहुंचता है?
वह जिसे भगवान मान कर पूजा जा रहा है उसके प्रति ब्राह्मण ने सोच बनाई है वही विचार लोगों के मन पर थोप दिया गया है धर्म के द्वारा। पूरे देश में माहौल कैसा रहेगा, विचार कैसा रहेगा?
जैसा जिसने धर्म बनाया है वैसा। विचार धर्म के अनुसार बनता है। अब पुराने विचार जो मन में घुसे बैठे हैं उनसे मन आज भी क्रिया प्रतिक्रिया करता है उस क्रिया प्रतिक्रिया से मन साफ कैसे हो ताकि उसका प्रभाव जो मन में पैदा होता रहता है वह रुक जाए?
परिवार में बातचीत करने से, मन के भीतर जाकर विपसना करते हुए अपने खुद के विचारों को पकड़ने से, उन्हें परिवार के साथ साझा करने से और अगर कोई मनोवैज्ञानिक या मार्गदाता जो आपके मन को रास्ता दे सके दिखा सके उसके साथ साझा करने से।
विपसना करते रहने से मन अपने आप ही स्थिर होता जाता है और वह माहौल की क्रिया प्रतिक्रिया से मुक्त रहने लगता है। मन जितना शांत होगा उसकी सोचने की क्षमता बहुत अधिक होगी। सिर्फ बौद्ध मार्ग ही मन को अत्यधिक स्थिरता और शांति प्रदान करता है। पारिवारिक माहौल शांत और समझने वाला बनता है।
Comments
Post a Comment